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Mysore Dasara: भारत के अन्य राज्यों से अलग है मैसूर का दशहरा, जानिए क्यों है इतना मशहूर

Written By: Arti Azad @Azadkeekalamse Published : Sep 30, 2025 07:19 pm IST, Updated : Sep 30, 2025 07:19 pm IST

Mysore Dussehra: मैसूर का दशहरा ऐतिहासिक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। यहां दशहरा में राम या रावण का कोई जिक्र नहीं होता, बल्कि इस पर्व का केंद्र चामुंडेश्वरी देवी होती हैं। जिसे देखने विदेशों से भी लाखों लोग आते हैं। आइए जानते हैं मैसूर के दशहरे के बारे में...

मैसूर का दशहरा- India TV Hindi
Image Source : AP मैसूर का दशहरा

Mysuru Dasara Celebration: आश्विन माह के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को विजयादशमी के नाम से जाना जाता है।  इस साल दशहरा पर्व 2 अक्टूबर, गुरुवार को मनाया जाएगा। यह त्योहार भारत की सदियों पुरानी सांस्कृतिक विरासत और 'बुराई पर अच्छाई की जीत' का प्रतीक है। देश के हर हिस्से में इसे अलग-अलग तरीके से मनाया जाता है। इस त्योहार को लेकर भारते के ज्यादातर राज्यों की अपनी अनूठी परंपराएं, जो इस पर्व को और भी भव्य और खास बनाते हैं। आज हम बात करेंगे मैसूर के दशहरे की। स्थानीय भाषा में दसरा भी कहते हैं। चलिए जानते हैं कि यहां खुशियों भरा दशहरा कैसे मनाया जाता है। 

अन्य राज्यों से अलग है मैसूर दसरा की धूम

मैसूर का दशहरा भारत के बाकी राज्यों में मनाए जाने वाले विजयादशमी के पर्व से बहुत अलग होता है, क्योंकि यहां न तो राम होते हैं और न ही रावण का पुतला जलाया जाता है। दरअसल, मैसूर में देवी चामुंडा के राक्षस महिसासुर का वध करने पर धूमधाम से दशहरा मनाया जाता है। इसलिए हर साल धूमधाम से मां की शोभायात्रा निकाली जाती है। 

क्यों मशहूर है मैसूर का दशहरा?

कर्नाटक का मैसूर दशहरा विश्व प्रसिद्ध है। यह महापर्व यहां 10 दिनों तक बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। इस दौरान मैसूर पैलेस की शोभा देखते ही बनती है, जिसे हजारों बल्बों से सजाया जाता है। दसवें दिन निकाली जानी वाली शोभायात्रा को 'जंबू सवारी' कहा जाता है। इस शोभा यात्रा में हाथियों, घोड़ों और विशेष रूप से सांस्कृतिक झांकियां प्रदर्शित की जाती है। सोने-चांदी से सजे हाथियों का काफिला 21 तोपों की सलामी के बाद मैसूर के राजमहल से निकलता है।

जगमगा उठती हैं मैसूर की सड़कें

दशहरे के उत्सव पर मैसूर की सड़कों पर पारंपरिक दशहरा शोभायात्रा निकाली जाती है। देवी चामुण्डेश्वरी की प्रतिमा को एक सुसज्जित हाथी की पीठ पर एक सुनहरे हौदा पर विराजमान किया जाता है। शोभायात्रा में नृत्य समूह, संगीत और ढोल-ढमाकों के साथ भव्य झांकी निकलती हैं। करीब 6 किलोमीटर लंबी इस शोभायात्रा की शुरुआत मैसूर पैलेस से होती है और बन्नि मन्डप पर समाप्त होती है। इस स्थान पर पहुंचने के बाद बन्नी/शमी के पेड़ का पूजन किया जाता है। 

कर्नाटक की सांस्कृतिक पहचान 

मैसूर के दशहरे का महत्व ऐतिहासिक है। दशहरा पर्व से पहले मैसूर महल और चामुंडी पहाड़ियों को लाखों बल्बों की रोशनी से सजाया जाता है। करीब 600 साल पुराना मैसूर का दशहरा देखने के लिए भारत ही नहीं विदेशों से भी लोग पहुंचते हैं। इस दौरान मैसूर पैलेस रोशनी से जगमगा उठता है। दस दिनों तक चलने वाला यह आयोजन दक्षिण भारतीय राज्य कर्नाटक की सांस्कृतिक पहचान को उजागर करता है।

(Disclaimer: यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। इंडिया टीवी एक भी बात की सत्यता का प्रमाण नहीं देता है।)

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