न्यूयॉर्कः जर्मनी ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में 2 दिन पहल ‘अफगानिस्तान की स्थिति’ पर तालिबान के खिलाफ एक मसौदा प्रस्ताव पेश किया था। इसमें मुख्य रूप से अफगानिस्तान में तालिबान शासन के तहत किए जा रहे मानवाधिकारों का हनन शामिल था। यह प्रस्ताव विशेष रूप से अफगानिस्तान की महिलाओं और लड़कियों को उनके मूलभूत अधिकारों से वंचित किए जाने के मुद्दे पर केंद्रित था। इसमें मानवाधिकार उल्लंघन की निंदा करना, आतंकवाद पर चिंता, मानवीय स्थिति और सहायता, यूएन की भूमिका जैसे प्रमुख बिंदु शामिल थे। मगर भारत तालिबान के खिलाफ लाए गए इस प्रस्ताव के खिलाफ वोटिंग करने से दूर रहा।
संयुक्त राष्ट्र में पास हुआ प्रस्ताव
भारत ने तो तालिबान के खिलाफ लाए गए इस प्रस्ताव पर संयुक्त राष्ट्र में मतदान नहीं, किया मगर 193 सदस्यीय इस महासभा में प्रस्ताव के पक्ष में 116 और विरोध में 2 मत पड़े। जबकि भारत समेत 12 देशों ने वोटिंग नहीं की। इस प्रकार इस प्रस्ताव को यूएन ने स्वीकार कर लिया।
प्रस्ताव का विस्तृत ब्यौरा
1. मानवाधिकार उल्लंघन की निंदा
इस प्रस्ताव में तालिबान द्वारा लागू लिंग-आधारित भेदभावपूर्ण नीतियों, जैसे लड़कियों की शिक्षा और महिलाओं के रोजगार पर प्रतिबंध की कड़ी निंदा की गई। इसमें तालिबान द्वारा मानवाधिकार रक्षकों, पत्रकारों और अल्पसंख्यक समुदायों पर अत्याचार की भी आलोचना थी।
2.आतंकवाद पर चिंता
प्रस्ताव में अफगानिस्तान की धरती से आतंकवादी गतिविधियों, विशेष रूप से अल-कायदा और इस्लामिक स्टेट जैसे संगठनों द्वारा संचालित गतिविधियों, पर चिंता व्यक्त की गई। हालांकि, भारत ने इस बिंदु को अस्पष्ट माना, क्योंकि इसमें क्षेत्रीय आतंकवादी समूहों (जैसे लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद) का स्पष्ट उल्लेख नहीं था।
3.मानवीय स्थिति और सहायता
प्रस्ताव में अफगानिस्तान में बिगड़ते मानवीय संकट, जैसे खाद्य असुरक्षा और विस्थापन, पर ध्यान आकर्षित किया और अंतरराष्ट्रीय समुदाय से सहायता बढ़ाने का आह्वान किया गया।
4.संयुक्त राष्ट्र की भूमिका
इसमें संयुक्त राष्ट्र मिशन इन अफगानिस्तान (UNAMA) की भूमिका को मजबूत करने और विशेष दूत की नियुक्ति पर जोर दिया गया। ताकि तालिबान के साथ समन्वय और निगरानी को बढ़ाया जा सके।
भारत ने मतदान से दूरी क्यों बनाई?
भारत ने इस प्रस्ताव पर मतदान से दूरी बनाने का निर्णय लिया। इसकी प्रमुख वजहें ये हैं....
- भारत का मानना था कि प्रस्ताव केवल तालिबान की निंदा और दंडात्मक उपायों पर केंद्रित था, जो प्रभावी नहीं होगा। संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि राजदूत पर्वतनेनी हरीश ने कहा कि संघर्षोत्तर स्थिति से निपटने के लिए एक संतुलित दृष्टिकोण की आवश्यकता है, जिसमें सकारात्मक व्यवहार को प्रोत्साहन और नकारात्मक कार्यों को हतोत्साहित करना शामिल हो। भारत ने प्रस्ताव में रचनात्मक जुड़ाव की कमी को रेखांकित किया।
- भारत ने प्रस्ताव में आतंकवाद के उल्लेख को अपर्याप्त और अस्पष्ट माना। भारत की सबसे बड़ी चिंता ये थी कि अफगानिस्तान की धरती का उपयोग क्षेत्रीय आतंकवादी संगठनों, जैसे लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद द्वारा किया जा सकता है, जिनका अप्रत्यक्ष रूप से पाकिस्तान से संबंध है। भारत ने इस बात पर जोर दिया कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय को इन संगठनों और उनके प्रायोजकों को जवाबदेह ठहराना चाहिए जो प्रस्ताव में स्पष्ट रूप से नहीं था।
3. तालिबान के साथ भारत की ‘सॉफ्ट एंगेजमेंट’ नीति
2021 में तालिबान के सत्ता में आने के बाद भारत ने अफगानिस्तान के साथ सीमित, लेकिन रणनीतिक जुड़ाव बनाए रखा है। भारत ने 2022 में काबुल में अपना तकनीकी मिशन फिर से शुरू किया और 50,000 मीट्रिक टन गेहूं, 330 मीट्रिक टन दवाइयाँ, और 2,000 छात्रों के लिए स्कॉलरशिप जैसी मानवीय सहायता प्रदान की। मतदान से दूरी बनाकर बिना उन्हें औपचारिक मान्यता दिए भारत ने तालिबान के साथ संवाद के रास्ते खुले रखने की कोशिश की।
- भारत का मानना है कि अफगानिस्तान में स्थिरता विशेष रूप से आतंकवाद के प्रसार को रोकने के लिए दक्षिण एशिया के लिए महत्वपूर्ण है। भारत ने प्रस्ताव में क्षेत्रीय आतंकवादी खतरों और उनके प्रायोजकों (जैसे पाकिस्तान) पर स्पष्ट कार्रवाई की कमी को एक कमजोरी माना। इसलिए वोट नहीं किया। भारत का यह रुख उसके राष्ट्रीय सुरक्षा हितों और क्षेत्रीय स्थिरता को प्राथमिकता देने को दर्शाता है।
- भारत ने ऐतिहासिक रूप से संयुक्त राष्ट्र में कुछ प्रस्तावों पर तटस्थ रुख अपनाया है। इस मामले में भी भारत ने न तो प्रस्ताव का समर्थन किया और न ही विरोध...ताकि वह अपनी स्वतंत्र नीति को बनाए रख सके।