21 मार्च यानी आज वर्ल्ड डाउन सिंड्रोम डे है। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि ज्यादातर मामलों में जब 21वें क्रोमोसोम के दो की जगह तीन कॉपीज होती हैं, तब डाउन सिंड्रोम हो सकता है। हेल्थ एक्सपर्ट्स के मुताबिक 35 वर्ष से ज्यादा उम्र की महिलाओं में डाउन सिंड्रोम वाले बच्चे को जन्म देने का खतरा ज्यादा होता है। आइए डाउन सिंड्रोम के लक्षणों के बारे में जानते हैं जिससे पता लगाया जा सके कि कहीं आपका बच्चा भी इस सिंड्रोम का शिकार तो नहीं है...
बनावट पर गौर करें- चेहरे की बनावट से अंदाजा लगाया जा सकता है कि बच्चे तो ये सिंड्रोम है या फिर नहीं। चेहरा चपटा होना डाउन सिंड्रोम का संकेत साबित हो सकता है। अगर बच्चे की आंखें बादाम के आकार की तरह दिख रही हैं, तो आपको डॉक्टर से कंसल्ट कर लेना चाहिए। इसके अलावा आंखें ऊपर की ओर झुकी हुई होना और छोटी नाक होना भी डाउन सिंड्रोम का लक्षण हो सकता है।
डॉक्टर ने क्या कहा- दिल्ली के रोहिणी में स्थित वेदा क्लिनिक के डॉक्टर अस्तिक जोशी, चाइल्ड, एडोलेसेंट एवं फॉरेंसिक साइकियाट्रिस्ट के अनुसार डाउन सिंड्रोम एक जन्मजात (जेनेटिक) स्थिति है, जिसमें बच्चे के शारीरिक और मानसिक विकास पर असर पड़ता है। इसके कुछ प्रमुख लक्षणों में चेहरे की विशेष बनावट जैसे चपटा चेहरा, छोटी नाक और तिरछी आंखें, मांसपेशियों का ढीलापन, जन्म के बाद विकास में देरी (बैठना, चलना, बोलना), सीखने में कठिनाई और बौद्धिक विकास धीमा होना, हाथों में एक ही गहरी रेखा और कुछ बच्चों में दिल या अन्य अंगों से जुड़ी जन्मजात समस्याएं शामिल हो सकती हैं।
विकास में देरी- आपकी जानकारी के लिए बता दें कि अगर आपके बच्चे को बैठने में या फिर घुटनों के बल चलने में या फिर चलने में सामान्य बच्चों की तुलना में ज्यादा समय लग रहा है, तो हो सकता है कि उसे डाउन सिंड्रोम हो। बाहर निकली हुई जीभ भी डाउन सिंड्रोम की तरफ इशारा कर सकती है। इस तरह के लक्षणों के अलावा बोलने और भाषा सीखने में कठिनाई होने पर आपको अपने बच्चे की जांच करवा लेनी चाहिए।
हाथ-पैर पर गौर करें- बच्चे के छोटे हाथ, छोटी उंगलियां और हथेली में एक ही गहरी रेखा होना, डाउन सिंड्रोम का संकेत साबित हो सकता है। सिर का आकार छोटा होना और छोटी गर्दन, जिसके पीछे अतिरिक्त त्वचा हो सकती है, ये लक्षण भी डाउन सिंड्रोम की तरफ इशारा कर सकता है। एक साथ इस तरह के लक्षण नजर आने पर आपको देर नहीं करनी चाहिए और तुरंत किसी अच्छे से डॉक्टर से कंसल्ट कर लेना चाहिए।
कैसे करें पहचान- डॉक्टर के मुताबिक जन्म के समय या उसके तुरंत बाद डॉक्टर शारीरिक लक्षणों के आधार पर शक कर सकते हैं। प्रेग्नेंसी के दौरान ही कुछ स्क्रीनिंग टेस्ट (जैसे एनटी स्कैन, डबल मार्कर टेस्ट) से जोखिम का पता लगाया जा सकता है। कन्फर्मेशन के लिए कैरियोटाइपिंग (क्रोमोजोमल टेस्ट) किया जाता है, जिससे अतिरिक्त क्रोमोसोम (Trisomy 21) की पुष्टि होती है। अगर बच्चा विकास के माइलस्टोन समय पर पूरा नहीं कर रहा है, तो तुरंत विशेषज्ञ से परामर्श लेना जरूरी है।
क्या करना चाहिए- डाउन सिंड्रोम का इलाज पूरी तरह संभव नहीं है, लेकिन स्पीच थेरेपी, फिजियोथेरेपी और विशेष शिक्षा से बच्चे की क्षमता को काफी हद तक बेहतर किया जा सकता है। डॉक्टर के मुताबिक समय पर पहचान और सही मार्गदर्शन से ऐसे बच्चे भी एक बेहतर और स्वतंत्र जीवन जी सकते हैं।
| ये भी पढ़ें: |
|
रोज मुट्ठी भर मखाने खाने से क्या होता है, पोषण का भंडार ड्राई फ्रूट, सेहत को पहुंचाएगा चौतरफा लाभ |
|
बेल पत्र के पत्ते चबाने से शरीर पर क्या असर पड़ता है, कब सेवन करना सबसे ज्यादा फायदेमंद? |
डिस्क्लेमर: इस आर्टिकल में सुझाए गए टिप्स केवल आम जानकारी के लिए हैं। सेहत से जुड़े किसी भी तरह का फिटनेस प्रोग्राम शुरू करने अथवा अपनी डाइट में किसी भी तरह का बदलाव करने या किसी भी बीमारी से संबंधित कोई भी उपाय करने से पहले अपने डॉक्टर से सलाह जरूर लें। इंडिया टीवी किसी भी प्रकार के दावे की प्रामाणिकता की पुष्टि नहीं करता है।