Thalaivii Movie Review: देखने लायक है कंगना रनौत की 'थलाइवी', सपोर्टिंग कलाकारों के बेहतर काम के लिए याद रखी जाएगी फिल्म

कंगना, कंगना और कंगना... फिल्म देखने से पहले मन में ऐसे भाव आएं तो स्वाभाविक हैं। मगर फिल्म में सिर्फ कंगना ही नहीं है बल्कि अरविंद स्वामी और राज अर्जुन का किरदार भी है, जो अपने-अपने स्तर से कंगना रनौत की एक्टिंग को टक्कर देते हैं।

Himanshu Tiwari Himanshu Tiwari
Updated on: September 09, 2021 15:29 IST
Photo: INSTAGRAM/KANGANA RANAUT

Thalaivii Movie Review | जानें कैसी है कंगना रनौत की फिल्म 'थलाइवी'?

  • फिल्म रिव्यू: Thalaivii
  • स्टार रेटिंग: 2.5 / 5
  • पर्दे पर: 10 Sep, 2021
  • डायरेक्टर: ए एल विजय
  • शैली: बायोपिक

'रुपहले पर्दे पर जे जयललिता का किरदार' ये सोचते ही आपका मन उस महान राजनीतिक शख्सियत के इर्द गिर्द घूमने लगता है। बड़े-बड़े कटआउट के बीच अथाह जनसैलाब का अनहद नाद। नरमुंडों के बीच उछलते लाखों हाथों का अभिवादन। इन सब के बीच में सिर्फ एक शख्सियत की मौजूदगी, जो तमिलनाडु की पूर्व मुख्यमंत्री जे जयललिता ही हो सकती हैं। ये बाते जितनी सोचने में भव्य लगती हैं, रुपहले पर्दे पर इन्हें उतारना उतना ही मुश्किल है। जे जयललिता जैसे कद्दावर किरदार को आत्मसात कर 34 साल की उम्र में 16 साल से लेकर 42 साल के उम्र को स्क्रीन पर जीना, वजन को घटाना बढ़ाना, हेवी कॉस्टयूम और प्रोस्थेटिक के भार को झेलते हुए रुपहले पर्दे पर एक महान शख्सियत 'थवाइवी' को जीवंत करना वाकई कंगना रनौत के लिए चुनौती भरा रहा होगा। इस किरदार को निभाते हुए कंगना कई दौर से गुजरी होंगी, सिर्फ एक परफेक्ट शॉट्स के लिए। मगर ये 'परफेक्ट' शॉट्स दर्शकों को कैसे लगेंगे? इस सवाल का जवाब हमें दर्शकों पर ही छोड़ना चाहिए।

तमिलनाडु की पूर्व मुख्यमंत्री जे जयललिता के बायोपिक 'थलाइवी' 10 सितंबर को सिनेमाघरों में रिलीज होने जा रही है।

कहानी

'थलाइवी' एक मशहूर अभिनेत्री 'जया' (कंगना रनौत) के तमिलनाडु की मुख्यमंत्री बनने की कहानी है। कहानी 1965 में शुरू होती है, जहां 16 साल की जयललिता तमिल सिनेमा की एक उभरती हुई अभिनेत्री हैं। जया अपनी मां (भाग्यश्री) के कहने पर फिल्मों में कदम रखने के लिए राजी हो जाती हैं। फिल्मों की शूटिंग के दौरान जया को एमजेआर (अरविंद स्वामी) के साथ अभिनय करने का मौका मिलता है, जो तमिल सिनेमा के सबसे बड़े सुपरस्टारों में से एक हैं। एमजेआर को जया का चुलबुलापन काफी पसंद आता है। कई मौकों पर जया, एमजेआर के साथ रहती हैं या यूं कहें एमजेआर और जया को एक साथ रहना काफी रास आने लगा है। हालांकि, उनका साथ रहना एमजेआर के पीए आर एम वीरप्पन (राज अर्जुन) को काफी खटकता है, क्योंकि पितृसत्तात्मक समाज में एक सुपरस्टार और एक स्थापित राजनीतिज्ञ के आस-पास अपनी पत्नी के अलावा किसी गैर महिला का होना ठीक नहीं माना जाता।

