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जर्मनी में पासपोर्ट के काम में देरी के बाद शख्स को आई भारत की याद, तारीफ में जो कहा; जरूर पढ़ें

 Written By: Shaswat Gupta
 Published : May 23, 2026 04:43 pm IST,  Updated : May 23, 2026 04:43 pm IST

Viral Post : सोशल मीडिया पर एक पोस्ट ने इन​ दिनों यूजर्स का ध्यान आकर्षित किया है। इस पोस्ट में जर्मनी में पासपोर्ट के काम में देरी के बाद शख्स ने भारत की कार्यपद्धति की काफी तारीफ की है।

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भारतीय पासपोर्ट। Image Source : X/@MAYUKH_PANJA

Viral Post : जर्मनी में रहने वाले एक भारतीय पूर्व खगोल भौतिक विज्ञानी ने बर्लिन में आधिकारिक डॉक्यूमेंट्स के रिन्यूवल के दौरान हुई देरी की तुलना भारतीय व्यवस्था से करते हुए एक बहस छेड़ दी है। X पर एक पोस्ट में मयूख पांजा ने अपने भारतीय पासपोर्ट और जर्मन निवास परमिट दोनों के रिन्यूवल के अपने अनुभव को शेयर किया। उन्होंने अनुमान लगाया था कि भारतीय प्रक्रिया जटिल होगी, क्योंकि इसमें विभिन्न देशों की कई एजेंसियां ​​शामिल थीं। लेकिन वे यह देखकर आश्चर्यचकित रह गए कि वह प्रक्रिया कितनी सुगम और कुशल निकली।

एक्स पोस्ट हुई वायरल 

गौरतलब है कि, पोस्ट को @mayukh_panja नामक हैंडल से शेयर किया गया है। इस पोस्ट के कैप्शन में लिखा कि, 'भारत जिस तरह से बड़े पैमाने पर लॉजिस्टिक्स का प्रबंधन करता है, वह वाकई बेहद प्रभावशाली है। मैंने हाल ही में अपना भारतीय पासपोर्ट और इसके साथ ही अपना जर्मन निवास परमिट भी रिन्यू करवाया, जो मेरे पासपोर्ट से जुड़ा हुआ है। भारतीय दूतावास में अपॉइंटमेंट लेने में मुझे 30 दिन लग गए। अपॉइंटमेंट मिलने और बर्लिन में अपने दस्तावेज़ जमा करने के बाद, नया पासपोर्ट वापस मिलने में लगभग 6 सप्ताह लग गए। इसमें कोलकाता के पासपोर्ट कार्यालय और स्थानीय पुलिस के साथ समन्वय करना शामिल था - पुलिस को कोलकाता में मेरे स्थायी निवास के पते का भौतिक सत्यापन करना पड़ा। साथ ही, पासपोर्ट दूतावास में नहीं छपते। वे भारत में छपते हैं और फिर दुनिया भर के दूतावासों को भेजे जाते हैं। दस्तावेजों की सीमा पार आवाजाही से जुड़ा यह पूरा अंतरराष्ट्रीय मामला 6 सप्ताह में पूरा हो गया। इसके विपरीत, बर्लिन में विदेशी कार्यालय (Ausländerbehorde) में अपॉइंटमेंट लेने में ही मुझे 6 सप्ताह लग गए। और नए कार्ड की छपाई में ही लगभग 8 सप्ताह लगेंगे, और यह सब शहर के भीतर ही होगा। मुझे पता है कि बहुत सी चीजें काम नहीं करतीं, लेकिन कभी-कभी मैं इस बात से चकित हुए बिना नहीं रह सकता कि हमारा लोकतंत्र, शाब्दिक और लाक्षणिक दोनों अर्थों में, कितना विशाल और फैला हुआ है और फिर भी किसी तरह बिखर नहीं रहा है।'

भारत के बारे में ये भी कहा

यूजर ने लिखा कि, 'मैं कभी-कभी भारत के बारे में सतर्क आशावाद व्यक्त करता हूं। सतर्क इसलिए क्योंकि मुझे पता है कि कई चीजें ठीक नहीं हैं, आशावादी इसलिए क्योंकि मैंने अपने जीवनकाल में बहुत सारे सकारात्मक बदलाव देखे हैं। लेकिन भारत के बारे में केवल सतर्क आशावाद रखना कई लोगों को, खासकर अंग्रेजी बोलने वाले शहरी भारतीयों को पसंद नहीं आता। मुझे आश्चर्य है कि ऐसा क्यों होता है।

डिस्क्लेमर: इस खबर में दी गई जानकारी सोशल मीडिया और रिपोर्ट्स में किए गए दावों पर आधारित है। इंडिया टीवी किसी भी प्रकार के दावे की प्रमाणिकता की पुष्टि नहीं करता है।

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