Adolf Hitler Assassination Conspiracy: द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान कई बार ऐसा हुआ जब जर्मनी के तानाशाह एडोल्फ हिटलर मौत के बेहद करीब पहुंच गए, लेकिन हर बार किसी ना किसी वजह से बच निकले। ऐसी ही एक रोमांचक और ऐतिहासिक घटना 13 मार्च 1943 को हुई थी। अगर उस दिन योजना सफल हो जाती तो संभव है कि दुनिया का इतिहास ही बदल जाता।
जर्मन सेना को हो रहा था भारी नुकसान
यह घटना द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान तब हुई थी जब जर्मनी और सोवियत संघ के बीच भीषण जंग चल रही था। जर्मनी की सेना शुरुआती वर्षों में बहुत ताकतवर थी, लेकिन 1942–43 के बाद हालात तेजी से बदलने लगे थे। जर्मन सेना को पूर्वी मोर्चे पर भारी नुकसान उठाना पड़ रहा था। इसी समय जर्मन सेना के कई वरिष्ठ अधिकारियों को महसूस होने लगा कि हिटलर के फैसले देश को विनाश की ओर ले जा रहे हैं और यहीं से साजिश का जन्म हुआ।
हिटलर के खिलाफ अंदरूनी विरोध
नाजी शासन के दौरान हिटलर के खिलाफ बोलना या विरोध करना लगभग असंभव था। जो भी विरोध करता, उसे तुरंत गिरफ्तार या मार दिया जाता था। ऐसे दौर में भी जर्मन सेना के कुछ अधिकारी चुपचाप हिटलर को हटाने की योजना बना रहे थे। इन अधिकारियों में सबसे प्रमुख नाम था हेनिंग वॉन ट्रेस्को। ट्रेस्कोव जर्मन सेना के एक वरिष्ठ अधिकारी थे और पूर्वी मोर्चे पर तैनात थे। उन्होंने नाजी शासन के अत्याचारों को करीब से देखा था और उन्हें लगने लगा था कि हिटलर को सत्ता से हटाना ही जर्मनी और यूरोप के लिए सही रास्ता है।

13 मार्च 1943 को क्या हुआ था?
13 मार्च 1943 को हिटलर पूर्वी मोर्चे पर जर्मन सेना का निरीक्षण करने के लिए आया। यह दौरा सोवियत क्षेत्र के पास स्थित स्मोलेंस्क के सैन्य मुख्यालय में था। ट्रेस्कोव और उनके साथियों को लगा कि यही वह मौका है जब हिटलर को खत्म किया जा सकता है इसे बाद उन्होंने योजना बनाई। योजना के अनुसार हिटलर के विमान में एक टाइम बम रख दिया जाएगा। जैसे ही विमान उड़ान भरेगा और कुछ समय बीतेगा, बम फट जाएगा और विमान हवा में ही नष्ट हो जाएगा।
विमान में छुपाया गया बम
इस योजना में ट्रेस्कोव के सहयोगी फैबियन वॉन श्लाब्रेनडॉर्फ भी शामिल थे। उन्होंने बम को एक शराब की बोतलों वाले पैकेट जैसा बना दिया। बाहर से देखने पर यह बिल्कुल सामान्य उपहार जैसा लग रहा था। फिर इस पैकेट को हिटलर के विमान में एक तोहफे के रूप में रखवा दिया गया। अभी तक हिटलर को साजिश की ना तो भनक लगी और ना ही किसी तरह का शक हुआ। जब हिटलर ने अपना दौरा पूरा किया और वापस जर्मनी लौटने के लिए विमान में बैठा तब वह बम उसी विमान में मौजूद था। सबको लगा अब हिटलर मारा जाएगा। हिटलर का विमान उड़ान भर चुका था। ट्रेस्कोव और उनके साथी पूरी तरह आश्वस्त थे कि अब कुछ ही देर में जोरदार धमाका होगा और हिटलर की मौत हो जाएगी। लेकिन, कई घंटे बीत गए और विमान में धमाके की कोई खबर नहीं आई।
बम फटा नहीं, साजिश छिपाने की हुई कोशिश
बाद में पता चला कि विमान के कार्गो हिस्से में तापमान बहुत कम था। इस अत्यधिक ठंड की वजह से बम का टाइमर सही तरीके से काम नहीं कर पाया। यानी तकनीकी कारणों से बम सक्रिय ही नहीं हुआ और विस्फोट नहीं हो सका। इस तरह हिटलर मौत के मुंह से निकल गया। जब साजिशकर्ताओं को पता चला कि बम नहीं फटा, तो उनकी चिंता बढ़ गई। अगर बम वाला पैकेट मिल जाता तो पूरी साजिश सामने आ जाती। सभी को तुरंत गिरफ्तार कर लिया जाता। इस स्थिति में फैबियन वॉन श्लाब्रेनडॉर्फ ने बेहद जोखिम भरा कदम उठाया। वो उस स्थान पर पहुंचे जहां हिटलर का विमान उतरा था और बहाने से बम वाला पैकेट वापस ले आए। इस तरह उन्होंने सबूत मिटा दिए और साजिश कुछ समय तक गुप्त बनी रही।

हिटलर के खिलाफ जारी रहे षड्यंत्र
13 मार्च 1943 की यह योजना असफल जरूर रही, लेकिन इससे हिटलर के खिलाफ विरोध खत्म नहीं हुआ। जर्मन सेना के कई अधिकारी लगातार नई योजनाएं बनाते रहे। आखिरकार 1944 में हिटलर को मारने की सबसे बड़ी कोशिश हुई, जिसे इतिहास में 20 July Plot के नाम से जाना जाता है। इस साजिश का नेतृत्व क्लॉस वॉन स्टॉफेनबर्ग ने किया था। उन्होंने हिटलर की बैठक में बम रखा था, लेकिन किस्मत से हिटलर उस धमाके में भी बच गया।
बदल जाता द्वितीय विश्व युद्ध का इतिहास
इतिहासकार मानते हैं कि अगर 13 मार्च 1943 की योजना सफल हो जाती तो द्वितीय विश्व युद्ध का इतिहास काफी अलग हो सकता था। संभव है कि जर्मनी में सत्ता परिवर्तन हो जाता और युद्ध जल्दी समाप्त हो जाता। इससे लाखों लोगों की जान बच जाती और यूरोप को कम विनाश झेलना पड़ता। लेकिन, ऐसा कुछ नहीं हुआ और हिटलर को मारने की साजिश नाकाम ही रही।
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