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इंडोनेशिया के 1000 साल पुराने प्रम्बानन मंदिर पहुंचे पीएम मोदी, क्या आप जानते हैं इस भव्य मंदिर का इतिहास?

 Published : Jul 08, 2026 11:55 am IST,  Updated : Jul 08, 2026 01:35 pm IST

प्रम्बानन मंदिर इंडोनेशिया के प्रमुख पर्यटन स्थलों में शामिल है। माना जाता है इस मंदिर का निर्माण 9वीं शताब्दी में मध्य जावा के संजया राजवंश द्वारा कराया गया था। मंदिर के प्रमुख देवता भगवान शिव हैं।

Majestic Prambanan Temple- India TV Hindi
क्या आप जानते हैं इंडोनेशिया के इस भव्य मंदिर का इतिहास? Image Source : CANVA

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 6 जुलाई से इंडोनेशिया के तीन दिवसीय दौरे पर हैं। इस दौरान बुधवार को उन्होंने इंडोनेशिया के प्रसिद्ध प्रम्बानन मंदिर के दर्शन किए। सदियों पुराने इस मंदिर को इंडोनेशिया का सबसे बड़ा और भव्य हिंदू मंदिर माना जाता है। भारत और इंडोनेशिया के बीच इस मंदिर परिसर के संरक्षण और जीर्णोद्धार को लेकर एक बड़ा समझौता हुआ है। जिसते तहत भारत इस ऐतिहासिक धरोहर को बचाने में इंडोनेशिया की मदद करेगा। बता दें इस मंदिर का इतिहास हजार साल पुराना है। कहा जाता है कि ये मंदिर कई सालों तक ज्वालामुखी की राख में दबा रहा। 19वीं सदी की शुरुआत में खोजकर्ताओं ने इसे दोबारा ढूंढा और 20वीं सदी में इसका जीर्णोद्धार शुरू हुआ। इस मंदिर को आज सनातनी वास्तुकला का सबसे बड़ा अजूबा माना जाता है। 

किसे समर्पित है ये हिंदू मंदिर?

जानकारी अनुसार, इंडोनेशिया में 10वीं सदी में बना ये भव्य मंदिर हिंदू धर्म के प्रमुख भगवान ब्रह्मा, विष्णु और महेश को समर्पित है। बता दें मूल रूप से यहां 240 मंदिरों का एक विशाल समूह था, जिसके केंद्र में 8 मुख्य मंदिर हैं। लेकिन इन मंदिरों में सबसे विशाल मंदिर भगवान शिव का है और भगवान शिव के मंदिर के बगल में भगवान ब्रह्मा और भगवान विष्णु के मंदिर स्थित हैं। इसके केंद्र में तीन मंदिरों की दीवारों पर रामायण को उकेरा गया है। 

किसने कराया था निर्माण

कहा जाता है कि इस मंदिर का निर्माण 9वीं शताब्दी में मध्य जावा के संजया राजवंश द्वारा कराया गया था। लेकिन निर्माण के कुछ ही दशकों बाद, 10वीं शताब्दी में एक भीषण ज्वालामुखी विस्फोट के कारण यह भव्य मंदिर ज्वालामुखी की राख और घने जंगलों के नीचे दफन हो गया। इसके बाद सदियों तक यह छिपा रहा और सिर्फ स्थानीय लोककथाओं में ही जीवित रहा। फिर 19वीं सदी की शुरुआत में यूरोपीय खोजकर्ताओं ने इसे ढूंढा और 20वीं सदी में इसका जीर्णोद्धार शुरू हुआ। 1953 में इंडोनेशिया के पहले राष्ट्रपति सुकर्णो ने मुख्य शिव मंदिर का उद्घाटन किया।

मंदिर की खासियत

इस मंदिर की सबसे बड़ी खासियत ये है कि इसे पत्थरों को बिना गारे आपस में जोड़कर बनाया गया है। आज यहां पुरातत्वविद 'एनास्टाइलोसिस' नामक तकनीक का उपयोग कर रहे हैं। इस तकनीक में किसी भी ढांचे को नए कंक्रीट से बदलने के बजाय उसके मैदान में बिखरे हुए असली पत्थरों को ही ढूंढकर उनसे मंदिर को दोबारा खड़ा किया जाता है। इस पूरे मंदिर परिसर को तीन हिस्सों यानी तीन लोकों में बांटा गया है। मंदिर का सबसे बाहरी हिस्सा इंसानों की भौतिक दुनिया को यानी भूर्लोक को दर्शाता है। मध्य का प्रांगण भुवर्लोक यानी उस आध्यात्मिक क्षेत्र का प्रतीक है जहां ध्यानमग्न आत्माएं रहती हैं। वहीं मंदिर का गर्भगृह देवताओं का निवास स्थान यानी स्वर्गलोक का प्रतीक है।

मंदिर का मुख्य आकर्षण

इस मंदिर परिसर के मुख्य मंदिर में भगवान शिव की दिव्य प्रतिमा स्थापित है। इसके अलावा यहां देवी दुर्गा, गणेश जी और महर्षि अगस्त्य की भी आकर्षक मूर्तियां हैं। स्थानीय लोककथाओं में यहां देवी दुर्गा की स्थापित मूर्ति को 'रोरो जोंगरांग' के नाम से जाना जाता है। मंदिर की दीवारों पर की गई नक्काशी भी आकर्षण का मुख्य केंद्र है। मंदिरों की दीवारों पर रामायण को इस तरह से उकेरा गया है जिससे कि भगवान राम की गाथा जीवंत प्रतीत होती है। 

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