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क्या संदेशखाली की गूंज दक्षिण बंगाल के चुनावी समीकरण को बदल देगी? हिंगलगंज से रेखा पात्रा को बीजेपी ने दिया टिकट

 Published : Apr 18, 2026 12:12 pm IST,  Updated : Apr 18, 2026 12:20 pm IST

पश्चिम बंगाल के संदेशखाली से उठी चिंगारी विधानसभा चुनाव में भी दक्षिण बंगाल की सियासत में बड़ा मुद्दा बनती जा रही है। महिला सुरक्षा और कथित उत्पीड़न के आरोपों ने इस क्षेत्र को राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया है। बीजेपी ने आंदोलन का चेहरा रहीं रेखा पात्रा को हिंगलगंज से उम्मीदवार बनाकर इस मुद्दे को चुनावी रण में उतार

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संदेशखाली के टूटे और जले हुए मकान, रेखा पात्रा Image Source : PTI

West Bengal Assembly Elections 2026: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में संदेशखाली का मुद्दा भी काफी अहम है। यह मुद्दा दक्षिण बंगाल के चुनावी समीकरणों को बदलने की क्षमता रखता है। हालांकि यह एक मात्र निर्णायक कारक नहीं हो सकता है फिर भी खास तौर पर महिला सुरक्षा और कानून-व्यवस्था के इर्द-गिर्द बीजेपी के लिए एक मजबूत नैरेटिव के तौर पर उभरा है। पश्चिम बंगाल में विधानसभा की कुल 294 सीटों में से केवल दक्षिण बंगाल में विधानसभा की 183 सीट पड़ती हैं। वहीं संदेशखाली की घटना का गहरा असर पूरे दक्षिण बंगाल पर पड़ा। ऐसे में इस सवाल का उठना लाजिमी है कि क्या संदेशखाली की गूंज दक्षिण बंगाल के चुनाव समीकरण को बदल देगी?

 राजनीति का अहम बिंदु बना संदेशखाली

संदेशखाली दक्षिण बंगाल के सुंदरबन के मुहाने पर स्थित कभी एक शांत द्वीप हुआ करता था लेकिन आज पश्चिम बंगाल की राजनीति का अहम बिंदु बन चुका है। यहां जमीन कब्जाने और उत्पीड़न के खिलाफ महिलाओं ने तृणमूल नेताओं के खिलाफ आंदोलन शुरू किया था। इस आंदोलन की अगुवाई रेखा पात्रा ने की थी। बीजेपी ने इस गुस्से को राजनीतिक दिशा देने के लिए आंदोलन की सबसे मुखर आवाज, रेखा पात्रा को हिंगलगंज से टिकट देकर चुनावी रण में उतार दिया है।

रेखा पात्रा को हिंगलगंज से क्यों टिकट मिला?

हालांकि, इससे पहले 2024 में भी बशीरहाट लोकसभा सीट से बीजेपी ने रेखा पात्रा को टिकट दिया था लेकिन टीएमसी के गढ़ में वे दूसरे नंबर पर रही थीं। हिंगलगंज से उन्हें टिकट देकर बीजेपी ने यह संदेश देने की कोशिश की है कि स्थानीय स्तर पर उपजे प्रतिरोध को संवैधानिक पहचान देना चाहती है। बीजेपी संदेशखाली की घटना को 'नारी शक्ति' बनाम 'सत्ता का अहंकार' के प्रतीक के रूप में पेश कर रही है। 

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Image Source : PTIसंदेशखाली आंदोलन के दौरान प्रदर्शन करती महिलाएं

दरअसल, दक्षिण बंगाल खासतौर से उत्तर 24 परगना जिला परंपरागत तौर पर तृणमूल कांग्रेस का मजबूत गढ़ रहा है। लेकिन संदेशखाली की घटना ने यहां से सियासी समीकरणों तीन तरह से प्रभावित किया है। 

  1. पहली बात ये है कि पश्चिम बंगाल में महिला वोटर्स तृणमूल कांग्रेस का जड़ मानी जाती रही है। ममता का सबसे बड़ा आधार साइलेंट महिला वोटर्स हैं। लेकिन संदेशखाली की घटना ने इस बड़े वोट बैंक में  भावनात्मक दरार पैदा की है।
  2. दूसरा प्रभाव यह पड़ा है कि विपक्ष जहां इसे महिला सुरक्षा और कानून व्यवस्था का मुद्दा बनाता रहा वहीं सत्ता पक्ष इसे बाहरी साजिश करार देता रहा।
  3. तीसरा प्रभाव यह पड़ा है कि शाहजहां शेख जैसे स्थानीय नेताओं की गिरफ्तारी और उनपर लगे आरोपों ने जमीनी स्तर पर काम करने वाले कैडर्स की छवि को नुकसान पहुंचाया है।

सिर्फ एक मुद्दे पर नहीं चलती राजनीति

हालांकि, बंगाल की राजनीति सिर्फ एक मुद्दे पर नहीं चलती। यहां जातीय समीकरण, स्थानीय संगठन की ताकत, कल्याणकारी योजनाओं का असर और नेतृत्व की लोकप्रियता भी निर्णायक भूमिका निभाते हैं। Trinamool Congress की जमीनी पकड़ और Bharatiya Janata Party की आक्रामक रणनीति के बीच मुकाबला संतुलित बना हुआ है।

'इमोशनल नैरेटिव' बना संदेशखाली का मुद्दा

संदेशखाली में उपजा जनआक्रोश दक्षिण बंगाल की दर्जनों विधानसभा सीटों पर असर डालने वाला एक 'इमोशनल नैरेटिव' बन चुका है। रेखा पात्रा की जीत या हार यह तय करेगी कि क्या बंगाल की राजनीति में उपजा यह जनआक्रोश बड़ी राजनीतिक ताकतों को उखाड़ फेंकने का दम रखता है या नहीं।

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