Surdas Jayanti 2026: सूरदास को भक्ति रस के महानतम कवियों में से एक माना जाता है। जन्म से ही अंधे होने के बावजूद भी सूरदास ने सौंदर्य और भक्ति से भरी इतनी सुंदर रचनाएं लिखी हैं कि जिन्हें पढ़कर यकीन नहीं होता कि वो देख नहीं सकते थे। सूरदास के जन्म के संबंध में विद्वानों में मतभेद हैं लेकिन ज्यादातर लोगों का मानना है कि उनका जन्म 1540 में हुआ था। हिंदू पंचांग के अनुसार उनका जन्म वैशाख शुक्ल पंचमी के दिन हुआ था। साल 2026 में सूरदास जंयती 21 अप्रैल 2026 को मनाई जाएगी। ऐसे में आज हम आपको सूरदास जी के कुछ अनमोल दोहों के बारे में अपने इस लेख में बताने जा रहे हैं।
संत सूरदास के कालजयी दोहे
चरन कमल बंदौ हरि राई।
जाकी कृपा पंगु गिरि लंघै आंधर कों सब कछु दरसाई।
बहिरो सुनै, मूक पुनि बोलै, रंक चलै सिर छत्र धराई।
सूरदास स्वामी करुणामय, बार-बार बंदौ तेहि पाई।
अर्थ- इस दोहे में सूरदास जी ने भगवान कृष्ण के चरणों की वंदना की है। सूरदास जी कहते हैं कि मैं भगवान कृष्ण के कमल रूप चरणों की वंदना करता हूं जिन्होंने अपनी कृपा से लंगड़े को भी पर्वत पार करवा दिया और अंधे को भी सबकुछ दिखा दिया। जिनके आशीर्वाद से बहरा सुनने लगता है और गूंगा बोलने लगता है, निर्धन राजा बन जाता है। मेरे स्वामी के चरणों में मेरा बार-बार नमन है।
सुनि परमित पिय प्रेम की, चातक चितवति पारि।
घन आशा सब दुख सहै, अंत न याँचै वारि॥
अर्थ- इस दोहे में सूरदास जी सच्चे प्रेम की महिमा बताते हैं। सूर कहते हैं कि बादल के प्रति अपने प्रेम की सीमा को चातक पक्षी ही जानता है। चातक बादलों की आशा में प्यास के सारे कष्टों को सह लेता है, लेकिन अंत समय तक भी वो बादलों के अलावा नदी, तालाब जैसे अन्य पानी के स्रोतों से पानी नहीं पीता। इसके साथ ही बादल से बरसने की ही गुहार वो करता है। सच्चा प्रेम अपने प्रिय से कभी कुछ नहीं मांगता।
दीपक पीर न जानई, पावक परत पतंग।
तनु तो तिहि ज्वाला जरयो, चित न भयो रस भंग॥
अर्थ- इस दोहे में सूरदास जी कहते हैं कि पतंगा दीपक की लौ में जलकर भस्म हो जाता है लेकिन दीपक को पतंगे की पीड़ा का कोई अहसास नहीं होता। हालांकि इसके बावजूद भी पतंगे का दीपक के प्रति प्रेम कभी समाप्त नहीं होता।
प्रभु पूरन पावन सखा, प्राणनहू को नाथ।
परम दयालु कृपालु प्रभु, जीवन जाके हाथ॥
अर्थ- इस दोहे में सूरदास जी ने ईश्वर की महत्ता के बारे में बताया है। सूरदास जी कहते हैं कि वह ईश्वर परिपूर्ण है, पवित्र मित्र है और प्राणों का भी स्वामी है। वो बहुत दयालु और सभी प्राणियों का जीवन उसके के जरिए चलता है।
जो पै जिय लज्जा नहीं, कहा कहौं सौ बार।
एकहु अंक न हरि भजे, रे सठ ‘सूर’ गँवार॥
अर्थ- सूरदास जी कहते हैं कि हे मनुष्य अगर तेरे हृदय में अपनी स्थिति को लेकर कोई लज्जा नहीं बची तो फिर सौ बार तुझे समझाकर भी क्या कहूं? हे अज्ञानी जीव जिस हरि ने तुझे ये अनमोल जीवन दिया है तूने एक पल को भी उस ईश्वर का ध्यान नहीं किया।
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