धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, एक समय की बात है भगवान शिव और देवी पार्वती नारद मुनि के साथ पृथ्वी भ्रमण पर आए। संयोग से वह चैत्र मास की शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि थी। माता पार्वती ने भगवान शिव से अनुमति लेकर नदी में स्नान करने का निश्चय किया। स्नान के पश्चात माता पार्वती ने नदी के किनारे बालू से एक पार्थिव शिवलिंग बनाया और पूरी श्रद्धा एवं विधि-विधान के साथ उसका पूजन किया। पूजन में माता ने बालू से बने पदार्थों का भोग अर्पित किया और उसी में से थोड़े कणों को प्रसाद के रूप में ग्रहण किया।
पूजन के बाद उन्होंने विधिपूर्वक प्रदक्षिणा की और पूरे विधि विधान के साथ पूजा संपन्न की। माता पार्वती की भक्ति और समर्पण से भगवान शिव अत्यंत प्रसन्न हुए और उसी पार्थिव शिवलिंग से प्रकट होकर उन्हें वरदान दिया। भगवान शिव ने कहा कि इस दिन जो स्त्री उनका पूजन और माता पार्वती का व्रत करेगी, उसके पति को लंबी आयु और सुखमय वैवाहिक जीवन मिलेगा। साथ ही वह स्त्री अंततः मोक्ष को प्राप्त होगी। यह वरदान देकर भगवान शिव वहां से अंतर्ध्यान हो गए।
पूजा में समय लग जाने के कारण माता पार्वती लौटने में थोड़ी देर हो गईं। जब वे भगवान शिव के पास पहुंचीं, तो वहां देवर्षि नारद भी उपस्थित थे। भगवान शिव ने उनसे देरी का कारण पूछा। माता पार्वती ने विनम्रता से उत्तर दिया कि नदी किनारे उनके मायके के लोग मिल गए थे। उन्होंने आग्रह करके माता को दूध-भात ग्रहण करने और थोड़ी देर विश्राम करने को कहा।
भगवान शिव ने मुस्कुराते हुए कहा कि वे भी उस भोजन का स्वाद लेना चाहते हैं और तुरंत नदी की ओर चल पड़े। माता पार्वती मन ही मन चिंतित हो गईं और भगवान शिव से प्रार्थना करने लगीं कि वे उनकी प्रतिष्ठा और व्रत की रक्षा करें।
नदी तट पर पहुंचने पर माता पार्वती ने एक विशाल और भव्य महल देखा। महल में प्रवेश करने पर उनके भाई-भौजाई और कुटुम्ब जन वहां उपस्थित थे। उन्होंने भगवान शिव का भव्य सत्कार किया और उनकी स्तुति की। प्रसन्न होकर भगवान शिव वहां दो दिन तक रुके। तीसरे दिन माता पार्वती ने शिव जी से आग्रह किया कि अब उन्हें लौटना है, लेकिन शिव जी और अधिक समय रुके रहना चाहते थे। माता पार्वती ने अकेले ही वहां से प्रस्थान किया, और अंततः भगवान शिव देवर्षि नारद के साथ उनके पीछे-पीछे चल पड़े।
चलते-चलते भगवान शिव को याद आया कि उन्होंने अपनी माला वहीं छोड़ दी है। माता पार्वती माला लेने जा रही थीं, लेकिन शिव जी ने उन्हें रोकते हुए देवर्षि नारद को भेजा। नारद जी जब नदी किनारे पहुंचे, तो उन्होंने देखा कि वहां कोई महल नहीं है। जगह पर घना जंगल था, जिसमें कई हिंसक जानवर विचरण कर रहे थे। नारद जी यह देखकर आश्चर्यचकित रह गए।
तभी अचानक बिजली चमकी और नारद जी को एक वृक्ष पर भगवान शिव की माला लटकी दिखाई दी। उन्होंने माला उठाई और भगवान शिव को पूरी घटना सुनाई। नारद जी ने आश्चर्य व्यक्त किया कि यह कैसे संभव हुआ कि महल और लोग गायब होकर जंगल में बदल गए।
इस पर भगवान शिव मुस्कुराए और बोले कि यह उनकी नहीं, बल्कि माता पार्वती की लीला है। उन्होंने अपने पूजन और व्रत को गुप्त रखने के लिए यह मायावी दृश्य रचा। माता पार्वती ने विनम्रता से कहा कि यह सब उनकी नहीं, बल्कि भगवान शिव की कृपा से संभव हुआ।
देवर्षि नारद ने माता पार्वती की भक्ति और पतिव्रत धर्म की सराहना करते हुए कहा कि वे पतिव्रताओं में सर्वोत्तम हैं। उनके स्मरण मात्र से स्त्रियों को अटल सौभाग्य प्राप्त होता है। नारद जी ने आगे कहा कि गुप्त पूजन सामान्य पूजा से अधिक फलदायी होता है। जो महिलाएं अपने पति की भलाई और मंगलकामना के लिए गुप्त रूप से पूजा और व्रत करेंगी, उन्हें भगवान शिव का आशीर्वाद मिलेगा। इसी प्रकार जो कन्याएं यह व्रत करेंगी, उन्हें मनचाहा जीवनसाथी मिलेगा।