Friday, February 13, 2026
Advertisement
  1. Hindi News
  2. भारत
  3. राष्ट्रीय
  4. हिंदी दिवस 2024: ये कविताएं आज भी देती हैं जिंदगी को एक नया आयाम

हिंदी दिवस 2024: ये कविताएं आज भी देती हैं जिंदगी को एक नया आयाम

Written By: Rituraj Tripathi @riturajfbd Published : Sep 14, 2024 07:37 am IST, Updated : Sep 14, 2024 07:37 am IST

14 सितंबर को राष्ट्रीय हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाता है। ऐसे में हम आपको कुछ सुप्रसिद्ध कविताएं और उनके कवि के बारे में बता रहे हैं, जो आज के दौर में भी लोगों की पसंद बने हुए हैं।

Hindi Diwas- India TV Hindi
Image Source : INDIA TV हिंदी दिवस

नई दिल्ली: हर साल 14 सितंबर को राष्ट्रीय हिंदी दिवस मनाया जाता है। 14 सितंबर, 1949 के दिन ही हिंदी को भारत की राजभाषा का दर्जा दिया गया था। इसीलिए हर साल 14 सितंबर का दिन हिंदी दिवस के रूप में मनाते हैं। आज के दिन हम उन कविताओं को याद कर रहे हैं, जो युवाओं के बीच वर्तमान समय में भी लोकप्रिय हैं। 

सोहनलाल द्विवेदी की कविता: कोशिश करने वालों की हार नहीं होती

लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती

कोशिश करने वालों की हार नहीं होती।

नन्हीं चींटी जब दाना लेकर चलती है
चढ़ती दीवारों पर, सौ बार फिसलती है।
मन का विश्वास रगों में साहस भरता है
चढ़कर गिरना, गिरकर चढ़ना न अखरता है।
आख़िर उसकी मेहनत बेकार नहीं होती
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती।

डुबकियां सिंधु में गोताखोर लगाता है
जा जा कर खाली हाथ लौटकर आता है।
मिलते नहीं सहज ही मोती गहरे पानी में
बढ़ता दुगना उत्साह इसी हैरानी में।
मुट्ठी उसकी खाली हर बार नहीं होती
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती।

असफलता एक चुनौती है, स्वीकार करो
क्या कमी रह गई, देखो और सुधार करो।
जब तक न सफल हो, नींद चैन को त्यागो तुम
संघर्ष का मैदान छोड़ मत भागो तुम।
कुछ किये बिना ही जय जय कार नहीं होती
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती।

महादेवी वर्मा की कविता: मधुर-मधुर मेरे दीपक जल

मधुर-मधुर मेरे दीपक जल।
युग-युग प्रतिदिन प्रतिक्षण प्रतिपल
प्रियतम का पथ आलोकित कर।

सौरभ फैला विपुल धूप बन
मृदुल मोम-सा घुल रे, मृदु-तन।
दे प्रकाश का सिन्धु अपरिमित,
तेरे जीवन का अणु गल-गल
पुलक-पुलक मेरे दीपक जल।

तारे शीतल कोमल नूतन
माँग रहे तुझसे ज्वाला कण।
विश्व-शलभ सिर धुन कहता मैं
हाय, न जल पाया तुझमें मिल।
सिहर-सिहर मेरे दीपक जल।

जलते नभ में देख असंख्यक
स्नेह-हीन नित कितने दीपक।
जलमय सागर का उर जलता
विद्युत ले घिरता है बादल।
विहंस-विहंस मेरे दीपक जल।

द्रुम के अंग हरित कोमलतम
ज्वाला को करते हृदयंगम।
वसुधा के जड़ अन्तर में भी
बन्दी है तापों की हलचल।
बिखर-बिखर मेरे दीपक जल।

मेरे निस्वासों से द्रुततर,
सुभग न तू बुझने का भय कर।
मैं अंचल की ओट किये हूँ।
अपनी मृदु पलकों से चंचल
सहज-सहज मेरे दीपक जल।

सीमा ही लघुता का बन्धन
है अनादि तू मत घड़ियाँ गिन।
मैं दृग के अक्षय कोषों से
तुझमें भरती हूँ आँसू-जल।
सहज-सहज मेरे दीपक जल।

