नई दिल्ली: भारत मौसम विज्ञान विभाग ने इस साल देश में सामान्य से कम मानसूनी बारिश होने की आशंका जताई है। मौसम विभाग का कहना है कि जून से सितंबर के बीच होने वाली कुल बारिश लंबी अवधि के औसत का 92% (±5%) रहने की संभावना है। यह अनुमान 1971 से 2020 तक के औसत (87 सेमी) पर आधारित है।
IMD के अनुसार, अप्रैल से जून तक स्थिति तटस्थ रहेगी, लेकिन मानसून के दौरान अल-नीनो के सक्रिय और मजबूत होने की प्रबल संभावना है। अल-नीनो की स्थिति आमतौर पर भारतीय मानसून को कमजोर करती है और गर्मी बढ़ाती है।
कहां ज्यादा और कहां कम बरसेगा पानी?
- उत्तर भारत के मैदानी इलाके (गंगा के क्षेत्र), पहाड़ी क्षेत्र, मध्य भारत का बड़ा हिस्सा और पश्चिम भारत के कुछ इलाकों में सूखा जैसे हालात बन सकते हैं।
- पूर्वोत्तर भारत, उत्तर-पश्चिम के कुछ हिस्से और दक्षिण प्रायद्वीपीय भारत के चुनिंदा क्षेत्रों में बारिश सामान्य से बेहतर रह सकती है।
- वर्तमान में हिंद महासागर द्विध्रुव तटस्थ है और यूरेशिया का स्नो कवर कम रहा है, जो मानसून के विकसित होने के लिए सकारात्मक संकेत हैं।
अर्थव्यवस्था पर दोहरी मार
- कम बारिश से खरीफ फसलों (धान, दाल, सब्जियां) की बुवाई और उत्पादन प्रभावित हो सकता है। यदि उत्पादन घटता है, तो बाजार में दालों और सब्जियों की कीमतें बढ़ सकती हैं, जिससे आम आदमी का बजट बिगड़ सकता है।
- भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था काफी हद तक खेती पर निर्भर है। फसल खराब होने या पैदावार कम होने से किसानों की आय कम होगी। इसका सीधा असर ट्रैक्टर, टू-व्हीलर और FMCG उत्पादों की बिक्री पर पड़ेगा, क्योंकि गांवों से मांग कम हो जाएगी।
- कम बारिश की वजह से जलाशयों का जलस्तर गिर सकता है, जिससे न केवल सिंचाई, बल्कि पशुपालन और पीने के पानी की उपलब्धता पर भी दबाव बढ़ेगा।
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