आषाढ़ संकष्टी गणेश चतुर्थी व्रत कथा के अनुसार, इस व्रत में भगवान गणेश के कृष्णपिङ्गल स्वरूप की पूजा की जाती है। जिसकी कथा अनुसार, द्वापर युग में महिष्मति नामक नगरी में महीजित नाम का राजा राज करता था। जो अपनी प्रजा का पुत्र की तरह पालन किया करता था। लेकिन उसकी कोई संतान नहीं थी जिसके कारण उसे धन-दौलत और वैभव अच्छा नहीं लगता था। वेदों में निसंतान लोगों का जीवन व्यर्थ माना गया है। कहते हैं यदि संतान विहीन व्यक्ति अपने पितरों को जल दान देता हैं तो उसके पितृ उस जल को गरम जल के रूप में ग्रहण करते हैं।
यही सोचकर राजा परेशान रहा करता था। उसने पुत्र प्राप्ति के लिए बहुत से उपाय किए लेकिन फिर भी उसे पु्त्र की प्राप्ति नहीं हुई। इन्हीं सब चीजों में उसकी जवानी ढल गई और उसका बुढ़ापा आ गया। तदनंतर राजा ने विद्वान ब्राह्मणों से परामर्श किया। उन्होंने कहा कि हे ब्राह्मणों और प्रजाजनों! हम तो संतानहीन रह गए, अब मेरी क्या गति होगी? मैंने जीवन में कभी कोई पाप नहीं किया। फिर भी मुझे पुत्र की प्राप्ति नहीं हुई। विद्वान् ब्राह्मणों ने कहा कि हे महाराज! आप परेशान न हों, हम कुछ ऐसा प्रयत्न करेंगे जिससे आपके वंश की वृद्धि हो। इस प्रकार कहकर सभी लोग इस समस्या का उपाय सोचने लगे। सभी प्रजा राजा की मनोकामना की पूर्ति के लिए ब्राह्मणों के साथ वन में चली गई।
वन में उन्हें एक श्रेष्ठ मुनि के दर्शन हुए। वे मुनि निराहार रहकर अपनी तपस्या में लीन थे। सब लोग उन तेजस्वी मुनि के पास गये और उनके समक्ष जाकर खड़े हो गये। उन लोगों ने मुनिराज से कहा। हे ब्रह्मऋषि हम लोगों के दुःख का कारण सुनिए। हे भगवन! आप कोई उपाय बतलाइये। महर्षि लोमेश ने पूछा सज्जनों! आप लोग यहां किस कारण से आए हैं? स्पष्ट रूप से कहिये। प्रजाजनों ने कहा हे मुनिवर! हमारे राजा का नाम महीजित है। जिन्होंने हम लोगों का संतान की तरह पालन पोषण किया है, परन्तु ऐसे महान राजा को आज तक संतान की प्राप्ति नहीं हुई।
हे महर्षि! कृप्या करके आप कोई ऐसी युक्ति बताइये जिससे राजा को संतान की प्राप्ति हो और उनका जीवन सुख से भर जाए। प्रजाजनों की बात सुनकर महर्षि लोमेश ने कहा हे सज्जनों! अब मैं तुम्हें एक ऐसे व्रत के बारे में बताऊंगा जो सारे संकटों का नाश कर सकता है। यह व्रत निसंतान को संतान और निर्धनों को धन देता है। अत: अगर आपके राजा आषाढ़ कृष्ण चतुर्थी का व्रत रखकर भगवान गणेश की विधिवत पूजा करें। साथ ही ब्राह्मण भोजन करावें और उन्हें वस्त्र दान करें। तो गणेश जी की कृपा से उन्हें पुत्र अवश्य प्राप्त होगा। महर्षि लोमश की यह बात सुनकर सभी लोग प्रसन्न होकर नगर में वापस लौट आये।
प्रजाजनों ने राजा को इस व्रत के बारे में बताया। जिसके बाद राजा ने श्रद्धापूर्वक गणेश चतुर्थी का व्रत किया। कुछ समय बाद रानी सुदक्षिणा गर्भवती हो गईं और उन्हें भगवान गणेश जी कृपा से सुन्दर और संस्कारी पुत्र प्राप्त हुआ। कहते हैं जो व्यक्ति इस व्रत को श्रद्धा पूर्वक करता है उसे समस्त सांसारिक सुख प्राप्त होते हैं।
(Disclaimer: यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। इंडिया टीवी एक भी बात की सत्यता का प्रमाण नहीं देता है।)
यह भी पढ़ें:
कृष्णपिंगल संकष्टी चतुर्थी पर करें ये खास उपाय, बदल जाएगी पूरे परिवार की तकदीर