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अफगानिस्तान के लोग 1 जनवरी को ही क्यों मनाते हैं अपना Birthday ? वजह के पीछे छिपा है बेहद खतरनाक सच

 Written By: Shaswat Gupta
 Published : Oct 12, 2025 04:14 pm IST,  Updated : Oct 12, 2025 04:16 pm IST

Afghanistan Facts: अफगानिस्तान से जुड़े कई अनोखे और अजब-गजब कानून सोशल मीडिया पर वायरल होते रहते हैं। मगर, इस बार एक ऐसा तथ्य ट्रेंड कर रहा है जिसे सुनकर आप भी यकीन नहीं कर पाएंगे।

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अफगानिस्तान से जुड़ा अनोखा तथ्य। Image Source : YT/@VILLAGETRADITIONS

Afghanistan Facts: मध्य एशिया और दक्षिण एशिया से सटा अफगानिस्तान अपने विशिष्ट भौगोलिक क्षेत्र के लिए जाना जाता है। हालांकि, वर्तमान में पाकिस्तान के विरुद्ध संघर्ष कर रहा ये देश अचानक से सुर्खियों में आ गया है। भारत के दोनों पड़ोसी देशों के बीच छिड़े इसे युद्ध में जोरदार फायरिंग चल रही है। इसी बीच सोशल मीडिया पर भी इस संघर्ष से जुड़े कई वीडियो और फैक्ट्स वायरल हो रहे हैं। अफगानिस्तान की बात की जाए तो यह देश संगमरमर, कोयला, सोना, प्राकृतिक गैस और पेट्रोलियम जैसे प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध है। अफगानिस्तान ने फारसी, यूनानी, ब्रिटिश और इस्लामी साम्राज्यों के कई आक्रमणों और विदेशी शासन के दौर को भी देखा है। 1996 तक तालिबान शासन ने देश के अधिकांश हिस्से पर नियंत्रण कर लिया था। 2001 के अमेरिकी आक्रमण के परिणामस्वरूप इस समूह को उखाड़ फेंका गया मगर 2021 में फिर से सत्ता में आया। 

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Image Source : APतालिबान शासन।

इन सब चीजों के बीच अफगानिस्तान अपने अनोखे कानून और परंपराओं के लिए भी जाना जाता है। इसे परंपरा कहें या विवशता मगर सोशल मीडिया पर दावा किया जाता है कि, अफगानिस्तान के कुछ लोग 1 जनवरी को ही अपना जन्मदिन मनाते हैं। मगर ऐसा क्यों है और इसके पीछे की वजह क्या है, ये जानना भी बेहद जरूरी है क्योंकि इसकी वजह के पीछे एक खतरनाक सच छिपा हुआ है। 
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Image Source : YT/@VILLAGELANDSCAPEअफगानिस्तान में Birthday.

20 बार बदला अफगानिस्तान का झंडा 

ब्रिटानिका की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 20वीं सदी के बाद अफगानिस्तान ने दुनिया के किसी भी अन्य देश की तुलना में अपना राष्ट्रीय ध्वज सबसे ज्यादा बार बदला है। 1919 में अफगानिस्तान को ब्रिटिश हुकूमत से आजादी मिलने के बाद यहां के राष्ट्रीय ध्वज को 20 बार बदला गया है। ये केवल और केवल राजनीतिक सत्ता और राष्ट्रीय पहचान में बदलाव को दर्शाता है। अफगानिस्तान के वर्तमान राष्ट्रीय ध्वज में काले, लाल और हरे रंग की पट्टियां हैं तथा सफेद राष्ट्रीय प्रतीक चिह्न है, जबकि तालिबान का ध्वज सफेद रंग का है तथा उस पर काला शाहदा (इस्लामी पंथ) अंकित है। 

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Image Source : AP अफगानिस्तान का झंडा लिए शख्स।

अफगानिस्तान में कोई चर्च नहीं 

अफगानिस्तान की 99.7% आबादी इस्लाम का पालन करती है और यही वजह है कि, यहां पर कोई भी सार्वजनिक ईसाई चर्च है। कानूनी तौर पर मान्यता प्राप्त एकमात्र ईसाई चर्च भवन 'अवर लेडी ऑफ़ डिवाइन प्रोविडेंस चैपल' है, जो काबुल स्थित इतालवी दूतावास में स्थित है। इस कैथोलिक चैपल को 1933 में राजधानी में विदेशी कर्मचारियों की सेवा के लिए अधिकृत किया गया था, लेकिन यह स्थानीय नागरिकों के लिए खुला नहीं है। 

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Image Source : APअफगानिस्तान में भीड़।

1 जनवरी को जन्मदिन क्यों मनाते हैं अफगान 

अफगानिस्तान के बारे में सबसे रोचक बात एक भी कही जाती है कि, यहां के कुछ लोग 1 जनवरी को नए साल की शुरुआत से कहीं ज्यादा महत्व देते हैं जिसकी वजह है उनका जन्मदिन। दरअसल, ऐसा दावा किया जाता है कि, कई अफगानी एक जनवरी को अपना जन्मदिन मनाते हैं जो कि, पुनर्जन्म का एक प्रतीकात्मक दिन है। ऐसा हम इसलिए कह रहे हैं क्योंकि, 1980 से 1990 का दशक सोवियत-अफ़गान युद्ध और गृहयुद्ध से प्रभावित था। इस बीच यह देश कई तरह के बड़े व्यवधान और विस्थापन की चपेट में था। माना जाता है कि, इस युद्ध में बहुत महत्वपूर्ण नागरिक रिकॉर्ड नष्ट हो गए। इसके बाद अफगानों के पास जन्मतिथि से जुड़ा कोई महत्वपूर्ण और आधिकारिक दस्तावेज नहीं शेष था। ऐसे में 1 जनवरी कई अफगानों के लिए अपना जन्मदिन मनाने का एक व्यावहारिक विकल्प बन गया।

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Image Source : YT/@COUNTRYLIFEAHOLIC खाना खाते अफगान।

य़ुद्ध का परिणाम 

ऐसा दावा किया जाता है कि, 1992 से पहले करीब 15 लाख अफगान मारे गए थे। हालांकि, युद्ध में मारे गए लोगों की संख्या और संघर्ष के अप्रत्यक्ष परिणामस्वरूप मारे गए लोगों की संख्या स्पष्ट नहीं है। सोवियत—अफगान युद्ध में हजारों आदिवासी, जातीय या धार्मिक प्रतिद्वंद्वियों द्वारा सैकड़ों या हजारों कैदियों और नागरिकों को मार डाला गया। मौतों के अतिरिक्त बाद परिणामस्वरूप ये देश भुखमरी और गंभीर बीमारियों की जकड़ में आ गया। इससे भी कई लोग मारे गए। विदेशों में रहने वाले अफगान शरणार्थियों की संख्या लड़ाई के साथ-साथ कई वर्षों तक घटती-बढ़ती रही और 1980 के दशक के अंत में यह संख्या लगभग छह मिलियन के शिखर पर पहुंच गई।
नोट: इस खबर में दी गई जानकारी रिपोर्ट्स पर आधारित है। इंडिया टीवी किसी भी प्रकार के दावे की प्रमाणिकता की पुष्टि नहीं करता है। 

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