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90 के दशक का यूपी, सौ एनकाउंटर और एक बेबस बाप, नई बोतल में पुरानी शराब जैसी है 'इंस्पेक्टर अविनाश सीजन 2'

 Written By: Jaya Dwivedie
 Published : May 15, 2026 10:32 am IST,  Updated : May 15, 2026 10:34 am IST

रणदीप हुड्डा के दमदार अभिनय और बेहतरीन सिनेमैटोग्राफी से सजी यह सीरीज 90 के दशक के यूपी की क्राइम ड्रामा को विस्तार देती है। कमजोर लेखन और घिसे-पिटे संवादों के बावजूद व्यक्तिगत संघर्ष और पुलिसिया राजनीति इसे एक मनोरंजक मासी ड्रामा बनाती हैं।

Inspector Avinash Season 2
इंस्पेक्टर अविनाश सीजन 2 रिव्यू Photo: IMAGE SOURCE-IMDB
  • फिल्म रिव्यू: Inspector Avinash Season 2
  • स्टार रेटिंग 3/5
  • पर्दे पर: 15 May 2026
  • डायरेक्टर: Neeraj Pathak
  • शैली: Action, Crime Thriller

भारतीय ओटीटी स्पेस में उत्तर प्रदेश के अपराध और पुलिसिया गलियारों की कहानियों की कोई कमी नहीं है। पिछले कुछ सालों में 'मिर्जापुर' और 'पाताल लोक' जैसे शो ने दर्शकों की उम्मीदों को एक खास स्तर पर पहुंचा दिया है। इसी कड़ी में नीरज पाठक द्वारा निर्देशित 'इंस्पेक्टर अविनाश' का दूसरा सीजन दस्तक दे चुका है। यह सीजन उस पृष्ठभूमि को और अधिक विस्तार देता है जिसे पहले सीजन में स्थापित किया गया था। यहां नायक अविनाश मिश्रा (रणदीप हुड्डा) की जलवा उनके दस्तक देने से पहले ही छा जाता है, एक ऐसा पुलिस अधिकारी जिसके नाम सौ से ज्यादा एनकाउंटर और उतने ही विवाद दर्ज हैं। सीजन 2 इसी को केंद्र में रखता है कि न्याय व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए इंस्पेक्टर अविनाश कितना जरूरी है।

कहानी का ताना-बाना

सीजन 2 की कहानी वहीं से शुरू होती है जहां पहला सीजन खत्म हुआ था, लेकिन इस बार इसका कैनवास काफी बड़ा है। उत्तर प्रदेश की गलियों से निकलकर यह नैरेटिव नेपाल, मध्य प्रदेश, बिहार और ओडिशा तक फैल जाता है। कहानी एसटीएफ अधिकारी अविनाश मिश्रा के इर्द-गिर्द घूमती है, जो न केवल बाहरी अपराधियों से लड़ रहे हैं, बल्कि विभाग के भीतर की राजनीति और सस्पेंशन की तलवार का भी सामना कर रहे हैं। इस बार उनका सामना शेख (अमित सियाल) के हथियार कार्टेल और सनकी अपराधी देवीकांत त्रिवेदी (अभिमन्यु सिंह) से है।

हालांकि इस सीजन की सबसे बड़ी खूबी इसका व्यक्तिगत मोड़ है। जब अविनाश के बेटे वरुण पर एक सहपाठी की हत्या का आरोप लगता है तो कहानी एक रिएक्शन बेस्ड पुलिस ड्रामा से बदलकर एक भावनात्मक मोड़ ले लेती है। यह ट्रैक दिखाता है कि जो पुलिसवाला बाहर गोलियों से न्याय करता है, वह घर के भीतर पैदा हुए कानूनी और नैतिक भंवर में कितना लाचार हो सकता है। स्क्रीनप्ले में राजनीतिक साजिशों और गैंगवार के बीच इस व्यक्तिगत त्रासदी को पिरोने की कोशिश की गई है, जो दर्शकों को जोड़े रखती है, भले ही कई सब प्लॉट कहानी को थोड़ा बोझिल बना देते हैं।

अभिनय

रणदीप हुड्डा इस सीरीज की आत्मा हैं। उन्होंने अविनाश मिश्रा के किरदार में जान फूंक दी है, उनके अनुभव ने किरदार को और अधिक विस्तार दिया है। 

वेदर्ड फिजिकलिटि के चलते ही हुड्डा इस किरदार को केवल एक लार्जर दैन लाइफ हीरो की तरह नहीं निभाते, बल्कि वे उसे मानवीय बनाते हैं। उनके चेहरे पर दिखने वाला अहंकार, चिंता और अपने परिवार के प्रति दबी हुई कोमलता उनके अभिनय के विभिन्न पहलुओं को उजागर करती है। यह हुड्डा की ही काबिलियत है कि संवादों की कमियों के बावजूद वे अपने हाव-भाव से सीन को संभाल ले जाते हैं।