वीरप्पन का मानना है कि जया के लिए एमजेआर का प्यार सुपरस्टार के लिए कयामत ला सकता है। अन्ना दुरई के निधन के बाद एमजेआर की राजनीति में आधिकारिक शुरुआत होती और वह एम करुणानिधि (नासर) के नेतृत्व में डीएमके में शामिल हो जाते हैं। करुणानिधि ने रिकॉर्ड अंतर से राज्य का चुनाव जीता और इसका एक कारण यह भी है कि एमजेआर ने उनके लिए प्रचार किया। करुणानिधि के लिए दुख की बात ये थी कि एमजेआर पार्टी की बैठकों में शामिल नहीं हो पा रहे थे। इसके अलावा, वह लोगों के बीच करुणानिधि से अधिक लोकप्रिय हो रहे थे। इस द्वन्द्व के बाद एमजेआर ने डीएमके छोड़ दी और अपनी पार्टी बनाई।

वीरप्पन, एमजेआर को सलाह देते हैं कि उन्हें जया से दूर रहना चाहिए, इससे पहले कि वह उसके राजनीतिक करियर में समस्या पैदा करे। सामाजिक व्यवस्था और मौजूदा राजनीतिक छींटाकसी को देखते हुए एमजेआर मजबूरन वीरप्पन से सहमत हो जाते हैं। इस सच्चाई को जानने के बाद जया काफी दुखी होती हैं। कहानी 10 साल आगे बढ़ती है... जब एमजेआर दूसरी बार मुख्यमंत्री बनते हैं। एमजेआर के साथ-साथ जया की भी उम्र बढ़ती है। उम्र के तकाजे को देखते हुए जया को फिल्मों में हीरोइन की बड़ी बहन के किरदार ऑफर होने लगते हैं। फिल्मों के इतर वह डांस शो भी करने लगती हैं। इसी दौरान मदुरै के एक सरकारी इवेंट में जया की एमजेआर से फिर मुलाकात होती है। एमजेआर जया को अपनी पार्टी में शामिल होने के लिए कहते हैं। जया उन्हें मना कर देती है लेकिन चेन्नई की वापसी के दौरान एक घटना जया के ऊपर गहरा प्रभाव छोड़ती है। इस घटना के बाद जया की आधिकारिक तौर पर राजनीति में शुरुआत होती है। जया कैसे राज्यसभा पहुंचती हैं? उन्हें राजनीति में रहने के दौरान किन-किन द्वन्द्वों का सामना करना पड़ता है? जया, जयललिता के तौर पर कैसे तमिलनाडु की मुख्यमंत्री के तौर पर सत्ता पर आसीन होती हैं? यही घटनाक्रम फिल्म के विस्तार में है। 

फिल्मांकन

सांकेतिक तौर पर किसी की भव्यता का चोला ओढ़ लेने में और असल में उस किरदार को जीने में बहुत अंतर होता है। हालांकि, कंगना ने अपनी उम्र और शरीर की बनावट के पार जा कर जयललिता के किरदार को निभाया है। वास्तविकता में अंतर कम लगे, इसके लिए उन्होंने अपने वजन को घटाया-बढ़ाया। वजनदार कॉस्टूम के बोझ के साथ 1960 के दशक की फिल्मों में किरदार को रुपहले पर्दे पर उतारना काफी मुश्किल है, जिसे निभाने की अच्छी कोशिश की गई है।

फिल्म की कहानी विस्तार में कई घटनाएं एक साथ लेकर चलती हैं, फिल्म के कई सीन्स कंगना के बिना फिल्माना अखरता नहीं हैं या ऐसे कह सकते हैं, इन सीन्स में बहुतायत में फिल्माए गए मेलोड्रामा को मिस नहीं किया गया। फिल्माकारों के सामने फिल्म की रोचकता बनाए रखने में बहुत सी चुनौतियां होती हैं, मसलन - उन सीन्स को अपनी फिल्मों में जगह देना जिन्हें लोगों को पता नहीं हो। बतौर 'प्रॉपेगैंडा सचिव' के तौर पर हाथों में पत्थर लिए जनता के बीच में जया का जाना... रोमांच के स्तर को मजबूत करता है। फिल्म में नाटकीय स्तर को कायम रखने की हर संभव गुंजाइश में इसका इस्तेमाल किया गया। जयललिता की पार्टी के विपक्ष में आने के वक्त और फिर बतौर मुख्यमंत्री सत्ता पर आसीन होने से पहले चुनाव के परिणाम का सस्पेंस ऐसा लगता है जैसा किसी टीवी सोप का सीक्वेंस हो। पहले हाफ में फिल्म अपनी रफ्तार से आगे बढ़ती है, मगर कड़ियों को जोड़ने में अपनी गति खो देती है। हालांकि, दूसरे हाफ में राजनीति में जयललिता की एंट्री रोमांच का स्तर बनाए रखती है जिसे इसके क्लाइमेक्स तक कायम रखा गया।

