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‘आंखों की गुस्ताखियां’ में विक्रांत मैसी का इमोशनल जादू, जानें पहली फिल्म में कैसा है शनाया कपूर का काम

 Written By: जया द्विवेदी
 Published : Jul 11, 2025 12:51 pm IST,  Updated : Jul 11, 2025 01:20 pm IST

विक्रांत मैसी और शनाया कपूर की फिल्म ‘आंखों की गुस्ताखियां’ सिन्माघरों में आज रिलीज हो गई है। इस फिल्म की कहानी कैसी है जानें।

Aankhon Ki Gustaakhiyan
विक्रांत और शनाया। Photo: INSTAGRAM
  • फिल्म रिव्यू: आंखों की गुस्ताखियां
  • स्टार रेटिंग 3/5
  • पर्दे पर: 11.07.2025
  • डायरेक्टर: संतोष सिंह
  • शैली: रोमांटिक ड्रामा

'आंखों की गुस्ताखियां' एक ऐसी फिल्म है जो अपने नाम की तरह ही एक भावनात्मक यात्रा पर ले जाती है। यह कहानी दो अजनबियों की मुलाकात, उनके बीच पनपते रिश्ते और उस रिश्ते की गहराई को बहुत ही सादगी और खूबसूरती से बयान करती है। यह फिल्म उन दर्शकों के लिए है, जो लाउड रोमांस से हटकर कुछ सच्चा और दिल को छूने वाला देखना चाहते हैं। फिल्म बड़े पर्दे पर रिलीज हो गई है। फिल्म में विक्रांत मैसी और शनाया कपूर लीड रोल में हैं। शनाया कपूर की ये पहली फिल्म है, जबकि विक्रांत अपनी एक्टिंग का पहले ही लोहा मनवा चुके हैं।

कहानी: शब्दों से परे एक रिश्ता

फिल्म की कहानी एक ट्रेन यात्रा के दौरान शुरू होती है, जब दो अजनबी एक-दूसरे के सामने वाली सीट पर आमने-सामने बैठते हैं। विक्रांत मैसी, जो इस फिल्म में एक दृष्टिहीन संगीतकार की भूमिका निभा रहे हैं, अपने संगीत के जरिए दुनिया को महसूस करते हैं। उनका किरदार शांत, संवेदनशील और भीतर से बेहद भावुक है। उनके सामने बैठी है शनाया कपूर, जो थिएटर आर्टिस्ट बनी हैं-एक महत्वाकांक्षी लड़की, जो अपने सपनों की तलाश में है।

ट्रेन की छोटी-सी यात्रा में दोनों के बीच कोई लव-एट-फर्स्ट-साइट वाला नाटकीय रोमांस नहीं होता, बल्कि खामोशियां, नजरें और कुछ अधूरे शब्द उनके बीच एक ऐसा रिश्ता बुनते हैं, जो बेहद गहराई लिए हुए है। यह कहानी इस बात को बारीकी से दिखाती है कि कभी-कभी बिना कुछ कहे, सिर्फ महसूस करके ही प्यार किया जा सकता है।

अभिनय

विक्रांत मैसी एक बार फिर अपने अभिनय से दर्शकों को प्रभावित करते हैं। एक दृष्टिहीन किरदार को निभाना सिर्फ आंखें बंद कर लेना नहीं होता, यह उस दुनिया को जीना होता है जहां सब कुछ सिर्फ एहसासों पर आधारित होता है। विक्रांत न केवल इस चुनौती को बखूबी निभाते हैं, बल्कि अपने हाव-भाव, आवाज और शरीर की भाषा के जरिए भावनाओं की एक गहराई रचते हैं। जब वह सिर्फ अपनी उंगलियों से पियानो बजाते हैं या जब किसी बात पर हल्का सा मुस्कुराते हैं, ये सारे पल उनके किरदार की आत्मा को उजागर करते हैं।

वहीं शनाया कपूर, जो इस फिल्म से अपना डेब्यू कर रही हैं, अपने किरदार में मासूमियत और फ्रेशनेस लेकर आती हैं। उनकी डायलॉग डिलीवरी में थोड़ी झिझक नजर आती है, लेकिन उनकी स्क्रीन प्रेजेंस और भावों के जरिए भावनाएं व्यक्त करने की कला काबिल-ए-तारीफ है। हां, कहीं-कहीं थोड़ी बेहतर हो सकती थी, इमोशनल सीन्स में उनके भाव और निखर सकते थे। रोमांटिक दृश्यों में वह खासतौर पर सहज लगती हैं, जहां वो विक्रांत के साथ बिना कुछ बोले एक खास कनेक्शन साझा करती हैं। दोनों कलाकारों की केमिस्ट्री फिल्म की जान है। बिना बड़े संवादों के भी वो एक-दूसरे के साथ इतना अच्छा तालमेल दिखाते हैं कि दर्शक भावनात्मक रूप से उनके साथ जुड़ जाते हैं।

