Vidyarambh Sanskar 2025: हिंदू धर्म में बच्चे के जन्म लेने से लेकर मृत्यु तक कई संस्कारों का पालन किया जाता है। इन्हीं में से एक होता है विद्यारंभ संस्कार। यह वह शुभ संस्कार होता है, जब बालक-बालिकाओं की शिक्षण की शुरुआत की जाती है। ऐसे में भारतीय संस्कृति में यह संस्कार विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना गया है, जिसे अक्षरा अभ्यासम् भी कहा जाता है। वहीं, इस उत्सव को दक्षिण भारतीय राज्यों जैसे कर्नाटक और केरल में 'एजुथिनिरुथु' नाम से भी जाना जाता है।
क्या है विद्यारंभ संस्कार?
भारतीय हिंदू परिवारों में सीखने की प्रक्रिया की शुरुआत के लिए निभाई जाने वाली परंपरा है 'विद्यारंभम संस्कार'। यह अनुष्ठान विजयादशमी पर्व पर संपन्न किया जाता है। इस शुभ दिन पर 4 से लेकर 5 साल के आयु के बच्चों को ज्ञान, संगीत, नृत्य और लोक कलाओं की विधा से परिचित कराने का विधान है। आश्विन माह के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि 1 अक्टूबर 2025 को शाम 7 बजकर 1 मिनट पर आरंभ होगी और 2 अक्टूबर 2025 को शाम 7 बजकर 10 मिनट पर समाप्त होगी।
विद्यारम्भ संस्कार के लिए शुभ मुहूर्त
विद्यारम्भ दिवस 2 अक्टूबर 2025, गुरुवार को मनाया जाएगा।
- ब्रह्म मुहूर्त- 04:14 एएम से 05:02 एएम
- प्रातः सन्ध्या- 04:38 एएम से 05:50 एएम
- अभिजित मुहूर्त- 11:23 एएम से 12:11 पीएम
- विजय मुहूर्त- 01:46 पीएम से 02:33 पीएम
- गोधूलि मुहूर्त- 05:44 पीएम से 06:08 पीएम
- सायाह्न सन्ध्या- 05:44 पीएम से 06:56 पीएम
- अमृत काल-11:01 पीएम से 12:38 एएम, अक्टूबर 03
- निशिता मुहूर्त- 11:23 पीएम से 12:11 एएम, अक्टूबर 03
- रवि योग- यह योग पूरे दिन रहेगा।
दक्षिण भारत में मनाया जाने वाला विशेष अनुष्ठान
भारतीय परंपरा में बच्चों की शिक्षा-दीक्षा शुरू करने के लिए एक विशेष अनुष्ठान करने का विधान है, जिसे विद्यारंभ संस्कार कहा जाता है। संस्कृत शब्द 'विद्या' का अर्थ है 'ज्ञान' और 'अरंभम' का अर्थ 'एक नई शुरुआत' होता है। विद्यारंभ संस्कार पर्व प्रमुख तौर पर दक्षिण भारत में बहुत ही धूमधाम से मनाया जाता है।
इस दिन बुद्धि के देवता गणेश और मां शारदा की पूजा की जाती है। इसके साथ ही अपने गुरुओं का आशीर्वाद लेकर उन्हें धन्यवाद स्वरूप 'गुरुदक्षिणा' दी जाती है। इसके अलावा लोग अपने बच्चों को शिक्षा की दुनिया से परिचित कराने के लिए मंदिरों में जाते हैं। केरल के 'थुंचन परम्बु मंदिर' और कर्नाटक के 'कोल्लूर मूकाम्बिका मंदिर' में होने वाला विद्यारंभ समारोह बहुत प्रसिद्ध है।
ऐसे किया जाता है विद्यारंभ अनुष्ठान
विद्यारंभ दिवस पर सुबह बच्चों को स्नान कराने के बाद, उन्हें पारंपरिक पोशाक पहनाई जाती है। इस दिन श्री विष्णु, मां सरस्वती और भगवान गणेश का पूजन किया जाता है। इसके बाद सीखने की प्रक्रिया का शुभारंभ होता है। इसे विद्यारंभ अनुष्ठान कहा जाता है, जो किसी गुरु या पुजारी द्वारा किया जाता है। इसमें बच्चों से सबसे पहले रेत या चावल के दानों पर 'ओम ह्री श्री गणपतये नमः' मंत्र लिखवाया जाता है। ऐसी मान्यता है कि विद्यारम्भ के समय रेत पर लिखना अभ्यास और चावल के दानों पर लिखना ज्ञान प्राप्ति का प्रतीक होता है।
इसके बाद गुरु इसी मंत्र 'ओम ह्री श्री गणपतये नमः'को बच्चे की जीभ पर सोने के तार से लिखते हैं। ऐसा माना जाता है कि शिक्षा-दीक्षा शुरू करने से पहले बच्चे की जीभ पर सोने से मंत्र लिखने से मां सरस्वती की विशेष कृपा प्राप्त होती है। यह अनुष्ठान पूरा होने के बाद उस विद्यार्थी द्वारा अन्य बच्चों में शिक्षा से जुड़ी भेंट जैसे स्लेट, पेंसिल आदि देने का विधान है।
(Disclaimer: यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। इंडिया टीवी एक भी बात की सत्यता का प्रमाण नहीं देता है।)
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