नई दिल्ली: 22 अप्रैल 2025 को पहलगाम की बैसरन घाटी में पाक परस्त आतंकियों की कायराना करतूत से पूरे देश में गुस्से की लहर थी। आतंकियों के कायराना हमले में 25 भारतीय और एक नेपाली नागरिक की जान गई थी। इसके बाद शुरू हुआ था इस हमले को अंजाम देने वाले कायर आतंकियों की खोज का सिलसिला। ऑपरेशन ‘महादेव’ के तहत जांबाज़ स्पेशल फोर्सेज और राष्ट्रीय राइफल्स के जवानों ने 93 दिनों तक आतंकियों की खोज की और फिर उन्हें ढेर कर दिया। इंडिया टीवी की इस स्पेशल रिपोर्ट में पहली बार मिलिए ऑपरेशन ‘महादेव’ के जांबाज़ स्पेशल फोर्सेज और राष्ट्रीय राइफल्स के जवानों से जिन्होंने बैसरन में हुए कायराना आतंकी हमले में शामिल तीनों पाकिस्तानी आतंकियों को मार गिराया। उन्होंने 93 दिनों तक चले इस ऑपरेशन की पूरी कहानी बताई।
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सेनाा की 15 कोर ने संभाली कमान
22 अप्रैल 2025 को जब ये कायराना आतंकी हमला हुआ उसके बाद से ही भारतीय सेना की 15 कोर यानी कश्मीर को लीड करने वाली चिनार कोर पूरी तरीके से एक्टिव थी। कोर कमांडर के लिए इन आतंकियों को ढूंढ निकालना और उनको मार गिराना बहुत जरूरी था। लेकिन चुनौती इस बात की थी कि यहां पर 7000 फीट से लेकर 14000 और 15000 फीट की ऊंचाई वाले पहाड़ थे जो करीबन ढाई सौ किलोमीटर से ज्यादा में फैले हुए थे। अनंतनाग से लेकर डाची गांव तक यानी पूरे कश्मीर में दो अलग-अलग फोर्सेज किलो फोर्स और विक्टर फोर्स पूरी तरह से इस ऑपरेशन को अंजाम देने में लगी थी।

कई बार ऐसा भी लगा कि जैसे आतंकी कहीं बच तो नहीं निकले, भागने में कामयाब तो नहीं हुए, उनके ओवरग्राउंड वर्कर्स या फिर लोग उनको सहायता तो नहीं पहुंचा रहे। लेकिन भारतीय सेना और कश्मीर की आवाम ने यह सुनिश्चित किया कि उन तक कोई भी सहायता न पहुंचे और फिर उसके बाद ऑपरेशन शुरू हुआ। इस पूरे ऑपरेशन में जम्मू कश्मीर पुलिस, सीआरपीएफ और मल्टिपल एजेंसीज़ ने अहम रोल प्ले किया। चाहे तकनीकी जानकारी हो या फिर ह्यूमन इंटेलीजेंस, हर लेवल पर लोग एक्टिव रहे।
मासूमों को जस्टिस दिलाना प्राथमिकता
इंडिया टीवी ने एक्सक्लूसिवली भारतीय सेना की पंद्रहवीं कोर के कोर कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल प्रशांत श्रीवास्तव से बात की। उन्होंने बिल्कुल साफ कहा कि हमें उन मासूमों को जस्टिस दिलाना था जिन्होंने पाकिस्तानी आतंकियों ने जिनकी जान ली थी। सरकार ने भी सेना को फ्री हैंड दिया। आर्मी ने कहा कि एक मात्र ऑपरेशन किया जाएगा और उसके साथ ऑपरेशन सिंदूर भी शुरू हुआ।
सेना ने शुरू किया चुनौतीपूर्ण अभियान
