पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव का बिगुल बज चुका है। राज्य में 294 विधानसभा सीटों के लिए अप्रैल महीने के आखिर में वोटिंग होगी। चुनाव आयोग ने रविवार को बंगाल में चुनावी कार्यक्रम का ऐलान कर दिया है। पश्चिम बंगाल में चुनाव 2 चरण में होंगे। पहले चरण की वोटिंग 23 अप्रैल को और दूसरे चरण की वोटिंग 29 अप्रैल को होगी। वहीं, 4 मई को चुनाव के रिजल्ट सामने आएंगे। आइए जानते हैं कि इस विधानसभा चुनाव में सत्ताधारी दल तृणमूल कांग्रेस के लिए क्या चुनौतियां सामने हैं।
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस यानि टीएमसी के सामने कई चुनौती हैं। टीएमसी को अपने सामने ऐसे मजबूत विपक्ष बीजेपी से लड़ना है जो संगठनात्मक रूप से मजबूत और ध्रुवीकरण में माहिर है। हालांकि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की पार्टी टीएमसी एक दशक से ज्यादा लंबे समय से सत्ता में रहते हुए मजबूत ग्राउंड नेटवर्क और वफादार समर्थकों का आधार बनाए हुए हैं। इस सबके बीच ये चुनाव एसआईआर को लेकर चल रही तीखी राजनीतिक लड़ाई के बीच हो रहे हैं, और टीएमसी लगातार आरोप लगा रही है कि कुछ वर्गों के वोटरों को उनके वोट देने के अधिकार से वंचित किया गया है।
टीएमसी की सबसे बड़ी ताकत ममता बनर्जी का प्रभावशाली व्यक्तित्व है, जिनकी जमीनी छवि और उनका जुझारूपन बंगाल की राजनीतिक तस्वीर पर हावी है। टीएमसी का एक और महत्वपूर्ण पक्ष इसकी जमीनी स्तर पर संगठनात्मक मजबूती है, जो राज्य नेतृत्व से लेकर ग्रामीण और शहरी बंगाल में बूथ स्तर के कार्यकर्ताओं तक फैली हुई है। टीएमसी की व्यापक कल्याणकारी योजनाओं ने भी जनता के बीच अपनी पकड़ बनाई है और लाभार्थियों का एक बड़ा आधार तैयार किया है, जिसमें महिलाएं, ग्रामीण मतदाता और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के साथ पार्टी का जुड़ाव मजबूत हुआ है।

हालांकि, सत्ता में 15 साल बिताने के बाद टीएमसी को सत्ता-विरोधी लहर का भी सामना करना पड़ सकता है। इसके अलावा, पार्टी के भीतर गुटबाजी भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। जिला नेताओं के बीच गुटबाजी और राजनीतिक प्रभाव के लिए मची होड़ की वजह से अक्सर सार्वजनिक विवाद जन्म लेते हैं। इस तरह के तनाव संगठनात्मक एकता को कमजोर कर सकते हैं, वो भी ऐसे वक्त में जब पार्टी को एसआईआर प्रक्रिया के राजनीतिक प्रभावों का मजबूती से इकट्ठा होकर सामना करना है।
एसआईआर विवाद टीएमसी को अपने कोर वोटर्स को एकजुट करने का राजनीतिक अवसर है। टीएमसी खुद को मतदाताओं के अधिकारों का रक्षक साबित करने में लगी है और उन लोगों का समर्थन जुटा रही है जो अपने मताधिकार से वंचित होने से भयभीत हैं। इस रणनीति में टीएमसी खुद को सिर्फ राजनीतिक मुकाबले में ही नहीं बल्कि लोकतंत्र के रक्षक के तौर पर भी पेश करने में जुटी है। इसके अलावा, विपक्ष का बिखराव भी टीएमसी के लिए फायदेमंद साबित हो सकता है। यदि सत्ता विरोधी वोट विपक्षी दलों में बंट जाते हैं, तो सत्ताधारी टीएमसी कई विधानसभा क्षेत्रों में अपनी बढ़त बना सकती है।
हालांकि, बीजेपी ने राज्य में अपनी संगठनात्मक पकड़ मजबूत की है और भ्रष्टाचार, शासन व्यवस्था और कानून व्यवस्था जैसे मुद्दों पर सत्ताधारी दल को लगातार निशाना बना रही है। टीएमसी की एक और चुनौती उसके नेताओं पर भ्रष्टाचार के मामलों में कसा केंद्रीय जांच एजेसियों का शिकंजा भी है। जिसकी वजह से बीजेपी टीएमसी को घेरती रही है। ऐसे राज्य में जहां राजनीतिक रूप से चुनाव काफी संवेदनशील और प्रतिस्पर्धी हैं, वहां टीएमसी के लिए इन सभी चुनौतियों पर रणनीतिक जीत ही सत्ता में वापसी की राह बना सकती है।

पश्चिम बंगाल में चुनाव के लिए निर्वाचन आयोग ने डेटशीट जारी कर दी है। पहले चरण के चुनाव के लिए लिए 30 मार्च को नोटिफिकेशन जारी होगा। इसके बाद 6 अप्रैल तक नामांकन किया जाएगा। 9 अप्रैल को नामांकन वापस लेने की आखिरी तारीख है। वहीं, 23 अप्रैल को फर्स्ट फेज की वोटिंग होगी। सेकंड फेज के चुनाव के लिए 9 अप्रैल को नामांकन भरने की आखिरी तारीख है जिसे 13 अप्रैल तक वापस लिया जा सकता है। 29 अप्रैल को दूसरे चरण की वोटिंग होगी। वहीं, चुनाव के परिणाम 4 मई को सामने आएंगे।
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