भारत की ऑटो इंडस्ट्री में एक बड़ा नीतिगत झटका लगा है। सरकार ने आगामी फ्यूल एफिशिएंसी नियमों से जुड़ी उस रियायत को हटा लिया है, जो छोटी और हल्की पेट्रोल कारों को दी जाने वाली थी। इस फैसले के बाद कार कंपनियों के बीच लंबे समय से चल रही बहस पर विराम तो लगा है, लेकिन इंडस्ट्री में हलचल तेज हो गई है। खासतौर पर अब हर ऑटोमेकर को इलेक्ट्रिक और हाइब्रिड वाहनों पर ज्यादा गंभीरता से दांव लगाना पड़ेगा।
सरकार के सितंबर में जारी ड्राफ्ट में 909 किलोग्राम या उससे कम वजन वाली पेट्रोल कारों को फ्यूल एफिशिएंसी नियमों में ढील देने का प्रस्ताव था। माना जा रहा था कि इस छूट का सबसे ज्यादा फायदा मारुति सुजुकी को मिलेगा, जिसकी स्मॉल कार सेगमेंट में करीब 95% हिस्सेदारी है। इसी को लेकर टाटा मोटर्स और महिंद्रा एंड महिंद्रा समेत कई कंपनियों ने आपत्ति जताई थी। उनका कहना था कि यह नियम प्रतिस्पर्धा को असंतुलित कर देगा और सिर्फ एक कंपनी को फायदा पहुंचाएगा। अब पावर मिनिस्ट्री ने इस प्रस्तावित छूट को पूरी तरह हटा दिया है और नियमों को और सख्त बना दिया है।
नए नियमों में क्या बदला?
संशोधित ड्राफ्ट के मुताबिक, अब वाहन के वजन के आधार पर जरूरत से ज्यादा राहत नहीं दी जाएगी। पहले भारी गाड़ियों को ज्यादा ढील मिल जाती थी, लेकिन अब इस ओवर-कंपनसेशन को कम कर दिया गया है। इसका मतलब है कि टाटा, महिंद्रा जैसी कंपनियों को भी अपने वाहनों की वास्तविक ईंधन दक्षता में सुधार करना होगा। सरकार का कहना है कि नए नियम “रियल-वर्ल्ड एफिशिएंसी” बढ़ाने के लिए बनाए गए हैं, न कि सिर्फ कागजी आंकड़ों के लिए।
इलेक्ट्रिक और हाइब्रिड पर बढ़ेगा जोर
ये नए कॉरपोरेट एवरेज फ्यूल एफिशिएंसी (CAFE) नियम अप्रैल 2027 से लागू होंगे और अगले पांच साल तक प्रभावी रहेंगे। इनके तहत ऑटो कंपनियों को अपनी पूरी कार फ्लीट के औसत उत्सर्जन को कम करना होगा। सरकार इलेक्ट्रिक और प्लग-इन हाइब्रिड कारों को बढ़ावा देने के लिए क्रेडिट सिस्टम भी ला रही है। जो कंपनियां ज्यादा ईवी और हाइब्रिड बेचेंगी, उन्हें अतिरिक्त लाभ मिलेगा। वहीं नियमों का पालन न करने पर प्रति कार करीब 550 डॉलर तक का जुर्माना लग सकता है।
क्यों जरूरी था यह बदलाव?
भारत में कुल ऊर्जा खपत का करीब 12% हिस्सा ट्रांसपोर्ट सेक्टर से आता है और इसमें यात्री वाहन सबसे बड़ा योगदान देते हैं। सरकार का लक्ष्य मार्च 2032 तक औसत कार उत्सर्जन को 114 ग्राम प्रति किमी से घटाकर 100 ग्राम प्रति किमी तक लाना है। अगर ईवी की हिस्सेदारी 11% तक पहुंचती है, तो यह आंकड़ा 76 ग्राम प्रति किमी तक भी जा सकता है।
ऑटो इंडस्ट्री के लिए आगे की राह
इस फैसले के बाद साफ है कि सिर्फ छोटी या हल्की कारों के सहारे अब कोई कंपनी नियमों से बच नहीं पाएगी। आने वाले वर्षों में इलेक्ट्रिक, हाइब्रिड और वैकल्पिक ईंधन वाली गाड़ियां ही ऑटो इंडस्ट्री की दिशा तय करेंगी। छोटी कारों की ‘मौज’ खत्म होने के साथ, अब असली मुकाबला तकनीक और टिकाऊ मोबिलिटी पर होगा।



































