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‘द राजा साब’ रिव्यू: हॉरर कम, इमोशन ज्यादा, प्रभास की एक्टिंग में दम, जानें कितनी असरदार है कहानी

 Written By: जया द्विवेदी
 Published : Jan 09, 2026 03:02 pm IST,  Updated : Jan 16, 2026 01:45 pm IST

‘द राजा साब’ रिलीज हो गई है। ये 3 घंटे 10 मिनट की एक हॉरर फैंटेसी फिल्म है। फिल्म में प्रभास ने शानदार काम किया है, लेकिन फिल्म की कहानी में कितना दम है, ये जानने के लिए नीचे स्क्रोल करें।

the raja saab
प्रभास और संजय दत्त Photo: FILM POSTER (PRESS KIT)
  • फिल्म रिव्यू: द राजा साब
  • स्टार रेटिंग 2.5/5
  • पर्दे पर: 09/01/2026
  • डायरेक्टर: मारुति दासारी
  • शैली: हॉरर फैंटेसी

हॉरर कॉमेडी एक ऐसा जॉनर है, जिसमें संतुलन सबसे बड़ी चुनौती होती है। जरा-सी चूक फिल्म को या तो हल्का बना देती है या जरूरत से ज्यादा गंभीर। 'द राजा साब' इसी संतुलन को साधने की एक ईमानदार कोशिश है। यह फिल्म न तो पूरी तरह डराती है, न ही सिर्फ हंसाने पर टिकी रहती है, बल्कि भावनाओं, पारिवारिक रिश्तों और अतीत के घावों को हॉरर-फैंटेसी के फ्रेमवर्क में पिरोने की कोशिश करती है। प्रभास के करियर के लिहाज से यह फिल्म खास है, क्योंकि बाहुबली जैसे आइकॉनिक किरदारों के बाद वह खुद को एक बिल्कुल अलग टोन और जॉनर में आजमाते नजर आते हैं। 'द राजा साब' उनके लिए एक सुरक्षित प्रयोग नहीं, बल्कि जोखिम भरा कदम है, जो कुछ जगहों पर असरदार साबित होता है तो कुछ जगहों पर सीमित।

कहानी

फिल्म की कहानी दक्षिण भारत के एक छोटे से गांव से शुरू होती है, जहां आर. राजू (प्रभास) अपनी दादी गंगादेवी (जरीना वहाब) के साथ बेहद साधारण और संघर्षपूर्ण जीवन जी रहा है। कभी एक प्रतिष्ठित जमींदार परिवार से ताल्लुक रखने वाला यह घर अब अतीत की परछाइयों में सिमट चुका है। राजू मस्ती-मिजाज है, जिंदगी को ज्यादा गंभीरता से नहीं लेता, लेकिन उसकी दुनिया उसकी दादी के इर्द-गिर्द घूमती है। गंगादेवी की मानसिक और शारीरिक स्थिति धीरे-धीरे बिगड़ती जा रही है। अतीत में एक पवित्र देवी का हार चोरी हो गया था और उसी हार को ढूंढने निकले उनके पति कनकराजू (संजय दत्त) कभी लौटकर नहीं आए। डॉक्टरों का मानना है कि अगर गंगादेवी अपने पति को एक बार फिर देख लें तो उनकी स्मृति और हालत में सुधार हो सकता है।

इसी उम्मीद के सहारे राजू हैदराबाद का रुख करता है। यह यात्रा केवल एक लापता इंसान की तलाश नहीं रहती, बल्कि परिवार के दबे हुए राज, मानसिक बीमारियों, अपराधबोध और अतीत के अंधेरे अध्यायों से टकराने की प्रक्रिया बन जाती है। कहानी का दूसरा हिस्सा हॉरर और फैंटेसी की तरफ झुकता है, जहां रहस्य, अलौकिक संकेत और मनोवैज्ञानिक डर साथ-साथ चलते हैं। संजय दत्त का फ्लैशबैक ट्रैक फिल्म को गंभीरता देता है, लेकिन कहानी का विस्तार कई बार खिंचा हुआ महसूस होता है। इंटरवल के बाद फिल्म नया मोड़ लेती है, मगर पहले हिस्से की धीमी रफ्तार कुछ दर्शकों के लिए चुनौती बन सकती है।

