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मां का सम रिव्यू: गणित के सूत्रों में उलझे रिश्ते और जज्बात, मोना सिंह का अभिनय शानदार पर कहानी कमजोर

 Written By: जया द्विवेदी
 Published : Apr 03, 2026 01:07 pm IST,  Updated : Apr 03, 2026 01:53 pm IST

'मां का सम' गणित और जज्बातों के बीच उलझी एक औसत सीरीज है। मोना सिंह का अभिनय इसे संभालता है, लेकिन तकनीकी शब्दों और खिंची हुई पटकथा के कारण कहानी का मानवीय पक्ष दब जाता है। यह एक थका देने वाला समीकरण है।

maa ka sum
मां का सम का एक शॉट। Photo: PRIME VIDEO
  • फिल्म रिव्यू: मां का सम
  • स्टार रेटिंग 2/5
  • पर्दे पर: 03/04/2026
  • डायरेक्टर: निकोलस खरकोंगोर
  • शैली: ड्रामा

अक्सर कहा जाता है कि प्यार का कोई परिभाषा नहीं होती और न ही इसे किसी तराजू पर तौला जा सकता है, लेकिन जब एक यंग मैथ प्रॉडेजी अपनी सिंगल मदर की जिंदगी में प्यार के रंग भरने के लिए कैलकुलस और एल्गोरिदम का सहारा लेने लगे तो कहानी में एक अजीब सी जिज्ञासा पैदा होती है। अमेजन प्राइम वीडियो पर हाल ही में रिलीज हुई सीरी 'मां का सम' इसी अनूठे और पेचीदा विचार पर आधारित है। शीर्षक सुनने में थोड़ा 'कैची' और मजाकिया लगता है, जिसमें 'मां कसम' जैसे मुहावरे के साथ शब्दों का चतुराई भरा खेल खेला गया है। निर्देशक निकोलस खरकोंगोर, जिन्हें 'एक्सोन' जैसी बेहतरीन फिल्म के लिए जाना जाता है, इस बार रिश्तों के उलझे हुए धागों को गणित के सूत्रों से सुलझाने की कोशिश करते नजर आते हैं। हालांकि क्या यह मैथमेटिकल रोमांस दर्शकों के दिल के समीकरण में फिट बैठता है या सिर्फ एक जटिल पहेली बनकर रह जाता है, यही इस समीक्षा का मुख्य केंद्र है।

कैसी है पटकथा?

कहानी की शुरुआत दिल्ली के परिवेश में होती है, जहां अगस्त्य (मिहिर आहूजा) नाम का एक प्रतिभाशाली छात्र रहता है। अगस्त्य का जीवन केवल अंकों और डेटा के इर्द-गिर्द घूमता है। वह इतना तार्किक है कि एक आत्महत्या की कोशिश करने वाले छात्र को भी स्टेटिस्टिक  के जरिए समझा देता है कि जीवन में दुख सिर्फ कुछ ही पलों के लिए है, लेकिन असली कहानी तब शुरू होती है जब अगस्त्य अपनी मां, विनीता (मोना सिंह) के अकेलेपन को महसूस करता है। विनीता एक प्रॉपर्टी एजेंट है, जो अपने बेटे के लिए अपनी खुशियों को किनारे रख चुकी है।

अगस्त्य को लगता है कि जिस तरह वह जटिल से जटिल सवालों हल कर सकता है, उसी तरह वह अपनी मां के लिए एक परफेक्ट जीवनसाथी भी ढूंढ सकता है। वह डेटिंग ऐप्स और डेटा का यूज करके एक ऐसा फॉर्मूला तैयार करता है जो मां की पसंद-नापसंद को फिल्टर कर सके। यहीं से कहानी में टकराव शुरू होता है। पटकथा रवींद्र रंधावा और सुमृत शाही ने लिखी है, जो आधुनिक दौर की डेटिंग दुनिया और जेन-जी भाषा को पकड़ने की कोशिश करते हैं। शुरुआती एपिसोड्स में मां-बेटे के बीच की बॉन्डिंग और कूल पेरेंटिंग का तड़का काफी ताजा लगता है, लेकिन जैसे-जैसे शो आगे बढ़ता है, अगस्त्य की चिंता धीरे-धीरे नियंत्रण में बदलने लगती है। वह अपनी मां की स्वतंत्रता को अपने एल्गोरिदम के दायरे में कैद करना चाहता है, जो कहीं न कहीं दर्शकों को असहज करने लगता है।

अभिनय का ग्राफ

सीरीज की सबसे मजबूत कड़ी मोना सिंह हैं। 'जस्सी जैसी कोई नहीं' से लेकर अब तक, मोना ने अभिनय के मामले में एक लंबी दूरी तय की है। विनीता के किरदार में उन्होंने एक ऐसी सिंगल मदर की छवि पेश की है जो आधुनिक भी है और भावुक भी। उनकी आंखों में अपने बेटे के प्रति प्रेम और अपनी व्यक्तिगत इच्छाओं के बीच का संघर्ष साफ झलकता है। जब वह स्क्रीन पर आती हैं तो वह शो के बिखरे हुए हिस्सों को जोड़कर रखने का काम करती हैं। विशेष रूप से उन दृश्यों में जहां वह अपनी आजादी के लिए चुपचाप लड़ती हैं, उनका प्रदर्शन सराहनीय है।