तुम असीम तेरा प्रकाश चिर
खेलेंगे नव खेल निरन्तर।
तम के अणु-अणु में विद्युत-सा
अमिट चित्र अंकित करता चल।
सरल-सरल मेरे दीपक जल।

तू जल-जल जितना होता क्षय,
यह समीप आता छलनामय।
मधुर मिलन में मिट जाना तू
उसकी उज्जवल स्मित में घुल खिल।
मंदिर-मंदिर मेरे दीपक जल
प्रियतम का पथ आलोकित कर।

हरिवंश राय बच्चन की कविता- अग्निपथ

वृक्ष हों भले खड़े,
हों घने हों बड़े,
एक पत्र छांह भी,
मांग मत, मांग मत, मांग मत,
अग्निपथ अग्निपथ अग्निपथ।

तू न थकेगा कभी,
तू न रुकेगा कभी,
तू न मुड़ेगा कभी,
कर शपथ, कर शपथ, कर शपथ,
अग्निपथ अग्निपथ अग्निपथ।

यह महान दृश्य है,
चल रहा मनुष्य है,
अश्रु श्वेत रक्त से,
लथपथ लथपथ लथपथ,
अग्निपथ अग्निपथ अग्निपथ।

माखनलाल चतुर्वेदी की कविता- पुष्प की अभिलाषा

चाह नहीं, मैं सुरबाला के गहनों में गूँथा जाऊँ।
चाह नहीं, प्रेमी माला में बिंध प्यारी को ललचाऊँ॥
चाह नहीं, सम्राटों के शव पर, हे हरि, डाला जाऊँ।
चाह नहीं, देवों के सिर पर चढूँ, भाग्य पर इठलाऊँ॥

मुझे तोड़ लेना वनमाली।
उस पथ में देना तुम फेंक॥
मातृ भूमि पर शीश चढ़ाने।
जिस पथ जावें वीर अनेक॥

रामधारी सिंह दिनकर की कविता: सिंहासन खाली करो कि जनता आती है

सदियों की ठंढी-बुझी राख सुगबुगा उठी,
मिट्टी सोने का ताज पहन इठलाती है।
दो राह,समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो,
सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।

जनता? हां, मिट्टी की अबोध मूरतें वही,
जाडे-पाले की कसक सदा सहनेवाली।
जब अंग-अंग में लगे सांप हो चुस रहे
तब भी न कभी मुंह खोल दर्द कहनेवाली।

जनता? हां, लंबी-बड़ी जीभ की वही कसम,
जनता सचमुच ही, बड़ी वेदना सहती है।
सो ठीक मगर, आखिर इस पर जनमत क्या है?
है प्रश्न गूढ़ जनता इस पर क्या कहती है?

मानो जनता ही फूल जिसे अहसास नहीं,
जब चाहो तभी उतार सजा लो दोनों में।
अथवा कोई दूधमुंही जिसे बहलाने के
जन्तर-मन्तर सीमित हों चार खिलौनों में।

लेकिन होता भूडोल, बवंडर उठते हैं,
जनता जब कोपाकुल हो भृकुटि चढाती है।
दो राह, समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो,
सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।

हुंकारों से महलों की नींव उखड़ जाती,
सांसों के बल से ताज हवा में उड़ता है।
जनता की रोके राह,समय में ताव कहां?
वह जिधर चाहती,काल उधर ही मुड़ता है।

अब्दों, शताब्दियों, सहस्त्राब्द का अंधकार
बीता गवाक्ष अंबर के दहके जाते हैं।
यह और नहीं कोई,जनता के स्वप्न अजय
चीरते तिमिर का वक्ष उमड़ते जाते हैं।

सब से विराट जनतंत्र जगत का आ पहुंचा,
तैंतीस कोटि-हित सिंहासन तय करो।
अभिषेक आज राजा का नहीं,प्रजा का है,
तैंतीस कोटि जनता के सिर पर मुकुट धरो।

आरती लिये तू किसे ढूंढता है मूरख,
मन्दिरों, राजप्रासादों में, तहखानों में?
देवता कहीं सड़कों पर गिट्टी तोड़ रहे,
देवता मिलेंगे खेतों में, खलिहानों में।

फावड़े और हल राजदण्ड बनने को हैं,
धूसरता सोने से श्रृंगार सजाती है।
दो राह,समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो,
सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।

