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एक छोटे से Pen Drive में कैसे स्टोर होता है इतना डेटा? जानें इसका असली नाम

 Written By: Harshit Harsh @HarshitKHarsh
 Published : Aug 10, 2025 04:07 pm IST,  Updated : Aug 10, 2025 04:07 pm IST

क्या आप अब भी पैन ड्राइव का इस्तेमाल करते हैं? अगर करते हैं तो क्या आप इसका असली नाम जानते हैं? आइए, जानते हैं पैन ड्राइव का असली नाम क्या है और यह कैसे काम करता है...

Pen Drive- India TV Hindi
पेन ड्राइव Image Source : UNSPLASH

Pen Drive का इस्तेमाल डेटा ट्रांसफर, फाइल स्टोरेज जैसे काम के लिए किया जाता है। ऑनलाइन क्लाउड स्टोरेज के आने के बाद से पैन ड्राइव की लोकप्रियता में कमी आई है। अब गूगल, माइक्रोसॉफ्ट जैसी कंपनियां यूजर्स को क्लाउड स्टोरेज का ऑप्शन देती है, जिसमें यूजर्स अपने जरूरी दस्तावेज स्टोर करते हैं, जिसे कहीं से भी एक्सेस किया जा सकता है। हालांकि, अभी भी पैन ड्राइव का इस्तेमाल कई काम के लिए किया जाता है। क्या आप जानते हैं एक छोटे से पैन ड्राइव में इतने फाइल्स कैसे स्टोर होते हैं?

स्टोरेज डिवाइस

सबसे पहले कम्प्यूटर फाइल स्टोर करने के लिए यूजर्स फ्लॉपी डिस्क का इस्तेमाल करते थे, जिसकी स्टोरेज महज कुछ बाइट्स होती थी। इसके बाद CD यानी कॉम्पैक्ट डिस्क और DVD यानी डिजिटल वीडियो डिस्क का दौर आया। इनमें 1GB से लेकर 5GB तक डेटा स्टोर किया जा सकता था। फिर पैन ड्राइव और MMC यानी मेमोरी कार्ड का दौर आया, जिसमें 2TB यानी 2 टैराबाइट डेटा स्टोर किया जा सकता है।

आम तौर पर पैन ड्राइव का वजन 30 ग्राम के करीब होता है। 2000 की शुरुआत में पहला पैन ड्राइव मार्केट में आया था। इन पैन ड्राइव में कई CD/DVD के बराबर फाइल्स स्टोर किया जा सकता है। पैन ड्राइव की लोकप्रियता की मुख्य वजह ये है कि इसमें फाइल्स को स्टोर करने के बाद उसे डिलीट करके इसे दोबारा यूज किया जा सकता है। इसमें करीब 1 लाख बार तक फाइल्स को राइट और री-राइट किया जा सकता है।

किसने बनाया पैन ड्राइव?

पैन ड्राइव का आविष्कार इजराइली कंपनी M-सिस्टम में काम करने वाले आमिर बान, डोव मोरन और ओरोन ओगांड ने किया था। उन्होंने 5 अप्रैल 1999 को इसका पेटेंट रजिस्टर कराया था, जिसे 14 नवंबर 2000 को अप्रूव किया गया। इनके अलावा 1999 में IBM के इंजीनियर शिमॉन शमूली ने भी इसके इन्वेंशन के बारे में इन्वेंशन डिस्क्लोजर सबमिट किया था। पैन ड्राइव को USB फ्लैश ड्राइव या यूनिवर्सल सीरियल बस फ्लैश ड्राइव भी कहा जाता है।

  • 2002 तक लॉन्च होने वाले पैन ड्राइव को USB 2.0 कहा जाता था, जिसमें 35Mbps की स्पीड से डेटा ट्रांसफर किया जा सकता था।
  • 2013 में किंग्सटन कंपनी ने 1TB स्टोरेज वाला पहला पैन ड्राइव लॉन्च किया था।
  • 2015 में USB 3.1 Type C का इन्वेंशन हुआ, जो 530Mbps की स्पीड से डेटा ट्रांसफर कर सकते हैं।
  • 2017 में किंग्सटन ने ही 2TB स्टोरेज वाला पहला पैन ड्राइव लॉन्च किया था।
  • 2018 में SanDisk ने सबसे छोटा USB Type C पैन ड्राइव लॉन्च किया, जिसमें 1TB स्टोरेज कैपेसिटी मिलती है।

Pen Drive कैसे करता है काम?

पैन ड्राइव में कई लेयर के मैग्नेटिक सेल होते हैं, जो EEPROM यानी इलेक्ट्रिकली इरेजेबल प्रोग्रामेबल रीड-ओनली मेमेरी टेक्नोलॉजी पर काम करते हैं। जैसे ही इसे PC या अन्य डिवाइस के कनेक्ट किया जाता है, तो इसमें इलेक्ट्रिक करेंट फ्लो होता है। इलेक्ट्रिक करेंट की वजह से पैन ड्राइव की मेमोरी एक्टिव हो जाती है, जिसमें आप किसी फाइल को स्टोर कर सकते हैं और इसमें मौजूद डिजिटल डेटा को पीसी या किसी अन्य डिवाइस में ट्रांसफर कर सकते हैं।

इन दिनों एनक्रिप्शन फीचर वाले पैन ड्राइव आने लगे हैं, जिसकी वजह से इसे टेम्पर करना अब आसान नहीं है। शुरुआती दौर में पैन ड्राइव में वायरस इंजेक्ट करना बेहद आसान था। कई साइबर अपराधी पैन ड्राइव के जरिए सर्वर में वायरस इंजेक्ट कर देते थे।

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