दूसरी ओर मिहिर आहूजा ने अगस्त्य के रूप में एक चुनौतीपूर्ण भूमिका निभाई है। मिहिर एक शानदार अभिनेता हैं, लेकिन यहां उनकी भूमिका काफी कन्फ्यूजिंग है। उनका किरदार कभी बहुत मासूम लगता है तो कभी बहुत ही अहंकारी और टॉक्सिक। हालांकि मिहिर ने गणित के दीवाने छात्र की बारीकियों को अच्छे से पकड़ा है, लेकिन पटकथा की कमजोरी के कारण दर्शकों के लिए उनके साथ सहानुभूति रखना मुश्किल हो जाता है।

सहयोगी कलाकारों में शेफ रणवीर बरार ने विनीता के साथ एक अच्छी केमिस्ट्री साझा की है। उनका किरदार सहज है और वह अपनी स्क्रीन उपस्थिति से कहानी में थोड़ी राहत लाते हैं। अंगिरा धर एक प्रोफेसर के रूप में प्रभाव छोड़ने की कोशिश करती हैं, लेकिन उनके किरदार के पास करने के लिए बहुत कुछ नहीं है। सेलेस्टी बैरागी ने अगस्त्य की गर्लफ्रेंड के रूप में अपनी भूमिका के साथ न्याय किया है, हालांकि उनका किरदार एक निरंतर झुंझलाहट के भाव में फंसा हुआ महसूस होता है।

निर्देशन और तकनीकी पक्ष

निकोलस खरकोंगोर का निर्देशन इस बार थोड़ा फीका नजर आता है। उनकी पिछली फिल्म 'एक्सोन' में जो सजीवता और यथार्थवाद था, वह यहां गायब है। 'मां का सम' के अधिकांश सीन दिल्ली विश्वविद्यालय और लोधी कॉलोनी के आसपास सेट हैं, लेकिन सिनेमैटोग्राफी में वह गहराई नजर नहीं आती जो एक शहर को कहानी का हिस्सा बना देती है। कॉलेज कैंपस से लेकर घरों के अंदरूनी हिस्से तक, सब कुछ थोड़ा नकली या सेट जैसा लगता है। तकनीकी रूप से संपादन इस सीरीज की एक बड़ी कमजोरी है। आठ एपिसोड की यह सीरीज काफी खिंची हुई महसूस होती है। गणितीय ग्राफिक्स और सूत्रों का उपयोग शुरुआत में तो नयापन देता है, लेकिन बार-बार एक ही तरह के विजुअल इफैक्ट्स और लंबी-चौड़ी गणनाएं कहानी की गति को धीमा कर देती हैं। एक भावनात्मक ड्रामा को जबरदस्ती एक 'इंफोर्मेटिव' शो बनाने की कोशिश की गई है, जिससे दर्शक जुड़ाव महसूस नहीं कर पाते। साथ ही दिल्ली के सुरक्षित और असुरक्षित होने के चित्रण में भी विरोधाभास दिखता है, जैसे कि रात में एक लड़की का अकेले फुटपाथ पर बैठना, जो दिल्ली की वास्तविकताओं से मेल नहीं खाता।

खामियां

शो की सबसे बड़ी खामी इसका हद से ज्यादा मैथेमेटिकल होना है। कहानी कहने के दौरान गणित का उपयोग एक टूल के रूप में होना चाहिए था, न कि पूरी कहानी का आधार। दर्शकों को बार-बार जटिल शब्दजाल और समीकरणों से रूबरू कराया जाता है, जो आखिर उबाऊ हो जाता है। इसके अलावा शो ने कई गंभीर विषयों जैसे कि कॉन्ट्रासेप्टिव पिल, मानसिक स्वास्थ्य और बिना प्रोटेक्शन इंटिमेट होने जैसे मुद्दों को छुआ तो है, लेकिन उन्हें गहराई से एक्सप्लोर करने के बजाय केवल एक चेकलिस्ट की तरह इस्तेमाल किया है। सबसे चिंताजनक बात अगस्त्य का व्यवहार है। एक बेटा अपनी मां के जीवन को जिस तरह से ऑप्टिमाइज करने की कोशिश करता है, वह प्यार कम और पैट्रियार्की भरी सोच ज्यादा लगती है। शो इस व्यवहार को चुनौती देने या इसकी आलोचना करने के बजाय इसे हल्के-फुल्के अंदाज में पेश करता है, जो आज के समय में थोड़ा खटकता है।

एक अधूरा और थका देने वाला समीकरण

'मां का सम' एक बेहतरीन विचार के साथ शुरू हुआ था, यह दिखाने के लिए कि क्या तकनीक और तर्क इंसानी भावनाओं का स्थान ले सकते हैं, लेकिन यह अपने ही बनाए हुए जाल में उलझ कर रह जाता है। यह न तो पूरी तरह से एक पारिवारिक ड्रामा बन पाता है और न ही एक आधुनिक प्रेम कहानी। मोना सिंह के शानदार अभिनय और शुरुआती ताजगी के बावजूद यह सीरीज अपनी लंबाई और उबाऊ मैथेमेटिकल प्रयोगों के बोझ तले दब जाती है। यह शो उन लोगों के लिए शायद एक बार देखने लायक हो सकता है जो हल्की-फुल्की पारिवारिक नोंकझोंक पसंद करते हैं, लेकिन यदि आप एक ऐसी कहानी की तलाश में हैं जो दिल को छुए या कोई गहरा प्रभाव छोड़े तो यह आपको निराश कर सकता है। 'मां का सम' एक ऐसा सवाल है जिसे हल करने की कोशिश में लेखक और निर्देशक खुद उलझ गए हैं। मोना सिंह की परफॉर्मेंस इसे डूबने से बचाती है, लेकिन किनारा नहीं दिखा पाती है।

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