अभिनय

प्रभास ने राजू के किरदार को सादगी और संयम के साथ निभाया है। यह उनका सबसे एनर्जेटिक या करिश्माई परफॉर्मेंस नहीं है, लेकिन भावनात्मक दृश्यों में वह असर छोड़ते हैं। जरीना वहाब के साथ उनके अस्पताल और घरेलू दृश्य फिल्म की आत्मा हैं। प्रभास संवादों से ज्यादा अपने एक्सप्रेशन और बॉडी लैंग्वेज से काम लेते हैं, जो किरदार को विश्वसनीय बनाता है। संजय दत्त फिल्म के सबसे मजबूत स्तंभ हैं। कनकराजू के रूप में वह सिर्फ एक विलेन नहीं, बल्कि टूटे हुए अतीत और नैतिक पतन का प्रतीक बनकर उभरते हैं। उनका गेटअप, भारी आवाज और फ्लैशबैक सीक्वेंस फिल्म में डर और वजन जोड़ते हैं। हालांकि उनके किरदार को और गहराई दी जा सकती थी।

जरीना वहाब फिल्म की भावनात्मक रीढ़ हैं। उनकी आंखों में दर्द, भ्रम और मातृत्व का जो मेल है, वह हॉरर कॉमेडी जैसे जॉनर में दुर्लभ है। मालविका मोहनन रहस्यमयी और सशक्त उपस्थिति दर्ज कराती हैं। उनका किरदार सीमित स्क्रीन टाइम में भी प्रभाव छोड़ता है, हालांकि उन्हें और स्पेस दिया जा सकता था। बोमन ईरानी हिप्नोटिज्म एक्सपर्ट के रूप में कहानी को एक दिलचस्प मोड़ देते हैं, लेकिन उनका ट्रैक अचानक आता-जाता महसूस होता है।

निर्देशन

मारुति दासारी का निर्देशन सुरक्षित लेकिन सधा हुआ है। वह हॉरर, इमोशन और फैंटेसी को ज़रूरत से ज़्यादा शोर के बिना संभालते हैं। इंटरवल के आसपास आने वाला ट्विस्ट फिल्म को नई दिशा देता है, लेकिन पहले हिस्से की धीमी गति और कुछ रिपीटिव सीन असर कम कर देते हैं। निर्देशक का फोकस भव्यता से ज़्यादा भावनात्मक कनेक्शन पर है, जो तारीफ़ के काबिल है। हालांकि, हॉरर एलिमेंट्स को और प्रभावी बनाया जा सकता था, डर ज्यादातर माहौल से आता है, न कि सिचुएशन से।

तकनीकी पक्ष

फिल्म की VFX और प्रोडक्शन डिजाइन इसकी सबसे बड़ी ताक़त हैं। क्लाइमेक्स और अंतिम 30-40 मिनट में इंटरनेशनल-लेवल विज़ुअल्स देखने को मिलते हैं। भव्य सेट्स और CGI आंखों को प्रभावित करते हैं, लेकिन कुछ जगहों पर VFX जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल हुआ लगता है। बैकग्राउंड स्कोर डर और इमोशन को सपोर्ट करता है, मगर यादगार नहीं बन पाता। सिनेमैटोग्राफी खासकर रात के दृश्य और हवेलीनुमा लोकेशन्स में प्रभावी है। फिल्म की लंबाई (3 घंटे 6 मिनट) एक बड़ी चुनौती है, एडिटिंग और टाइट हो सकती थी।

फाइनल वर्डिक्ट

'द राजा साब' एक महत्वाकांक्षी हॉरर-फैंटेसी है, जो डराने से ज्यादा भावनाओं पर भरोसा करती है। यह न तो पूरी तरह मास एंटरटेनर है, न ही शुद्ध हॉरर, बल्कि एक ऐसा मिश्रण है जो हर दर्शक को बराबर संतुष्ट नहीं करेगा। प्रभास के लिए यह एक नई दिशा है, जिसमें वह ईमानदार नजर आते हैं, भले ही फिल्म पूरी क्षमता तक न पहुंच पाए। 

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