Friday, March 13, 2026
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EXPLAINER: अमेरिका को 4 साल में ही बदलनी पड़ गई रूस के खिलाफ रणनीति, पढ़िए ईरान, तेल और उससे पुतिन के लिए बने सुनहरे मौके की कहानी

Edited By: Vinay Trivedi Published : Mar 13, 2026 08:54 am IST, Updated : Mar 13, 2026 08:59 am IST

अमेरिका अब रूसी कच्चे तेल पर प्रतिबंधों को कम करने के लिए कदम उठा रहा है। अमेरिका ने रूसी तेल पर 2022 के बाद कब-कब और क्यों प्रतिबंध लगाया, और अब उसे अपने फैसले बदलने के लिए मजबूर क्यों होना पड़ा। इसके बारे में विस्तार से पढ़िए।

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Image Source : AP रूसी कच्चे तेल पर अमेरिका ने दी ढील, जानें प्रतिबंधों से लेकर अब फैसले बदलने तक की पूरी कहानी।

Israel Iran War: अमेरिका ने रूसी क्रूड ऑयल पर लगे कड़े प्रतिबंधों में एक महत्वपूर्ण ढील देने की घोषणा की है। अमेरिकी ट्रेजरी विभाग ने मार्च, 2026 में भारत और कुछ अन्य देशों को रूसी कच्चे तेल को खरीदने के लिए 30 दिन की विशेष छूट दे दी है। अमेरिका की तरफ से यह कदम ऐसे वक्त में उठाया गया जब वह लगातार अन्य देशों पर रूसी क्रूड ऑयल न खरीदने का दबाव बना रहा था। आइए विस्तार से समझें कि अमेरिका ने रूसी तेल पर यह बैन कब और क्यों लगाए थे, और अब उसे अपने ही निर्णय से पीछे हटने के लिए क्यों मजबूर होना पड़ा।

रूसी तेल पर कब और क्यों लगाए बैन?

बता दें कि जब रूस ने 24 फरवरी, 2022 को यूक्रेन पर हमला बोला, तो इसके जवाब में अमेरिका और पश्चिमी देशों ने मॉस्को की इकोनॉमी को कमजोर बनाने की रणनीति अपनाई। रूस की इनकम का सबसे बड़ा सोर्स उसका तेल और गैस एक्सपोर्ट था। मार्च, 2022 में अमेरिका ने अपने यहां रूसी क्रूड ऑयल, गैस और कोयले के इम्पोर्ट पर पूरी तरह से बैन लगा दिया। अमेरिकी प्रशासन ने इसका मकसद रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की 'वॉर मशीन' की फंडिंग को रोकना बताया था।

भारी डिस्काउंट पर रूस ने भारत को बेचा तेल

फिर दिसंबर, 2022 में अमेरिका, यूरोपियन यूनियन और G7 देशों ने मिलकर रूसी कच्चे तेल पर 60 डॉलर प्रति बैरल का 'प्राइस कैप' लागू कर दिया। इसका मुख्य उद्देश्य यह था कि दुनिया भर में तेल की सप्लाई तो बनी रहे, लेकिन रूस उससे ज्यादा मुनाफा न कमा पाए। इस प्रकार के बैन के बाद रूस अपना तेल भारी डिस्काउंट के साथ भारत और चीन को बेचने लगा। अमेरिका के ट्रंप प्रशासन ने हाल ही में भारत पर 25 प्रतिशत का टैरिफ भी लगाया था, ताकि भारत को रूस का क्रूड ऑयल खरीदने से रोका जाए।

अमेरिका को क्यों बदलना पड़ा अपना फैसला?

  • लेकिन वर्तमान में मध्य-पूर्व एशिया में तनाव और वैश्विक ऊर्जा बाजार की मजबूरियों की वजह से अमेरिका अपने कड़े रुख में नरमी लाने लिए मजबूर हो गया। इसके पीछे के मुख्य कारणों में से एक मिडिल-ईस्ट में गहराता युद्ध संकट है। ईरान और अमेरिका-इजरायल के बीच बढ़ती टेंशन की वजह से विश्व के सबसे अहम ऑयल ट्रेड रूट में से एक Strait of Hormuz से शिपिंग गंभीर तौर पर बाधित हुई है। दुनिया का करीबन 20-30 प्रतिशत तेल इसी रास्ते से गुजरता है। इस संकट की वजह से ग्लोबल मार्केट में क्रूड ऑयल की कीमतों में अचानक बड़ा उछाल आ गया।
  • इसका दूसरा बड़ा कारण ग्लोबल एनर्जी संकट और महंगाई का डर है। मिडिल-ईस्ट से तेल की आपूर्ति रुकने की वजह से दुनिया भर में ऊर्जा संकट का खतरा हो गया है। अमेरिकी ट्रेजरी सेक्रेटरी Scott Bessent के मुताबिक, क्रूड ऑयल के आसमान छूते दाम को रोकने और तेल की सप्लाई बनाए रखने के लिए यह विशेष छूट देना जरूरी हो गया था। कच्चा तेल महंगा होने की वजह से अमेरिका में भी घरेलू ईंधन का दाम बढ़ने का जोखिम था।
  • अमेरिकी प्रतिबंधों में नरमी की तीसरी वजह समंदर में फंसा लाखों बैरल रूसी क्रूड ऑयल भी है। अमेरिका को यह लगा कि अगर इस कच्चे तेल को तुरंत रिफाइनरियों तक नहीं पहुंचने दिया, तो तेल की कमी से ग्लोबल इकोनॉमी को बड़ा नुकसान हो सकता है।

अमेरिका का यह कदम इसका बड़ा उदाहरण है कि जियोपॉलिटिक्स में राष्ट्रीय हित और आर्थिक सुरक्षा आखिरकार सख्त प्रतिबंधों पर भारी पड़ गई। हालांकि, ट्रंप प्रशासन इसे सिर्फ 30 दिन का शॉर्ट-टर्म उपाय बताने में लगा हुआ है ताकि रूस को कोई बड़ा आर्थिक फायदा न हो, लेकिन यह तो साफ हो गया है कि मिडिल-ईस्ट के संकट ने अमेरिका को अपनी ही बैन वाली नीति के साथ व्यावहारिक समझौता करने के लिए विवश कर दिया। वहीं, इस बीच रूस को अपना कच्चा तेल भारत समेत तमाम देशों को बेचने का सुनहरा मौका मिल गया है।

यहां पढ़ें ईरान और अमेरिका-इजरायल की जंग से जुड़ा हर अपडेट

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