तकनीकी पक्ष

नायक के विपरीत विलेन को गढ़ लेना एक दर्शक की सामान्य प्रवृति होती है। जयललिता की राजनीति में उतरने के बाद विरोधी पार्टी के नेताओं और एम करुणानिधि के चेहरे ठीक इस फ़िल्म में बॉलीवुड की फ़िल्म के पारम्परिक विलेन की भांति लगते हैं। यानी काल्पनिकता इतनी कलात्मक दृष्टि के गढ़ी गई है जिसे स्क्रीन पर चलने मात्र से इसकी वास्विकता का बोध होता है। इसके पीछे श्रेय निर्देशक विजय का नहीं बल्कि जयललिता के अलावा निभाए गए अन्य किरदारों का नजर आना हो सकता है। कंगना के अलावा कहें तो यह फिल्म इसके सहायक कलाकारों के तौर पर भी याद की जाएगी। बहरहाल, फिल्म में संगीत के तौर पर 'चली-चली' के अलावा कोई ऐसा गाना नहीं जो मन को लुभाने लायक हो। सीन्स के सपोर्ट में सुनाई देने वाले कई बैकग्राउंड स्कोर में आंचलीय प्रभाव नजर आता है, ऐसा जैसे इसे केवल साउथ के दर्शकों को ध्यान में रख कर ही बनाया गया हो। 60-70 के दशक के फिल्मों के सेटअप की बनावट और बुनावट में खास अंतर कर पाना मुश्किल है, क्योंकि वह दौर भड़कीले रंगे को इस्तेमाल का दौर था, जिसका स्क्रीन प्ले लिखने के दौरान खास ख्याल रखा गया। कुल मिला कर कहीं किसी पहलू में बेहतर तो कहीं किसी पहलू में औसत के अंतराल में फिल्म की कहानी अपने अंत के लिए रुख करती है।

अभिनय

कंगना, कंगना और कंगना... फिल्म देखने से पहले मन में ऐसे भाव आएं तो स्वाभाविक हैं। मगर फिल्म में सिर्फ कंगना ही नहीं है। बल्कि अरविंद स्वामी और राज अर्जुन का किरदार भी है, जो अपने-अपने स्तर से कंगना रनौत की एक्टिंग को टक्कर देते हैं। कंगना ने इस फिल्म के लिए खूब मेहनत की जिसकी झलक फिल्म में नजर आ रही है। उम्र के अंतर और व्यक्तिव की गंभीरता को उन्होंने अपने किरदार में ढालने की कोशिश की है, और वह सफल रही हैं। एमजी रामचंद्रन के तौर पर फिल्मकारों को अरविंद स्वामी से बेहतर कलाकार शायद ही मिले। आर एम वीरप्पन के किरदार में राज अर्जुन अपनी एक्टिंग पर गर्व कर सकते हैं। उन्हें 'सीक्रेट सुपरस्टार' से तो नहीं बल्कि 'थलाइवी' से अपनी पहचान जरूर मिल सकती है। नासर ने एम करुणानिधि के किरदार में बेहतर किया है।

जयललिता के राजनीतिक करियर के अलावा एमजी रामचंद्रन की उनकी जिंदगी में मौजूदगी की कितनी अहमियत रही... इसे फिल्म का मूल समझें और इसी ध्येय से फिल्म देखने जाएं तो फिल्म आपका मनोरंजन कर सकती है। वर्ना फिल्म में खूबियों और खामियों का अनुपात बराबर है। 

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