लेफ्टिनेंट जनरल प्रशांत श्रीवास्तव जहां एक तरफ जहां बॉर्डर के दूसरी तरफ होने वाले टार्गेट्स को पूरी तरह से तैयार किए हुए थे वहीं दूसरी तरफ चुनौती इस बात की भी थी इन तीनों आतंकियों को ढूंढ निकाला जाए। इसीलिए ये बड़ा ऑपरेशन लॉन्च किया गया। ऑपरेशन में शामिल एक ऑफिसर ने बताया कि हम दिन-रात ऑपरेशन्स में लगे हुए थे। अनंतनाग से लेकर देची गांव तक लगातार पहाड़ों के ऊपर नदी-नालों में जंगलों में ऑपरेशन किया जा रहा था। हम धीरे-धीरे आगे बढ़ रहे थे और गुफाओं को क्लियर कर रहे थे। हर एक गुफा एक बड़ी चुनौती थी। वहीं बारिश का मौसम था क्योंकि जुलाई का महीना था। लगातार बारिश और मौसम में बदलाव हो रहा था। ऊपर की पहाड़ियों पर कुछ दिखाई नहीं दे रहा था। हम एक-एक एरिया को सेनिटाइज करते हुए आगे बढ़ रहे थे। इसी बीच पाकिस्तान के इन आतंकियों के द्वारा जो टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया जा रहा था, आधुनिक सेट के तौर पर जिसे अल्ट्रासेट कहते हैं, दरअसल उसने भी काम करना बंद कर दिया। क्योंकि उनको ये संदेह था कि भारतीय सेना उनके पीछे है इसमें जम्मू कश्मीर पुलिस, सीआरपीएफ और मल्टिपल एजेंसिज लगातार भारतीय सेना के ऑपरेशंस को सपोर्ट करने के लिए जानकारी दे रही थी। इसी बीच 28 जुलाई के लगभग उनको जानकारी मिली कि महादेव की पहाड़ियां जोकि डैची गांव से शुरू होकर अमरनाथ गुफा तक जाती है, उन सभी इलाकों में भारतीय सेना के जवान, स्पेशल फोर्सेज के जवान टॉप पर चढ़े हुए थे।

आतंकियों को संभलने तक का मौका नहीं दिया
इसी बीच वहां पर एक हलचल हुई। पहले लगा कि कोई सिविलियन तो नहीं है। लेकिन काले कपड़ों से आतंकियों की पुष्टी हो गई। दो आतंकवादी अपनी एक टैक्टिकल पोजीशन बनाकर बरसाती लगाकर नीचे बैठे हुए थे और एक पैदल चलते हुए आ रहा था। इसी बीच भारतीय सेना ने चारों तरफ घेराबंदी की। फिर जब यह बात पूरी तरह से पुष्ट हो गई कि ये वही आतंकी हैं जिन्होंने बैसरन घाटी में हमला किया था, फिर उसके बाद सेना ने एक्शन लिया और फिर इन्हें संभलने का मौका तक नहीं मिला। भारतीय सेना ने इस तरह से ऑपरेशन महादेव को अंजाम दिया।
93 दिनों का यह ऑपरेशन काफी चुनौतीपूर्ण था। इस दौरान कई उतार-चढ़ाव आए। कई बार ऐसा हुआ कि जानकारी मिली और जब तक सेना पहुंची तब तक आतंकी निकलने में कामयाब हो गए। चार-चार, पाच-पांच, सात-सात दिन तक लगातार बिना सोए ऑपरेशन चल रहा था। रसद पहुंचाना एक बड़ी चुनौती थी क्योंकि पहाड़ों पर पहुंचना बहुत मुश्किल था। एक तरफ जहां ऑपरेशन सिंदूर के जरिए पाकिस्तान की कमर टूटी तो दूसरी तरफ ऑपरेशन महादेव के जरिए असली बदला लिया गया। उन आतंकियों को जहन्नुम पहुंचा दिया गया जिन्होंने बैसरन घाटी में मासूमों की हत्या की थी।