गोपाल दास नीरज़ की कविता: जितना कम सामान रहेगा

जितना कम सामान रहेगा
उतना सफ़र आसान रहेगा

जितनी भारी गठरी होगी
उतना तू हैरान रहेगा

उससे मिलना नामुमक़िन है
जब तक ख़ुद का ध्यान रहेगा

हाथ मिलें और दिल न मिलें
ऐसे में नुक़सान रहेगा

जब तक मन्दिर और मस्जिद हैं
मुश्क़िल में इन्सान रहेगा

‘नीरज’ तो कल यहाँ न होगा
उसका गीत-विधान रहेगा

दुष्यंत कुमार की कविता: तुम्हारे पाँव के नीचे कोई ज़मीन नहीं

तुम्हारे पाँव के नीचे कोई ज़मीन नहीं
कमाल ये है कि फिर भी तुम्हें यक़ीन नहीं

मैं बेपनाह अँधेरों को सुब्ह कैसे कहूँ
मैं इन नज़ारों का अँधा तमाशबीन नहीं

तेरी ज़ुबान है झूठी ज्म्हूरियत की तरह
तू एक ज़लील-सी गाली से बेहतरीन नहीं

तुम्हीं से प्यार जतायें तुम्हीं को खा जाएँ
अदीब यों तो सियासी हैं पर कमीन नहीं

तुझे क़सम है ख़ुदी को बहुत हलाक न कर
तु इस मशीन का पुर्ज़ा है तू मशीन नहीं

बहुत मशहूर है आएँ ज़रूर आप यहाँ
ये मुल्क देखने लायक़ तो है हसीन नहीं

ज़रा-सा तौर-तरीक़ों में हेर-फेर करो
तुम्हारे हाथ में कालर हो, आस्तीन नहीं

सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की कविता: अक्सर एक गन्ध

अक्सर एक गन्ध
मेरे पास से गुज़र जाती है,
अक्सर एक नदी
मेरे सामने भर जाती है,
अक्सर एक नाव
आकर तट से टकराती है,
अक्सर एक लीक
दूर पार से बुलाती है ।
मैं जहाँ होता हूँ
वहीं पर बैठ जाता हूँ,
अक्सर एक प्रतिमा
धूल में बन जाती है ।

अक्सर चाँद जेब में
पड़ा हुआ मिलता है,
सूरज को गिलहरी
पेड़ पर बैठी खाती है,
अक्सर दुनिया
मटर का दाना हो जाती है,
एक हथेली पर
पूरी बस जाती है।
मैं जहाँ होता हूँ
वहाँ से उठ जाता हूँ,
अक्सर रात चींटी-सी
रेंगती हुई आती है।

अक्सर एक हँसी
ठंडी हवा-सी चलती है,
अक्सर एक दृष्टि
कनटोप-सा लगाती है,
अक्सर एक बात
पर्वत-सी खड़ी होती है,
अक्सर एक ख़ामोशी
मुझे कपड़े पहनाती है।
मैं जहाँ होता हूँ
वहाँ से चल पड़ता हूँ,
अक्सर एक व्यथा
यात्रा बन जाती है।

अदम गोंडवी की कविता: ग़ज़ल को ले चलो अब गाँव के दिलकश नज़ारों में

ग़ज़ल को ले चलो अब गाँव के दिलकश नज़ारों में
मुसल्सल फ़न का दम घुटता है इन अदबी इदारों में

न इन में वो कशिश होगी , न बू होगी , न रआनाई
खिलेंगे फूल बेशक लॉन की लम्बी कतारों में

अदीबो ! ठोस धरती की सतह पर लौट भी आओ
मुलम्मे के सिवा क्या है फ़लक़ के चाँद-तारों में

रहे मुफ़लिस गुज़रते बे-यक़ीनी के तजरबे से
बदल देंगे ये इन महलों की रंगीनी मज़ारों में

कहीं पर भुखमरी की धूप तीखी हो गई शायद
जो है संगीन के साये की चर्चा इश्तहारों में.

Latest India News

Google पर इंडिया टीवी को अपना पसंदीदा न्यूज सोर्स बनाने के लिए यहां
क्लिक करें

India TV हिंदी न्यूज़ के साथ रहें हर दिन अपडेट, पाएं देश और दुनिया की हर बड़ी खबर। National से जुड़ी लेटेस्ट खबरों के लिए अभी विज़िट करें भारत

Advertisement
Advertisement
Advertisement