निर्देशन 

मानसी बागला, वरुण बागला, विपिन अग्निहोत्री की फिल्म का निर्देशन किया है संतोष सिंह ने और उन्होंने इस कहानी को अत्यंत सादगी और संवेदनशीलता के साथ पेश किया है। फिल्म की गति शुरुआत में थोड़ी धीमी जरूर है, लेकिन जैसे-जैसे किरदारों का आपसी जुड़ाव बढ़ता है, दर्शक भी उनकी यात्रा में खोने लगते हैं। ट्रेन जैसी सीमित जगह में फिल्म को शूट करना एक चुनौती हो सकती थी, लेकिन कैमरा मूवमेंट्स और लोकेशन का शानदार उपयोग करते हुए संतोष सिंह ने इसे खूबसूरत फ्रेम्स में बदल दिया है। दृश्यों की बनावट, लाइटिंग और बैकग्राउंड सेटअप इस कहानी को और भी प्रभावशाली बनाते हैं। किरदारों की इमोशनल गहराई को बहुत ही नजाकत से पेश किया गया है। फिल्म में कुछ खामिया जरूर हैं, जो निर्देशन और लेखन के चलते ही हैं। कुछ हिस्सों में कहानी खिचती है। वहीं शनाया के हिस्सा में संवादों को और मजबूत किया जा सकता है, बीच हल्के भटकाव के बाद भी कहानी सही दिशा में अंत तक पहुंचती है और फिर मन में यही आता है अंत भला तो सब भला। ऐसे में इन चंद बारीकियों को नजरअंदाज कर सकते हैं।

संगीत: फिल्म की आत्मा

विशाल मिश्रा का संगीत इस फिल्म की आत्मा है। टाइटल ट्रैक 'आंखों की गुस्ताखियां' को जुबिन नौटियाल ने गाया है और यह गाना फिल्म के इमोशनल टोन को बखूबी सेट करता है। इस गाने के बोल मनोज मुंतशिर ने लिखे हैं, जो सीधे दिल में उतरते हैं। फिल्म में अन्य गाने भी कहानी में पूरी तरह से घुले हुए हैं, न तो उनका इस्तेमाल जबरदस्ती किया गया है और न ही वे कथानक को बाधित करते हैं। बल्कि ये गाने किरदारों की भावनाओं को गहराई देते हैं, दर्शकों को उनके अनुभव का हिस्सा बनाते हैं। कुछ गीत तो ऐसे हैं, जो फिल्म देखने के बाद भी ज़ेहन में रह जाते हैं।

तकनीकी पक्ष

ट्रेन जैसे सीमित स्थान में भी सिनेमैटोग्राफी कमाल की है। फिल्म के DOP (डायरेक्टर ऑफ फोटोग्राफी) ने हर फ्रेम को कलात्मकता और भावनात्मकता के साथ कैप्चर किया है। चाहे वो बाहर का दृश्य हो, खिड़की से आती धूप, या दो किरदारों के बीच का क्लोज-अप, हर फ्रेम में एक किस्म की संवेदनशीलता है। प्रोडक्शन डिजाइन बेहद रियलिस्टिक है, जो कहानी के टोन के साथ पूरी तरह मेल खाता है। एडिटिंग अच्छी है, हालांकि पहले हाफ की गति थोड़ी और तेज की जा सकती थी, लेकिन क्लाइमेक्स आते-आते फिल्म अपनी पकड़ पूरी तरह जमा लेती है।

फाइनल वर्डिक्ट

'आंखों की गुस्ताखियां' एक सादगी से रची गई ऐसी प्रेम कहानी है, जो दिखाती है कि प्यार सिर्फ शब्दों में नहीं, बल्कि एहसासों, नजरों और खामोशियों में भी पनपता है। यह फिल्म उन लोगों के लिए है, जो शोर-शराबे वाले रोमांस की जगह एक सच्चा, सधा और गहराई से भरा हुआ इश्क देखना चाहते हैं। अगर आप मीनिंगफुल और दिल से जुड़ी कहानियों के दर्शक हैं तो यह फिल्म आपके लिए एक बेहतरीन अनुभव हो सकती है।

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