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'नोएडा में 4 किमी चलने में लगते हैं 45 मिनट,' स्टार्टअप फाउंडर ने शहर की बुनियादी सुविधाओं पर उठाए सवाल, Viral Post

 Written By: Shaswat Gupta
 Published : Mar 26, 2026 08:58 pm IST,  Updated : Mar 26, 2026 08:58 pm IST

Viral Post : सोशल मीडिया पर इन दिनों एक पोस्ट काफी वायरल हो रही है। इस पोस्ट में एक स्टार्टअप फाउंडर ने नोएडा जैसे शहरों की बु​नियादी सुविधाओं पर सवाल उठाया है।

ट्रैफिक जाम। - India TV Hindi
ट्रैफिक जाम। Image Source : FREEPIK

Viral Post : नोएडा स्थित एक स्टार्टअप कंपनी के फाउंडर ने शहर की ट्रैफिक और बुनियादी सुविधाओं पर तीखा सवाल उठाते हुए सोशल मीडिया पर एक पोस्ट शेयर किया है। X पर लिखते हुए, किडबी के संस्थापक स्वप्निल श्रीवास्तव ने बताया कि उनका कार्यालय नोएडा स्थित उनके घर से मात्र 4 किलोमीटर दूर है, लेकिन कार से वहां पहुंचने में उन्हें 45 मिनट लगते हैं। वे पैदल चलकर, चाय का ब्रेक लेकर भी जल्दी पहुंच सकते थे। 

एक्स पोस्ट हुई वायरल 

एक्स पर इस पोस्ट को @theswapnilsri नामक हैंडल से शेयर किया गया है। स्वप्निल लिखते हैं कि, 'मेरा ऑफिस नोएडा में मेरे घर से 4 किमी दूर है। मुझे वहाँ पहुंचने में हर दिन 45 मिनट लगते हैं। यह कोई टाइपिंग की गलती नहीं है। 4 किमी। 45 मिनट। कार से। इस गति से तो मैं पैदल चलकर, चाय का ब्रेक लेकर भी ट्रैफिक कम होने से पहले पहुंच सकता था। लेकिन बात यह है कि मैं सबसे बुरी स्थिति में नहीं हूं।' ये बताने के लिए उन्होंने प्रमुख शहरों में औसत आवागमन समय के आंकड़े प्रस्तुत किए। 

उन्होंने लिखा, 'भारत में सबसे संगठित, अच्छी तरह से वित्तपोषित और वैश्विक स्तर पर समर्थित कार्यालय और उनके कर्मचारी अभी भी प्रतिदिन यातायात में बैठकर 2 घंटे बर्बाद कर रहे हैं। सिर्फ बेंगलुरु में ही 4 लाख यात्राएं होती हैं। दिल्ली-एनसीआर में 3 लाख यात्राएं। विश्व स्तरीय प्रतिभाएं। विश्व स्तरीय कार्यालय। लेकिन घरों को उन कार्यालयों से जोड़ने वाली सड़कें? वे अभी भी 2004 के दौर में अटकी हुई हैं।' 

प्रोडक्टिविट प्रभावित होने की कही बात 

स्टार्टअप फाउंडर ने बताया कि, 'लंबे सफर के कारण उत्पादकता कम हो जाती है, पहली मीटिंग से पहले ही ध्यान भटक जाता है और लैपटॉप खोलने से पहले ही सारी ऊर्जा खत्म हो जाती है। दिन के 2 घंटे यूं ही बर्बाद हो जाते हैं। हर दिन। इस तरह ट्रैफिक में सालाना लगभग 500 घंटे बर्बाद हो जाते हैं।' उन्होंने इस समस्या के समाधान के लिए लचीले कार्य घंटे, सैटेलाइट कार्यालय, हाइब्रिड नीतियां और बेहतर लास्ट-माइल कनेक्टिविटी जैसे उपाय सुझाए। उन्होंने कहा, 'प्रतिभा यहां है। महत्वाकांक्षा यहां है। काम करने की लगन यहां है। बस रास्ते नहीं हैं। और जब तक हम इसे ठीक नहीं करते, हम हर साल सैकड़ों उत्पादक घंटे बर्बाद कर रहे हैं।' 

यूजर्स ने दी प्रति​क्रियाएं 

इस पोस्ट पर कई यूजर्स ने प्रतिक्रियाएं दी हैं। एक यूजर ने लिखा, 'सैटेलाइट ऑफिस बनने ही चाहिए, मैं रोज़ाना आने-जाने में 4 घंटे बर्बाद कर रहा हूं। आरटीओ का नया नियम उत्पादकता को बुरी तरह प्रभावित कर रहा है। पहले हम ऑफिस को उतने ही घंटे देते थे, लेकिन अब भीड़भाड़ वाली बसों और मेट्रो में खड़े रहना पड़ता है।' दूसरे ने कहा कि, '45 मिनट में 4 किलोमीटर चलना हास्यास्पद है-भारत का जीसीसी विकास विश्व स्तरीय है, लेकिन हमारी सड़कें उत्पादकता में भारी बाधा बन रही हैं। सैटेलाइट ऑफिस और वास्तविक हाइब्रिड मॉडल से प्रत्येक कर्मचारी के लिए तुरंत सैकड़ों घंटे का काम संभव हो सकता है। प्रतिभा तो तैयार है; बुनियादी ढांचे को तेजी से विकसित होने की जरूरत है।' तीसरे ने कहा कि, 'यह तो रोज़ाना का आवागमन नहीं है। यह धीमी गति से होने वाली पीड़ा है। भारत के प्रमुख शहरों में लोग कार्यालय पहुंचने में ही लगभग 1 घंटा बिता रहे हैं। प्रतिदिन 2 घंटे। यह समय अब ​​बीत चुका है। हम वैश्विक कंपनियां बना रहे हैं…।' एक और यूजर ने लिखा कि, 'स्थानीय बुनियादी ढांचे पर निर्भर रहना होगा जो लोगों को 5 किलोमीटर की दूरी कुशलतापूर्वक तय करने में सक्षम नहीं है। आवागमन की समस्या को हल करें और उत्पादकता को तुरंत बढ़ाएं।' एक अन्य ने लिखा कि, 'मुंबई में रहते हुए हर तरफ़ 2 घंटे का सफ़र करना पड़ता था। अब पुणे में एक तरफ़ से 1.5 घंटे लगते हैं। कोविड की वजह से हाइब्रिड कार मिल गई, वरना अब तक नौकरी छोड़ चुका होता। बेहतर सड़कें, लास्ट माइल कनेक्टिविटी और परिवहन के कई साधन होना बेहद ज़रूरी है!' 
डिस्क्लेमर: इस खबर में दी गई जानकारी सोशल मीडिया और रिपोर्ट्स में किए गए दावों पर आधारित है। इंडिया टीवी किसी भी प्रकार के दावे की प्रमाणिकता की पुष्टि नहीं करता है।

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