बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के लिए तारीखों का ऐलान हो चुका है और इस बार सबसे खास बात ये है कि 243 सीटों के लिए मतदान दो ही चरणों में संपन्न हो जाएगा, जिसमें पहले चरण की वोटिंग 6 नवंबर को और दूसरे चरण की वोटिंग 11 नवंबर को होगी और मतगणना 14 नवंबर को होगी। इस तरह से पूरे चुनाव की प्रकिया 16 नवंबर को समाप्त हो जाएगी। बता दें कि वर्तमान विधानसभा का कार्यकाल 22 नवंबर को समाप्त हो रहा है। ये चुनाव कई मायनों में अहम है, एक तो महापर्व छठ के लिए बिहार से बाहर रहने वाले लोग अपने घर पूजा मनाने आए हैं, जो लोकतंत्र का महापर्व में भी हिस्सा लेकर ही लौटेंगे। एक तो चुनाव की टाइमिंग और दूसरे बिहार में बिछी सियासत के बनते बिगड़ते समीकरण, जिसमें खास है भाजपा की चुनावी रणनीति, जदयू और राजद की आरपार की लड़ाई...
बिहार में अलग होता है चुनाव का माहौल
बिहार विधानसभा चुनाव पर पूरे देश की नजर रहती है, कहते हैं कि हस्तिनापुर यानी दिल्ली की सत्ता की चाबी भी बिहार के पास होती है। राज्य में चुनाव महापर्व की तरह ही होता है और चुनाव को लेकर लोगों का मिजाज भी अन्य प्रदेशों से थोड़ा अलग होता है। शहर से लेकर गांव तक हर चौक चौराहे पर चुनावी बिसात बिछ जाती है और लोग सभी समीकरण वहीं बैठकर तय करते देखे जाते हैं। चाय की दुकानों पर चौपालों में सियासी बहसबाजी भी देखने सुनने का अपना अलग मजा है। जिस तरह से इस बार का चुनाव बिहारियों के लिए नई इबारत लिख सकता है। बिहार में बदलाव की लहर देखी जा रही है लेकिन चुनाव के रिजल्ट के बाद सत्ता किसकी होगी, ये कहना मुश्किल है।
नीतीश की अग्निपरीक्षा है ये चुनाव
बिहार की सियासत के दो शेर जिनकी दहाड़ पहले चुनाव के समय मंच से सुनाई देती थी, आज वो दहाड़ मंद पड़ गई है। लालू जहां अस्वस्थ हैं तो वहीं लंबे समय तक बिहार की सत्ता संभालने वाले और विकास पुरुष कहे जाने वाले मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का भाषण भी अब वैसा दमदार नहीं सुनाई दे रहा। उनकी तबीयत को लेकर भी कई तरह की अफवाहें चल रही हैं। पाला बदल बदलकर अपनी सीएम की कुर्सी बचाने वाले नीतीश कुमार का आगे का सियासी सफर कैसा रहेगा,
उनके लिए ये चुनाव अग्निपरीक्षा साबित होने वाला है और उनके राजनीतिक करियर का आखिरी पड़ाव भी साबित हो सकता है।
भाजपा से दोस्ती, उपहारों की सौगात
पिछले दो दशकों से अधिक समय से राजनीति के केंद्र में रहे नीतीश कुमार बिहार की महिलाओं और अतिपिछड़ा वर्ग (EBC) के वोटरों का भरोसा फिर से जीतना होगा, जो इस बार उतना आसान नहीं होगा। हालांकि नीतीश ही ऐसे पॉलिटिशियन हैं जिनकी पार्टी जदयू पिछले तीन बार के विधानसभा चुनावों में अच्छे नतीजे नहीं लाने के बावजूद सियासी धुरी बनी हुई है और बार बार गठबंधन बदलते रहने के बावजूद, नीतीश कुमार इस बार के चुनाव में भी भाजपा की खास जरूरत बने हुए हैं। भाजपा के साथ गठबंधन की ताकत, बिहार के लिए मुफ्त उपहारों की बरसात कर नीतीश एक बार फिर से सत्ता पर काबिज होने के ख्वाब देख रहे हैं।
तेजस्वी का लिटमस टेस्ट
दूसरी तरफ तेजस्वी यादव हैं जो पिता की विरासत के साथ साथ चुनावी पाठ पढ़कर सियासी तौर पर पूरी तरह से परिपक्व हो चुके हैं लेकिन उनकी पार्टी और साथ ही परिवार में चल रही कलह का उन्हें खासा नुकसान उठाना पड़ सकता है। कांग्रेस और वाम दलों को साधने के साथ ही तेजस्वी को वीआईपी के मुकेश सहनी ने बड़ी मांग कर पशोपेश में डाल दिया है। तेजस्वी को जहां नीतीश की कैबिनेट में काम करने का भी बेहतर अनुभव है तो वही वे बिहार में युवाओं के बीच काफी चर्चित राजनेता हैं। लेकिन बिहार की सत्ता पर काबिज होना उनके लिए इतना आसान नहीं होगा। इस चुनाव में लालू की सत्ता की बागडोर संभालने वाले उनके बेटे तेजस्वी यादव के सियासी तकदीर का फैसला भी हो जाएगा।
क्या कहता है समीकरण
लंबे समय से बिहार में पूर्ण बहुमत को तरसी भाजपा इस चुनाव में भी पूरा जोर लगाने को तैयार है, नीतीश कुमार को सीएम फेस बनाना मजबूरी हो या फिर जरूरत, भाजपा को बिहार में अपना जनाधार मजबूत करना ही होगा। बिहार में जदयू भाजपा नीत एनडीए को सीटों का तालमेल बैठाने में काफी मशक्कत करनी पड़ रही है। चिराग, मांझी, कुशवाहा को संतुष्ट करने में लगा एनडीए गठबंधन हालांकि इस बार भी अपनी जीत के लिए पूर्णरूपेण आश्वस्त है। लेकिन भाजपा, जदयू, राजद को कड़ी टक्कर इस बार प्रशांत किशोर की जनसुराज भी दे रही है। प्रशांत किशोर की पार्टी भले ही अधिक सीटें ना जीते लेकिन दोनों गठबंधन के वोट काटेगी ही।
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