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Laddu Gopal: क्या आप जानते हैं बाल कृष्ण का नाम लड्डू गोपाल क्यों पड़ा? जानिए इसके पीछे की चमत्कारी कथा

 Written By: Vineeta Mandal
 Published : Jun 03, 2026 05:59 pm IST,  Updated : Jun 03, 2026 06:12 pm IST

Laddu Gopal Story: आज हर घर में लड्डू गोपाल की पूजा की जाती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि जगत के पालनहार भगवान कृष्ण का नाम लड्डू गोपाल कैसे पड़ा। यहां पढ़िए लड्डू गोपाल उनके भक्त कु्ंभनदास की पौराणिक कथा।

लड्डू गोपाल- India TV Hindi
लड्डू गोपाल Image Source : PEXELS

Laddu Gopal Story: भगवान कृष्ण के बाल स्वरूप को लड्डू गोपाल कहते हैं। लड्डू गोपाल की सेवा लोग अपने बच्चों की तरह करते हैं। इनके खाने पीने, सोने और नहाने तक का ख्याल ठीक वैसे ही रखा जाता है जैसे एक छोटे बच्चे का। लेकिन हिंदू धर्म में लड्डू गोपाल को जगाने से लेकर, स्नान कराने, भोग लगाने और रात को सुलाने तक नियम बनाया गया है। इन नियमों का पालन करते हुए भक्तगण बाल गोपाल की पूरे मन और श्रद्धा से सेवा करते हैं। तो आज हम आपको नियम नहीं बल्कि बताएंगे कि आखिर कैसे जगत के पालनहार मुरलीधर का नाम लड्डू गोपाल पड़ा।

आखिर क्यों कृष्ण के इस बाल स्वरूप को कहा गया लड्डू गोपाल ?

पौराणिक कथा के अनुसार कु्ंभनदास नाम का एक व्यक्ति था जो भगवान कृष्ण का परम भक्त था। उनके पास श्रीकृष्ण की एक छोटी सी मूर्ति थी, जिसे वे अत्यंत प्रेम करते थे। कुंभनदास  का एक छोटा बेटा था, जिसका नाम था रघुनंदन।  कुंभनदास हर समय कृष्ण जी की भक्ति में लीन रहते थे और अपने कान्हा को छोड़कर कहीं नहीं जाते थे। एक बार उन्हें वृंदावन में भागवत करने का निमंत्रण आया लेकिन उन्होंने मना कर दिया। इसके बाद लोगों ने उनसे बहुत आग्रह विनती किया तब जाकर कुंभनदास वृंदावन जाने को तैयार हुए।  उन्होंने सोचा कि भगवान की सेवा की तैयारी करके ही जाएंगे और कथा करके वौपस लौट आएंगे। कुंभनदास ने भोग की सारी तैयारी करके अपने बेटे रघुनंदन को ठाकुर जी को भोग लगा देने को कहा और कथा के लिए चले गए।

कु्ंभनदास के जाने के बाद उनके बेटे रघुनंदन ने भोग की थाली ठाकुर जी के सामने रख दी और उनसे भोग लगाने का भी आग्रह किया। रघुनंदन निष्कपट और भोला था। उसे लगा कि जैसे हम इंसान खाना खाते हैं, वैसे ही भगवान भी आकर साक्षात थाली से भोग खाएंगे। बहुत देर बाद इंतजार करने के बाद भोजन की थाली ऐसे ही रखी रही तो रघुनंदन रोने लगे और पुकारा कि ठाकुर जी आओ और भोग लगाओ। 

रघुनंदन की उस निश्छल और सच्ची पुकार के बाद भगवान कृष्ण ने एक  छोटे बालक का रूप धारण किया और भोग खाने लगे। रघुनंदन यह देखकर बेहद खुश हुआ। जब कुंभनदास ने घर आकर रघुनंदन से प्रसाद मांगा तो उसने कहा कि ठाकुर जी ने सारा भोजन खा लिया। कुंभनदास को लगा कि बच्चे को भूख लगी होगी इसलिए उसने सारा प्रसाद खा लिया। लेकिन ऐसा अब रोज होने लगा। तब कुंभनदास को शक हुआ। एक दिन उन्होंने लड्डू बनाकर थाली में रखा और फिर छिपकर देखने लगे कि रघुनंदन क्या करता है।

जब रघुनदन ने ठाकुर जी के आगे थाली रखी तो कृष्ण जी ने बालक का रूप धारण किया और लड्डू खाने लगे। कुंभनदास ये सबकुछ छिपकर देख रहे थे। जैसे ही कान्हा जी के बाल स्वरूप को कुंभनदास ने देखा वह भागता हुआ प्रभु के चरणों में गिर गया और विनती करने लगा। उस समय लड्डू गोपाल के एक हाथ में लड्डू था और दूसरे हाथ का लड्डू मुंह में जाने ही वाला था, लेकिन इतने में वे जड़ (मूर्ति में बदल गए) हो गए।  भगवान का यह स्वरूप एक बच्चे की निश्छल भक्ति के कारण 'लड्डू खाते हुए' स्थिर हुआ था, इसलिए संत कुंभनदास जी ने उन्हें 'लड्डू गोपाल' नाम दिया। तभी से बाल कृष्ण के इस बेहद प्यारे रूप को 'लड्डू गोपाल' कहा जाने लगा और घर-घर में उनकी पूजा होने लगी।

(Disclaimer: यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। इंडिया टीवी एक भी बात की सत्यता का प्रमाण नहीं देता है।)

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