1. Hindi News
  2. भारत
  3. राष्ट्रीय
  4. Women's Day Special: मिलिए, 70 की उम्र में 17 के जज्बे वाली मार्शल आर्ट गुरु से

Women's Day Special: मिलिए, 70 की उम्र में 17 के जज्बे वाली मार्शल आर्ट गुरु से

 Written By: IANS
 Published : Mar 07, 2017 08:52 pm IST,  Updated : Mar 07, 2017 08:53 pm IST

नई दिल्ली: आमतौर पर जिस उम्र को महिलाएं अपनी जिंदगी की सांझ मानकर हताश होकर बैठ जाती हैं, केरल की करीब 75 वर्षीय दिलेर और जुझारू मीनाक्षी अम्मा आज भी मार्शल आर्ट कलारीपयट्ट का निरंतर

amma meenakshi
amma meenakshi

पद्मश्री जीतने पर कैसा महसूस हो रहा है, इस सवाल पर दिग्गज मार्शल आर्ट गुरु मीनाक्षी अम्मा कहती हैं, "मैं यह नहीं कह सकती कि पद्म पुरस्कार जीतना मेरा सपना पूरे होने जैसा है, क्योंकि कभी भी मेरे दिल या दिमाग में ऐसा कोई पुरस्कार जीतने का कोई ख्याल नहीं आया। वह इसका श्रेय अपने दिवंगत पति राघवन गुरुक्कल को देती हैं, जो उन्हें कलारीपयट्ट सिखाने वाले उनके गुरु भी थे।"

मीनाक्षी अम्मा ने एक ऐसी कला से अपनी पहचान बनाई है, जो अधिक लोकप्रिय नहीं है। सात साल की उम्र से इस कला का प्रशिक्षण हासिल करने वाली मीनाक्षी अम्मा बताती हैं कि आमतौर पर लड़कियां किशोरवय उम्र में प्रवेश करते ही इस मार्शल आर्ट का अभ्यास छोड़ देती हैं, लेकिन अपने पिता की प्रेरणा से उन्होंने इस विधा का अभ्यास जारी रखा और वह इससे ताउम्र जुड़ी रहना चाहती हैं।

आज उन्हें 'उन्नीयार्चा' (उत्तरी मालाबार के प्राचीन गाथागीत 'वड़क्कन पट्टकल' में उल्लिखित प्रसिद्ध पौराणिक योद्धा और नायिका), 'पद्मश्री मीनाक्षी' और 'ग्रैनी विद ए स्वॉर्ड' जैसे कई नामों से बुलाया जाता है, लेकिन वह खुद किस नाम से पहचानी जाना चाहती हैं, इस सवाल पर वह कहती हैं, "मेरा वजूद आज भी वही है और मुझे आज भी खुद को मीनाक्षी अम्मा या अम्मा मां कहलाना ही ज्यादा पसंद है।"

आज जब किसी भी कला को सिखाने के लिए मोटी फीस वसूलना आम हो गया है, कलारी संगम में कलारीपयट्ट सिखाने के लिए कोई फीस नहीं ली जाती और छात्र गुरुदक्षिणा के रूप में अपनी क्षमता और इच्छानुसार कुछ भी दे सकते हैं। मीनाक्षी अम्मा बताती हैं कि 1949 में शरू हुई यह परंपरा आज भी जारी है।

कलारीपयट्ट ताइची और कुंगफू जैसे अन्य मार्शल आर्ट्स से कैसे अलग हैं, इस बारे में मीनाक्षी अम्मा कहती हैं, "एक किंवदंती के अनुसार कुंगफू और अन्य मार्शल आर्ट्स की उत्पत्ति कलारीपयट्ट से हुई है। यह भले ही मात्र एक किंवदंती हो, लेकिन मेरी नजर में यह विधा केवल वार करने की ही कला नहीं है, बल्कि इसमें आप लड़ने के साथ ही खुद को बचाने और इसमें चोटिल होने पर अपना इलाज करना भी सीखते हैं।"

वह कहती हैं, "कलारीपयट्ट की एक शिष्या और फिर एक प्रशिक्षक की भूमिका से लेकर इस मार्शल आर्ट विधा के लिए पद्मश्री हासिल करने तक की उनकी यह यात्रा आसान नहीं रही, लेकिन परिवार के साथ और मेरे छात्रों ने मेरी इस यात्रा को यादगार बना दिया है।"

इस कला के लिए पहचान मिलने और पद्मश्री के रूप में सम्मान मिलने पर मीनाक्षी अम्मा कहती हैं, "मैं खुद को धन्य समझती हूं और यह पुरस्कार हर लड़की और हर महिला को समर्पित करती हूं, उन्हें यह बताने के लिए कि वे जिंदगी में जो चाहे हासिल कर सकती हैं। साथ ही मैं इसे सभी कलारीपयट्ट गुरुक्कलों को भी समर्पित करना चाहती हूं, जिन्होंने बिना रुके और बिना थके मार्शल आर्ट की इस विधा को जीवित रखा है।

Advertisement

India TV हिंदी न्यूज़ के साथ रहें हर दिन अपडेट, पाएं देश और दुनिया की हर बड़ी खबर। National से जुड़ी लेटेस्ट खबरों के लिए अभी विज़िट करें भारत