Airplane Interesting Facts | Weather Today : सर्दियां शुरू होते ही सफर करने वालों को परिवहन साधनों की बड़ी समस्या होती है। जहां एक ओर कोहरे और जीरो विजिबिलटी के कारण दनादन ट्रेनें और फ्लाइट कैंसल होती हैं तो वहीं सड़क पर हादसों की संख्या में भी वृद्धि होती है। फ्लाइट के कैंसल होने तक भी ठीक है मगर सबसे बड़ी मुसीबत उन यात्रियों के लिए होती है जो फ्लाइट के अंदर होते हैं और बाहर कोहरा ही कोहरा ही नजर आता है। ऐसे में सबसे पहला सवाल दिमाग में यही आता है कि, पायलट बिना चूके कैसे फ्लाइट को लैंड कराएगा ? दरअसल, कोहरा और जीरो विजिबिलटी पायलटों के लिए चुनौतियां पैदा करती हैं और उड़ान संचालन में बाधा डालती है। मगर आज हम आपको बताएंगे कि कैसे एक पायलट अपनी सूझबूझ से प्लेन को उतारकर यात्रियों कह सुरक्षित वापसी कराता है।
सर्दियों में कोहरा कैसे आता है
इस मौसम में रातें लंबी और ठंडी होती हैं, जिससे जमीन की गर्मी तेजी से निकलती है और उसके पास की हवा ठंडी होकर ओस बिंदु तक पहुंच जाती है। इससे हवा में मौजूद नमी छोटी-छोटी पानी की बूंदों में बदलकर हवा में तैरने लगती है। ठंडी हवा ज्यादा नमी रोक नहीं पाती और प्रदूषण के कण इन बूंदों को घना और टिकाऊ बनाते हैं, जिससे दृश्यता कम हो जाती है और हमें कोहरा दिखाई देता है।
कोहरे कितने प्रकार का होता है
यदि आपको नहीं पता है तो बता दें कि, कोहरा चार प्रकार का होता है- विकिरण कोहरा, घाटी कोहरा, वाष्पीकरण कोहरा, एडवेक्शन फॉग। कोहरे का प्रकार उसके निर्माण की प्रक्रिया के आधार पर उसे एक विशेष श्रेणी में रखता है।

विमानन में कोहरा छाने की समस्या क्या है ?
buddhaair की एक रिपोर्ट के मुताबिक, विमान में कोहरे का तात्पर्य हवाई अड्डों, रनवे या उड़ान मार्गों के पास कोहरे के बनने से है, जो दृश्यता को बुरी तरह प्रभावित कर सकता है और संचालन को बाधित कर सकता है। उदाहरण के लिए, कोहरे के कारण कम दृश्यता से उड़ानें विलंबित, मार्ग परिवर्तनित या रद्द हो सकती हैं। ऐसे में पायलटों को दृश्य संकेतों के बजाय अपने उपकरणों पर अधिक निर्भर रहना पड़ता है। पायलटों को कोहरे के विभिन्न प्रकारों को समझना आवश्यक है, क्योंकि प्रत्येक प्रकार की कोहरे की अपनी चुनौतियां होती हैं और सुरक्षित नेविगेशन के लिए अलग-अलग रणनीतियों की आवश्यकता होती है। इसके अलावा, कोहरे का प्रभाव केवल टेकऑफ और लैंडिंग तक ही सीमित नहीं है यह हवाई यातायात नियंत्रण कार्यों और हवाई अड्डे की जमीनी सेवाओं की दक्षता को भी प्रभावित करता है। उदाहरण के लिए, घने कोहरे के कारण टेकऑफ़ या लैंडिंग के दौरान विमानों के बीच अधिक दूरी रखना आवश्यक हो सकता है, जिससे हवाई अड्डे की क्षमता कम हो जाती है।
कोहरे में लैंडिंग से पहले का पूरा प्रोसेस समझें
रिपोर्ट्स के मुताबिक, घने कोहरे और जीरो विजिबिलटी में विमान एक ग्राउंड-बेस्ड नेविगेशन सिस्टम का उपयोग करते हैं जिसे इंस्ट्रूमेंट लैंडिंग सिस्टम (ILS) कहा जाता है। आईएलएस एक मानक अंतर्राष्ट्रीय नागरिक उड्डयन संगठन (ICAO) का सटीक लैंडिंग सहायता उपकरण है जिसका उपयोग सामान्य या प्रतिकूल मौसम स्थितियों में रनवे पर उतरने के लिए मार्गदर्शन संकेत प्रदान करने के लिए किया जाता है। ILS में कई घटक शामिल होते हैं जैसे कि लोकलाइज़र, ग्लाइड पाथ, मार्कर, दूरी मापने का उपकरण (डीएमई) और रनवे प्रकाश व्यवस्था। लोकेलाइज़र पायलट को पार्श्व मार्गदर्शन प्रदान करता है और ट्रांसमीटर और एंटीना रनवे के उस छोर पर सेंटरलाइन पर स्थित होते हैं जो फ्लाइट के आने की दिशा के विपरीत होता है। ग्लाइड पाथ घटक पायलट को ऊर्ध्वाधर मार्गदर्शन प्रदान करता है, जिससे सुरक्षित लैंडिंग के लिए उचित कोण बनाए रखने में मदद मिलती है। डीएमई विमान को टच डाउन बिंदु के सापेक्ष तिरछी दूरी प्रदान करता है। इनके अतिरिक्त पायलट को निर्णय ऊंचाई या मिस्ड अप्रोच पॉइंट (एमएपी) के पास पहुंचने पर दिखाई देने के लिए रनवे पर प्रकाश व्यवस्था और दृश्य सहायक उपकरण भी लगाए जाते हैं। ये सिस्टम पायलट को रनवे को देखने से पहले ही यह समझने में मदद करते हैं कि विमान रनवे की ओर कैसे बढ़ रहा है। रनवे की सेंटरलाइन से चूकने, उससे आगे निकलने या उससे कम आगे रहने पर भी चेतावनी दी जाती है। कम या जीरो विजिबिलटी के बावजूद रनवे का सही रास्ता सुनिश्चित करने के लिए ILS के साथ रडार उपकरणों का भी उपयोग किया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया के बाद जाकर कहीं फ्लाइट लैंड हो पाती है।

संक्षेप में समझें
वैसे कुछ रिपोर्ट्स में ये बताया जाता है कि, फ्लाइट का ऑटो पायलट और ऑटो लैंडिंग सिस्टम रनवे से मिलने वाले सिग्नलों को पकड़ता है और फ्लाइट को मंजिल की तरफ गाइड करता है। सामने भले ही कुछ न दिखे लेकिन पायलटों को इस बीच पता रहता है कि उनका विमान सही रास्ते पर है। बीच-बीच में ऑटो पायलट जमीन से विमान की ऊंचाई भी बताता रहता है लेकिन इस तकनीक के बावजूद अगर रनवे पर विजिबिलिटी 50 मीटर से भी कम हो तो लैंडिंग टालना ही ज्यादा बेहतर माना जाता हैं।
डिस्क्लेमर: इस खबर में दी गई जानकारी सोशल मीडिया और रिपोर्ट्स में किए गए दावों पर आधारित है। इंडिया टीवी किसी भी प्रकार के दावे की प्रमाणिकता की पुष्टि नहीं करता है।
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