हिमाचल प्रदेश: हिमाचल प्रदेश के हमीरपुर जिले के द्वैत सिद्ध में बाबा बालकनाथ मंदिर की गुफा में एक महिला श्रद्धालु अपनी दो बेटियों के साथ पहुंची और गुफा में महिलाओं के नहीं प्रवेश करने की सदियों पुरानी परंपरा को तोड़ते हुए पूजा की। उत्तर भारत के इस प्रसिद्ध मंदिर में गुफा के अंदर तक घुसकर महिलाओं के न जाने की वर्षों की पुरानी परंपरा को तोड़ा।
भगवान शिव के बड़े बेटे कार्तिकेय कुंवारे माने जाते हैं और बाबा बालकनाथ को उनका अवतार माना जाता है, इसलिए महिलाएं गुफा में कुछ दूरी से ही पूजा करती हैं, लेकिन मंदिर में बाबा की गुफा तक पहली बार किसी महिला ने प्रवेश कर माथा टेक कर सबको हैरानी में डाल दिया।
हालांकि मंदिर प्रशासन ने 16 अप्रैल को स्पष्ट किया था कि गुफा में प्रवेश करने को लेकर महिलाओं पर प्रतिबंध नहीं है, इसके बावजूद महिलाएं पुरानी परंपरा को ध्यान में रखते हुए गुफा में नहीं घुसती हैं। अपनी दो बेटियों के साथ महिला ने कल पुजारियों की मौजूदगी में गुफा में प्रवेश किया और वहां पूजा अर्चना की। मंदिर पर राज्य सरकार का नियंत्रण है। मंदिर के पदाधिकारियों ने इस घटना की पुष्टि की।
जब वह गुफा की ओर बढऩे लगी तो पहले उसे वहां तैनात महिला गृह रक्षक ने रोकने की कोशिश की, लेकिन महिला ने उनकी तरफ ध्यान नहीं दिया और आगे बढ़ गई। इसके बाद उसे कुछ पुजारियों ने पुरानी परंपरा की ओर ध्यान दिलाया, लेकिन महिला बेबाकी अपनी 2 बेटियों सहित गुफा में जा पहुंची और माथा टेक कर वापस लौट गई।
महिला लदरौर स्कूल में बतौर बायोलॉजी की प्रवक्ता के रूप में नियुक्त है। उनके ऐसा करने से मंदिर परिसर में ये खबर आग की तरह फैल गई। सब लोग हतप्रभ होकर चर्चा करने लगे। इस विषय में मंदिर अधिकारी ईश्वर दास ने माना कि एक महिला ने मंदिर की गुफा में जाकर माथा टेका है। इस पर कोई रोक-टोक नहीं थी, बल्कि अब तक महिलाओं के माथा न टेकने की परंपरा चली आ रही थी।
आपको बता दें कि बाबा बालकनाथ ने इससे पहले हमीरपुर के ही जिला झनियारी नामक स्थान पर तप कियाए इसके बाद वे शाहतलाई आए और ब्रहमचार्य जीवन यापन करते-करते वे दयोट् नामक राक्षस की गुफा में तप करने जा बैठे। इसी बात को लेकर दानों में युद्ध हुआ और बाबा बालकनाथ विजयी हुए। इसके बाद समझौता यह हुआ कि इस स्थान का नाम दयोटसिद्ध पड़ेगा। चूंकि बाबा बालक नाथ एक सिद्ध थे और राक्षस का नाम दयोट् था, इसलिए इस स्थन को दयोटसिद्ध के नाम से जाना जाता है।
पुजारियों की मानें तो इसी वजह से यहां चढ़ाए जाने वाले बकरे दयोट् के नाम होते हैं और प्रसाद के रूप में चढ़ाए जाने वाले रोट होते हैं। इसमें कहीं कोई जिक्र नहीं है कि इस गुफा तक महिलाओं का जाना वर्जित है। ऐसा माना जाता है कि बाबा बालकनाथ के ब्रहमचार्य सिद्ध होने के चलते स्वंय ही पुराने वक्त में महिलाओं ने गुफा तक न जाने की परंपरा बना दी।
मंदिर में महिलाओं को गुफा तक जाने की न तो कोई रोक-टोक थी और न है। वर्तमान में भी महिलाएं अपनी इच्छा से ही गुफा के सामने बने चौबारे से दर्शन कर रही हैं। इससे पहले भी महिलाएं गुफा के सामने बने चौबारे से ही दर्शन कर लौटती रही हैं। सदियों से चली इस प्रथा को वर्तमान में भी महिलाओं ने अपनी मर्जी से ही कायम रखा है। अब ये प्रथा इतिहास ही रह जाएगी, चूंकि महिलाओं ने नई रिवायत शुरू कर दी है।