1. Hindi News
  2. मध्य-प्रदेश
  3. चिकन प्रेमियों का 'ब्लैक डायमंड', कहां हुई कड़कनाथ मुर्गे की उत्पत्ति? सेहत के खजाने से होती है मोटी कमाई

चिकन प्रेमियों का 'ब्लैक डायमंड', कहां हुई कड़कनाथ मुर्गे की उत्पत्ति? सेहत के खजाने से होती है मोटी कमाई

 Written By: India TV MP Bureau Desk
 Published : Jun 08, 2026 02:58 pm IST,  Updated : Jun 08, 2026 02:58 pm IST

क्या आप भी कड़कनाथ मुर्गे के दीवाने हैं? अगर आपका जवाब हां हैं तो क्या आप जानते हैं कि कड़कनाथ मुर्गे की उत्पत्ति कहां हुई? चलिए आपको इस ब्लैक डायमंड के बारे में बताते हैं।

kadaknath murg- India TV Hindi
कड़कनाथ मुर्गा। Image Source : INDIA TV

जब भी नॉन-वेज के शौकीन या चिकन प्रेमी किसी रेस्टोरेंट या दुकान पर जाते हैं तो सबसे पहले उनके पास एक ही सवाल होता है कि भाई ये चिरन कौन सी क्वालिटी और वैराइटी का है? ज्यादातर सामने से जवाब में ब्रायलर और देसी चिकन के बारे में ही लोग बताते हैं, लेकिन कई बार इससे इतर एक और खास वैराइटी होती है। भारतीय पोल्ट्री बाजार में एक ऐसा ब्लैक डायमंड भी मौजूद है जिसकी दीवानगी लोगों के सिर चढ़कर बोलती है। हम बात कर रहे हैं कड़कनाथ मुर्गे की। पहली बार में किसी को भी यह सुनकर अजीब लग सकता है कि किसी मुर्गे का मांस, त्वचा और यहां तक कि उसकी हड्डियां भी पूरी तरह काली हो सकती हैं, लेकिन कड़कनाथ की यही सबसे बड़ी यूएसपी है। पूरे देश के नॉनवेज के शौकीनों के बीच इस खास किस्म की डिमांड दिन-ब-दिन तेजी से बढ़ रही है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि इन मुर्गों की उत्पत्ति कहां हुई है?

कहां हुई कड़कनाथ मुर्गे की उत्पत्ति?

इस अनोखे और जादुई मुर्गे के इतिहास की बात करें तो इसकी उत्पत्ति मुख्य रूप से मध्य प्रदेश के झाबुआ और धार जिलों से जुड़ी हुई है। इन जिलों के सुदूर आदिवासी अंचलों में सदियों से इस नस्ल को पाला जाता रहा है। स्थानीय भील और भिलाला जनजाति के परिवारों के जीवन और संस्कृति में कड़कनाथ हमेशा से रचा-बसा रहा है। स्थानीय लोग इसे बड़े चाव से 'काली मासी' भी कहते हैं, जिसका सीधा सा मतलब होता है काले मांस वाली मुर्गी। इसके पूरे शरीर और मांस का गहरा काला रंग इसमें पाए जाने वाले 'मेलेनिन' नाम के प्राकृतिक तत्व की अधिकता के कारण होता है, जो इसे दुनिया की दूसरी नस्लों से बिल्कुल जुदा बनाता है।

तीन अलग नस्लें और भौगोलिक पहचान

देखने में भले ही यह सिर्फ काले रंग का लगे, लेकिन कड़कनाथ की भी तीन अलग-अलग नस्लें पाई जाती हैं। इनमें पहली पूरी तरह से गहरा काला, दूसरी सुनहरा और तीसरी पेंसिलनुमा किस्म शामिल है। इन तीनों नस्लों का अंतर उनके पंखों की बनावट और बाहरी रंग-रूप से पता चलता है, हालांकि तीनों के औषधीय गुण और स्वाद में कोई फर्क नहीं होता। कड़कनाथ की सबसे बड़ी खूबी यह है कि यह बेहद कड़क जान होता है और किसी भी मौसम या कठिन परिस्थिति में आसानी से ढल जाता है। इसकी इसी विशेषता और झाबुआ क्षेत्र की इस अनमोल धरोहर को सहेजने के लिए भारत सरकार ने 30 जुलाई 2018 को कड़कनाथ के मांस को जीआई टैग की खास मान्यता दी थी। इतना ही नहीं, झाबुआ प्रशासन ने इसे अपने एक जिला एक उत्पाद योजना में भी शामिल किया है।

सेहत के खजाने से होती है मोटी कमाई

कड़कनाथ सिर्फ स्वाद के मामले में ही अव्वल नहीं है, बल्कि यह सेहत का एक बेहतरीन खजाना भी है। आम चिकन के मुकाबले इसके मांस में प्रोटीन की मात्रा बहुत ज्यादा होती है, जबकि फैट या चर्बी न के बराबर यानी ये लो-कोलेस्ट्रॉल होता है। यही वजह है कि डॉक्टर भी दिल के मरीजों, हाई ब्लड प्रेशर और डायबिटीज से पीड़ित लोगों को इसका सेवन करने की सलाह देते हैं। यह शरीर की इम्यूनिटी को बढ़ाने में भी मददगार साबित होता है। सेहत के लिए इतने फायदेमंद होने के कारण बाजार में इसकी कीमत आम चिकन से कई गुना ज्यादा होती है। कड़कनाथ की इसी भारी डिमांड और ऊंचे दामों की वजह से देश भर के किसान अब इसके पालन की तरफ कदम बढ़ा रहे हैं, जिससे ग्रामीण इलाकों में पोल्ट्री फार्मिंग के जरिए लोग बंपर मुनाफा कमा रहे हैं। कहा जाता है कि इसकी फार्मिंग करने वाले लोगों को लाखों का मुनाफा होता है। कड़कनाथ मुर्गे की कीमत ₹400 से ₹800 प्रति किलोग्राम से लेकर ₹1000 रुपये प्रति किलोग्राम तक होती है।

ये भी पढ़ें: 38 साल की उम्र में फेमस सिंगर पेप्सी शर्मा का निधन, हार्ट अटैक बना काल

Advertisement

India TV हिंदी न्यूज़ के साथ रहें हर दिन अपडेट, पाएं देश और दुनिया की हर बड़ी खबर। मध्य-प्रदेश से जुड़ी लेटेस्ट खबरों के लिए अभी विज़िट करें।