नई दिल्ली: जब भी चुनाव के लिए वोटिंग होती है तब आपने किसी ना किसी को ये कहते जरूर सुना होगा कि अरे वोटिंग टर्नआउट ज्यादा है। ये मौजूदा सरकार के बदलने का साफ संकेत है। लेकिन अगर आंकड़ों का विश्लेषण करें तो ये बात चुनाव का सबसे बड़ा मिथक साबित होती दिखती है। दरअसल, वोटिंग प्रतिशत में बढ़ोतरी एक जटिल संकेत है जिसे परिणाम आने से पहले भांपना बहुत कठिन है। वोटिंग टर्नआउट के बढ़ने और उसके मौजूदा सरकार के पक्ष या खिलाफ में होने का कोई सीधा कनेक्शन नहीं है। जो लोग चुनाव को अच्छे से फॉलो करते हैं या उसकी खबरों में दिलचस्पी लेते हैं वे आमतौर पर मानते हैं कि वोटिंग टर्नआउट का बढ़ना सत्ता विरोधी बयार का संकेत है। लेकिन जब हम अलग-अलग चुनाव के आकंड़ों का विश्लेषण करते हैं तो इसका कोई सबूत नहीं मिलता है। आइए इस खबर में आकंड़ों की मदद से हाई वोटिंग टर्नआउट से जुड़े सबसे बड़े मिथक का सच जानते हैं।
मिथक Vs आंकड़े
आम धारणा है कि वोटिंग टर्नआउट तब बढ़ता है जब वो लोग वोट करने निकलते हैं जो मतदान और चुनाव में कम इंटरेस्ट लेते हैं। ऐसे लोग जब मौजूदा सरकार से कुछ ज्यादा ही परेशान होते हैं तो ये घर से निकलकर मौजूदा सरकार के खिलाफ वोट करते हैं। हालांकि, चुनाव के आंकड़ों में इसका कोई ठोस सबूत नहीं मिलता है। अगर हम बिहार विधानसभा चुनाव 2010 और तमिलनाडु विधानसभा चुनाव 2011 के आंकड़ों की तुलना करें तो दोनों में करीब 7 फीसदी वोटिंग टर्नआउट बढ़ा था। परिणाम आए तो बिहार में मौजूदा NDA सरकार बनी रही थी और इसके उलट तमिलनाडु की सत्ता से DMK बाहर हो गई थी।
वोटिंग बढ़ने के बावजूद बिहार में बनी रही थी सरकार
बता दें कि हालिया चुनावी इतिहास एक मिली-जुली तस्वीर पेश करता है। दो चुनावों पर गौर करें तो बिहार के 2010 के विधानसभा चुनाव में 2005 के मुकाबले मतदान 6.8 प्रतिशत बढ़ा था, जो मतदाताओं की बढ़ती भागीदारी को दिखाता है। इस बढ़ोतरी के बावजूद, मौजूदा मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व वाले मौजूदा NDA गठबंधन ने शानदार वापसी की थी। गठबंधन ने अपने वोट शेयर में करीब 3 प्रतिशत की बढ़त हासिल की थी और बिहार विधानसभा में अपनी सीटों का हिस्सा लगभग 26 प्रतिशत बढ़ा लिया था।
जब तमिलनाडु में हाई वोटिंग टर्नआउट से बदली थी सत्ता
इसी तरह तमिलनाडु विधानसभा चुनाव 2011 के वोटिंग टर्नआउट में पिछले इलेक्शन के मुकाबले 7.2 फीसदी की बढ़ोतरी हुई थी। लेकिन यहां बिहार चुनाव के उलट मौजूदा DMK सरकार को भारी नुकसान हुआ था। DMK को वोटिंग प्रतिशत में करीब 3 फीसदी का नुकसान हुआ था और वह पिछली बार की 96 सीटों के मुकाबले महज 23 सीटों पर सिमट गई थी। इससे पहले 2006 के चुनाव में भी वोटिंग प्रतिशत में बढ़ोतरी हुई थी लेकिन तब तत्कालीन AIADMK को नुकसान हुआ था। वह सत्ता से बाहर हो गई थी।
डेटा का विश्लेषण ये दिखाता है कि हाई वोटिंग टर्नआउट के बाद दोनों तरह परिणाम आ सकते हैं। यानी चुनाव में वोटिंग टर्नआउट बढ़ना मौजूदा सरकार के खिलाफ मतदान और सरकार बदलने की गारंटी नहीं है।
वोटिंग प्रतिशत बढ़ने के क्या हो सकते हैं कारण?
अब आपके मन में ये सवाल भी होगा कि वोटिंग प्रतिशत में रिकॉर्ड बढ़ोतरी कब और क्यों होती है? इसके कई कारण हो सकते हैं। इनमें सत्ता विरोधी लहर, प्रो इनकंबेंसी और मजबूत लामबंदी जैसे कारक शामिल हैं।
सत्ता विरोधी लहर: वर्तमान सरकार के प्रति नाराजगी नए मतदाताओं को संगठित कर सकती है। उन्हें वोट देने के लिए पोलिंग बूथ तक पहुंचाकर मौजूदा सरकार में बदलाव ला सकती है।
सत्ता समर्थन की बयार: राज्य में मौजूदा सरकार का लोकप्रिय होना भी वोटर्स को सक्रिय कर सकता है। इसी वजह से भी वोटिंग टर्नआउट में बढ़ोतरी हो सकती है। ऐसे में उन लोगों के घर से निकलकर वोट करने की संभावना बढ़ जाती है जो मौजूदा सरकार को बनाए रखना चाहते हैं।
मजबूत लामबंदी: अगर किसी चुनाव में कोई करिश्माई या मजबूती से चुनौती देने वाला लीडर आ जाता है और लोगों को अच्छे से मोबलाइज करता है तो ऐसे में भी वोटिंग टर्नआउट बढ़ने की संभावना रहती है। जो लोग वोटिंग को लेकर उदासीन रहते हैं, ऐसे में वे भी पोलिंग बूथ पर पहुंचकर वोट कर सकते हैं।
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