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मजबूरी या कोई चाल? बेस मॉडल में भी प्रीमियम फीचर्स! क्यों कार कंपनियां कर रहीं महंगे ऐड-ऑन्स की बारिश

 Edited By: Shivendra Singh
 Published : Nov 30, 2025 09:41 am IST,  Updated : Nov 30, 2025 09:41 am IST

भारतीय ऑटो मार्केट में अब फीचर्स की होड़ ने नया रूप ले लिया है। पहले जहां पैनोरामिक सनरूफ, वेंटिलेटेड सीट्स, वायरलेस चार्जिंग, वॉइस कमांड और रेन-सेंसिंग वाइपर्स जैसी सुविधाएं केवल टॉप वैरिएंट्स में मिलती थीं, वहीं अब इन्हें एंट्री-लेवल या बेस मॉडल में भी शामिल किया जाने लगा है।

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ऑटो कंपनियों का नया दांव! Image Source : OFFICIAL WEBSITE

भारतीय कार बाजार में इन दिनों एक अजीब ट्रेंड देखने को मिल रहा है। लोग फीचर्स का इस्तेमाल करें या न करें, मगर अगर कोई फीचर कार में नहीं हो, तो वह मॉडल खरीदारी की लिस्ट से तुरंत आउट हो जाता है। यही वजह है कि अब ऑटो कंपनियां बेस मॉडल में भी वे प्रीमियम फीचर्स डाल रही हैं, जिन्हें पहले सिर्फ टॉप वैरिएंट में ही देखा जाता था। सवाल यह है कि क्या यह कंपनियों की मजबूरी है या फिर एक नई मार्केटिंग चाल?

देश के कार बाजार अब इतना कॉम्पिटिशन हो गया है कि अगर किसी कार में कोई जरूरी या लोकप्रिय फीचर न हो, तो उसकी बिक्री तुरंत प्रभावित हो सकती है। इसे ही एब्सेंस पेनल्टी कहा जाता है। टाटा की नई Sierra SUV इसका अच्छा उदाहरण है, जिसके बेस मॉडल में भी सनरूफ, एडवांस्ड कनेक्टिविटी और प्रीमियम इंटीरियर जैसे फीचर्स दिए गए हैं। कंपनियों का कहना है कि अगर आज कोई कार बिना ऐसे फीचर्स लॉन्च होती है, तो ग्राहक उसे तुरंत अपनी खरीदारी लिस्ट से बाहर कर देते हैं।

कार खरीदारों की बदल रही मानसिकता

दरअसल, भारत में कार खरीदने वालों की मानसिकता तेजी से बदल रही है। ग्राहक भले ही किसी फीचर का इस्तेमाल 5% से ज्यादा न करें, लेकिन अगर वह फीचर नहीं है, तो कार खरीदने का फैसला भी नहीं करते। एक बड़े कार डीलर का कहना है कि लोग वेंटिलेटेड सीट्स शायद साल में दो बार इस्तेमाल करें, मगर अगर कार में नहीं हो तो वो मॉडल तुरंत बाहर कर देते हैं।

क्या कहता है डेटा

जाटो डायनेमिक्स के डेटा के मुताबिक, जब किसी सेगमेंट की 40% कारों में कोई फीचर आने लगता है, तो बाकी मॉडल में उसकी अनुपस्थिति से बिक्री पर 18-22% तक की गिरावट देखी जाती है। यानी ग्राहक कार चुनते नहीं हैं, बल्कि उन कारों को छोड़ देते हैं जिनमें फीचर कम हैं।

कंपनियों की दुविधा

Hyundai और Kia इस ट्रेंड के सबसे बड़े ड्राइवर रहे हैं। इन कंपनियों ने मिड-रेंज वैरिएंट में प्रीमियम फीचर्स जोड़कर बाकी खिलाड़ियों पर दबाव बढ़ा दिया। नतीजा यह कि अगर कोई कॉम्पिटिटर फीचर मैच नहीं करता, तो वह खरीदारों की शॉर्टलिस्ट से बाहर हो जाता है। लेकिन दूसरी तरफ यह कार कंपनियों के लिए एक बड़ी दुविधा भी बन गया है। अगर फीचर्स जोड़ें तो कीमत बढ़ती है और मार्जिन घटता है। वहीं, अगर फीचर न जोड़ें तो बिक्री गिरने का खतरा बढ़ जाता है। यह FOMO (Fear of Missing Out) यानी कुछ छूट जाने का डर अब कार खरीदने वालों की नई सोच बन गया है। इसी वजह से कंपनियों को हर नई कार में फीचर्स बढ़ाने पड़ रहे हैं। इसका सीधा असर उनकी प्लानिंग और नए मॉडल लॉन्च करने की रणनीति पर पड़ रहा है।

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