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कोविदार वृक्ष को क्यों किया गया राम मंदिर पर लहराने वाले धर्म ध्वज पर अंकित? जान लें इसका धार्मिक महत्व

Written By: Naveen Khantwal
Published : Nov 25, 2025 01:12 pm IST,  Updated : Nov 25, 2025 01:12 pm IST
राम मंदिर पर लहराने वाली धर्म ध्वजा पर ॐ, सूर्य और कोविदार वृक्ष अंकित हैं। सूर्य जहां वीरता, ऊर्जा और श्रीराम के सूर्यवंशी होने का प्रतीक हैं वहीं ॐ शाश्वत ध्वनि का प्रतीक है। वहीं कोविदार वृक्ष को अयोध्या की प्राचीन परंपरा का प्रतीक माना जाता है। सिर्फ यही नहीं कोविदार वृक्ष कई औषधियों का स्रोत भी माना जाता है।
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राम मंदिर पर लहराने वाली धर्म ध्वजा पर ॐ, सूर्य और कोविदार वृक्ष अंकित हैं। सूर्य जहां वीरता, ऊर्जा और श्रीराम के सूर्यवंशी होने का प्रतीक हैं वहीं ॐ शाश्वत ध्वनि का प्रतीक है। वहीं कोविदार वृक्ष को अयोध्या की प्राचीन परंपरा का प्रतीक माना जाता है। सिर्फ यही नहीं कोविदार वृक्ष कई औषधियों का स्रोत भी माना जाता है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, कोविदार वृक्ष देवी-देवताओं को अतिप्रिय है। जिस तरह तुलसी के आसपास सकारात्मक ऊर्जा वास करती है वैसे ही कोविदार वृक्ष भी हमें सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करता है। कोविदार वृक्ष के दिव्य गुणों के कारण भी इसे राम मंदिर के धर्म ध्वजा पर लगाया गया है।
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धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, कोविदार वृक्ष देवी-देवताओं को अतिप्रिय है। जिस तरह तुलसी के आसपास सकारात्मक ऊर्जा वास करती है वैसे ही कोविदार वृक्ष भी हमें सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करता है। कोविदार वृक्ष के दिव्य गुणों के कारण भी इसे राम मंदिर के धर्म ध्वजा पर लगाया गया है।
माना जाता है कि कोविदार वृक्ष श्रीराम जी के समय राजचिह्न था। इस वृक्ष को उस समय भी राजचिह्न के रूप में ध्वजा पर अंकित किया जाता था। कोविदार वृक्ष को उस समय संपन्नता, शौर्य और धर्म के प्रतीक रूप में देखा जाता था। कोविदार वृक्ष का महत्व धार्मिक ग्रंथों में भी हमको देखने को मिलता है।
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माना जाता है कि कोविदार वृक्ष श्रीराम जी के समय राजचिह्न था। इस वृक्ष को उस समय भी राजचिह्न के रूप में ध्वजा पर अंकित किया जाता था। कोविदार वृक्ष को उस समय संपन्नता, शौर्य और धर्म के प्रतीक रूप में देखा जाता था। कोविदार वृक्ष का महत्व धार्मिक ग्रंथों में भी हमको देखने को मिलता है।
वाल्मीकि रामायण के 84वें सर्ग में कोविदार वृक्ष के चिह्न को देखकर निषादराज गुह अयोध्या की सेना को पहचानते हैं। वहीं 96वें सर्ग के 18वें श्लोक में यह वर्णित है कि लक्ष्मण जी ने भी कोविदार वृक्ष के चिह्न को देखकर सेना को पहचाना था। इस चिह्न को देखने के बाद लक्ष्मण कहते हैं कि भरत को आने दीजिए।
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वाल्मीकि रामायण के 84वें सर्ग में कोविदार वृक्ष के चिह्न को देखकर निषादराज गुह अयोध्या की सेना को पहचानते हैं। वहीं 96वें सर्ग के 18वें श्लोक में यह वर्णित है कि लक्ष्मण जी ने भी कोविदार वृक्ष के चिह्न को देखकर सेना को पहचाना था। इस चिह्न को देखने के बाद लक्ष्मण कहते हैं कि भरत को आने दीजिए।
कोविदार वृक्ष को आयुर्वेद में भी ऊंचा स्थान प्राप्त है। आयुर्वेद में इसके फूल और छाल दोनों का ही इस्तेमाल किया जाता है। इससे बनी औषधि टीबी, रक्तविकार आदि की समस्याओं को दूर करती है। यही वजह है कि कोविदार वृक्ष को हिंदू धर्म में उच्च स्थान प्राप्त है।
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कोविदार वृक्ष को आयुर्वेद में भी ऊंचा स्थान प्राप्त है। आयुर्वेद में इसके फूल और छाल दोनों का ही इस्तेमाल किया जाता है। इससे बनी औषधि टीबी, रक्तविकार आदि की समस्याओं को दूर करती है। यही वजह है कि कोविदार वृक्ष को हिंदू धर्म में उच्च स्थान प्राप्त है।
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