अमित सियाल हमेशा की तरह अपनी इंटेलिजेंस के साथ पर्दे पर एक अलग ही ऊर्जा लेकर आते हैं। शेख के रूप में उनकी मौजूदगी कहानी में खतरे का आभास कराती रहती है। अभिमन्यु सिंह ने देवीकांत के रूप में एक सनकीपन पेश किया है जो डराने वाला है। रजनीश दुग्गल और राजेश खट्टर ने भी अपने सीमित दायरे में सधा हुआ काम किया है। एक अच्छा सरप्राइव उर्वशी रौतेला के रूप में मिलता है, पूनम के किरदार में वे कुछ भावनात्मक दृश्यों में काफी ईमानदार लगी हैं, खासकर उस दृश्य में जहां वे अपने बेटे की गिरफ्तारी के बाद घर छोड़ने का फैसला करती हैं।

निर्देशन और तकनीकी पक्ष

नीरज पाठक का निर्देशन ओल्ड स्कूल मास एंटरटेनमेंट की याद दिलाता है। उन्होंने इस सीरीज को संयमित क्राइम ड्रामा बनाने के बजाय लाउड और नाटकीय रखा है। उनका ध्यान बारीकियों से ज्यादा माहौल बनाने पर रहा है। तकनीकी मोर्चे पर चिरंतन दास की सिनेमैटोग्राफी शो का सबसे मजबूत पक्ष है। उन्होंने 90 के दशक के उत्तर प्रदेश के धूल भरे और हिंसक वातावरण को बहुत खूबसूरती से कैद किया है। एरियल शॉट्स और वाइड कंपोजिशन कहानी को एक भव्यता देते हैं, जो अक्सर वेब सीरीज में देखने को नहीं मिलती।

एडिटिंग का जिम्मा अर्चित डी. रस्तोगी ने संभाला है। इतनी लंबी और जटिल कहानी को उन्होंने चुस्त रखने की कोशिश की है, हालांकि स्क्रिप्ट की अपनी गति की समस्याओं के कारण कुछ जगहों पर दोहराव महसूस होता है। बैकग्राउंड स्कोर और साउंड डिजाइन भी सराहनीय हैं, जो तनावपूर्ण क्षणों में गहराई पैदा करते हैं। तकनीकी रूप से शो समृद्ध है, लेकिन लेखन की कमियों को तकनीकी चमक हमेशा नहीं छुपा पाती।

कहां चूक गई सीरीज?

'इंस्पेक्टर अविनाश' सीजन 2 की सबसे बड़ी कमजोरी इसका लेखन है। संवाद अक्सर वही पुराने घिसे-पिटे लगते हैं जो हमने पिछले दो दशकों की उत्तर भारतीय अपराध फिल्मों में कई बार सुने हैं। सिस्टम और वर्दी के बारे में भारी-भरकम बातें सुनने में तो अच्छी लगती हैं, लेकिन वे दर्शकों पर कोई स्थायी प्रभाव नहीं छोड़तीं। कहानी में पात्रों की अधिकता भी एक समस्या है, इतने सारे विलेन और सब-प्लॉट्स के कारण मुख्य नैरेटिव कभी-कभी अपनी धार खो देता है।

कुछ एक्शन सीक्वेंस, विशेष रूप से सचिन पहाड़ी वाला एनकाउंटर, जरूरत से ज्यादा नाटकीय और अव्यवस्थित लगते हैं। ऐसा लगता है कि यथार्थवाद की तुलना में शो 'स्वैग' को ज्यादा तरजीह दे रहा है। इसके अलावा महिला पात्रों का चित्रण अभी भी काफी सीमित है, वे या तो मुखबिर हैं या फिर पुरुषों के फैसलों से प्रभावित होने वाली मोहरे। डबिंग और ऑडियो ट्रांजिशन में भी कुछ तकनीकी खामियां खटकती हैं, जिससे कुछ दृश्यों का प्रभाव कम हो जाता है।

वर्डिक्ट

कुल मिलाकर 'इंस्पेक्टर अविनाश' का दूसरा सीजन उन लोगों के लिए एक अच्छा विकल्प है जो देसी मिजाज वाले पुलिस ड्रामे पसंद करते हैं। यह कोई ऐसी सीरीज नहीं है जो नैतिकता और कानून के बीच बहुत गहरी दार्शनिक बहस छेड़े, बल्कि यह एक ऐसी कहानी है जो अपनी रफ़्तार और माहौल के दम पर आगे बढ़ती है। रणदीप हुड्डा का शानदार अभिनय और चिरंतन दास की सिनेमैटोग्राफी इस सफर को देखने लायक बनाती है। भले ही इसमें नयापन कम हो और क्लीशे ज्यादा हों, लेकिन यह अपने लक्षित दर्शकों का मनोरंजन करना बखूबी जानती है। यह बिखरी हुई है, कभी-कभी दोहराव वाली भी है, लेकिन हुड्डा के अभिनय की चमक और अपराध जगत की पेचीदगियों के कारण यह आपको बोर नहीं होने देती। यदि आप उत्तर भारतीय परिवेश की कच्ची और हिंसक कहानियों के शौकीन हैं तो यह सीजन आपको निराश नहीं करेगा। हमारी तरफ से इस सीजन को 3 स्टार मिलते हैं, जो मुख्य रूप से रणदीप हुड्डा के प्रदर्शन और तकनीकी टीम की मेहनत के लिए हैं।

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