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आंदोलन से सत्ता तक: Singur और Nandigram ने कैसे बदली बंगाल की तस्वीर? गहरा है इतिहास

 Written By: Sukanya Jadoun
 Published : Apr 22, 2026 06:49 pm IST,  Updated : Apr 22, 2026 06:49 pm IST

सिंगुर और नंदीग्राम के आंदलनों ने बंगाल की तस्वीर को कैसे बदला, आइए इस खबर के जरिए इससे अवगत होते हैं। साथ ही यह भी जानते हैं कि कैसे इन आंदोलनों ने तृणमूल कांग्रेस को जमीनी ताकत दी।

क्या आपने कभी सोचा है कि कुछ आंदोलन सिर्फ विरोध नहीं होते, बल्कि पूरी राजनीति की दिशा बदल देते हैं? शुरुआत में ये भले छोटे लगें, लेकिन समय के साथ ये तय कर देते हैं कि सत्ता किसके हाथ में जाएगी। पश्चिम बंगाल के दो छोटे से इलाके "Singur और Nandigram" इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं। इन जगहों पर हुए आंदोलनों ने न सिर्फ राज्य, बल्कि पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींचा। यही वो घटनाएं थीं, जिन्होंने All India Trinamool Congress को जमीनी ताकत दी और Mamata Banerjee को एक मजबूत विपक्षी चेहरा बनाकर उभारा।

सिंगुर आंदोलन: विकास बनाम किसान अधिकार

साल 2006 में देशभर में औद्योगिकीकरण की लहर थी और पश्चिम बंगाल भी इस दौड़ में शामिल होना चाहता था। Tata Group ने अपनी सस्ती कार "Nano" के लिए सिंगुर में फैक्ट्री लगाने का ऐलान किया। उस समय के मुख्यमंत्री Buddhadeb Bhattacharjee ने इसे राज्य के विकास की दिशा में बड़ा कदम भी बताया। लेकिन इस परियोजना के लिए करीब 1000 एकड़ जमीन अधिग्रहित की जानी थी, जिससे कई किसानों ने असहमति जताई। यहीं से औद्योगिकीकरण बनाम किसान अधिकारों की बहस शुरू हुई। किसानों का सवाल साफ था अगर उनकी पीढ़ियों की जमीन उनसे छीन ली जाएगी, तो उनका भविष्य क्या होगा?

इसी मुद्दे को लेकर ममता बनर्जी आंदोलन के केंद्र में आ गईं। हालांकि वह पहले से ही एक सक्रिय विपक्षी नेता थीं, लेकिन इस आंदोलन ने उन्हें आम जनता, खासकर किसानों के बीच और मजबूत बना दिया। सिंगुर में विरोध तेज हो गया और हालात तनावपूर्ण होने लगे। प्रशासन द्वारा बुलाई गई बैठकों का तृणमूल कांग्रेस ने बहिष्कार किया।

30 नवंबर 2006 को ममता बनर्जी के सिंगुर जाने की कोशिश को पुलिस ने रोक दिया, जिसके बाद विधानसभा में हंगामा हुआ। इसके बाद 3 दिसंबर 2006 से उन्होंने कोलकाता में आमरण अनशन शुरू किया, जो 26 दिनों तक चला। इस दौरान Rajnath Singh और Vishwanath Pratap Singh जैसे नेता उनसे मिलने पहुंचे।

आंदोलन लंबा खिंचता गया और प्रोजेक्ट में देरी होती रही। 24 अगस्त 2008 को ममता ने दुर्गापुर एक्सप्रेसवे पर विरोध तेज करते हुए 1000 एकड़ में से 400 एकड़ जमीन वापस करने की मांग उठाई। अंततः 3 अक्टूबर 2008 को Ratan Tata ने घोषणा की कि "Nano" परियोजना सिंगुर से हटाकर गुजरात के साणंद में शिफ्ट की जा रही है। बाद में एक लंबी कानूनी लड़ाई के बाद 31 अगस्त 2016 को सुप्रीम कोर्ट ने जमीन किसानों को लौटाने का आदेश दिया, जिसके बाद धीरे-धीरे उस जमीन पर फिर खेती शुरू हुई।

नंदीग्राम: टकराव जिसने सत्ता हिला दी

सिंगुर के बाद 2007 में नंदीग्राम की घटनाओं ने इस बहस को और तेज कर दिया। यहां एक केमिकल हब (SEZ) बनाने की योजना थी, जिसके लिए हजारों एकड़ जमीन अधिग्रहित की जानी थी। यह परियोजना इंडोनेशिया के सलीम ग्रुप के सहयोग से प्रस्तावित थी। जमीन अधिग्रहण की खबर फैलते ही स्थानीय किसानों ने विरोध शुरू कर दिया। धीरे-धीरे यह आंदोलन उग्र हो गया और इलाके में तनाव बढ़ गया। ममता बनर्जी ने इस आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई और स्थानीय नेता शुभेंदु अधिकारी के साथ खड़ी नजर आईं।

स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि इलाके में लगभग "सिविल वॉर" जैसे हालात बन गए। 14 मार्च 2007 को हालात काबू में करने के लिए पुलिस बल तैनात किया गया और फायरिंग में सरकारी आंकड़ों के अनुसार 14 लोगों की मौत हुई। हालांकि इस घटना को लेकर कई विवाद और आरोप भी सामने आए, जिनकी सच्चाई आज भी पूरी तरह स्पष्ट नहीं हो सकी है। इस घटना ने पूरे देश में आक्रोश पैदा किया और इसे पश्चिम बंगाल के इतिहास का एक काला अध्याय कहा गया।

राजनीतिक बदलाव की नींव

सिंगुर और नंदीग्राम सिर्फ दो जगहों के नाम नहीं रहे, बल्कि ये बंगाल की राजनीति में बदलाव के प्रतीक बन गए। इन आंदोलनों ने Mamata Banerjee को एक मजबूत जननेता के रूप में स्थापित किया और 34 साल पुरानी वाम सरकार के पतन की नींव रखी। इन घटनाओं ने यह भी दिखाया कि विकास और अधिकारों के बीच संतुलन कितना जरूरी है। सिंगुर और नंदीग्राम ने न केवल पश्चिम बंगाल, बल्कि पूरे देश को सोचने पर मजबूर कर दिया।

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