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दुर्घटनाओं की वैश्विक राजधानी होने के तमगे से बच सकता है भारत: SC

 Written By: Bhasha
 Published : Dec 18, 2016 10:15 am IST,  Updated : Dec 18, 2016 10:15 am IST

वर्ष 2009 के आंकड़ों के अनुसार, विश्व भर में हुई सड़क दुर्घटनाओं में से सबसे ज्यादा दुर्घटनाएं भारत में हुईं। इससे हर 4 मिनट में एक सड़क दुर्घटना होने के संकेत मिले।

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नई दिल्ली: अकेले वर्ष 2014 में ही भारत में राष्ट्रीय और राज्यीय राजमार्गों पर कुल 2.37 लाख सड़क दुर्घटनाएं हुईं, जिनमें कम से कम 85,462 लोग मारे गए और 2.59 लाख लोग घायल हो गए। ये सनसनीखेज नतीजे उच्चतम न्यायालय के समक्ष रखे गए आधिकारिक आंकड़ों में शामिल थे। इनमें कहा गया कि वर्ष 2009 के आंकड़ों के अनुसार, विश्व भर में हुई सड़क दुर्घटनाओं में से सबसे ज्यादा दुर्घटनाएं भारत में हुईं। इससे हर 4 मिनट में एक सड़क दुर्घटना होने के संकेत मिले।

पिछले कई साल में वाहन दुर्घटनाओं में हुई मौतों के आंकड़ों पर गौर करते हुए शीर्ष अदालत ने कहा था कि भारत दुनिया की दुर्घटना राजधानी होने के तमगे से बच सकता है। इसके साथ ही न्यायालय ने शराब पीकर वाहन चलाने से रोकने के नियम के पर्याप्त क्रियान्वयन की जरूरत पर जोर दिया था।

शीर्ष अदालत ने कहा कि आर्थिक विकास के शीर्ष पर चल रहे भारत जैसे देश के लिए जरूरी है कि वह सड़क दुर्घटनाओं में, खासकर नशे में वाहन चालन के कारण, लोगों की कीमती जिंदगियों को बर्बाद होने से रोकने के लिए कानून का समुचित तरीके से क्रियान्वयन करे।ये टिप्पणियां

शीर्ष अदालत ने 15 दिसंबर को अपने फैसले में कीं। इसके जरिए उसने देशभर के राष्ट्रीय और राज्यीय राजमार्गों पर शराब की सभी दुकानों को प्रतिबंधित करने का आदेश जारी कर दिया। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि मौजूदा दुकानों के लाइसेंस का अगले साल 31 मार्च के बाद नवीनीकरण नहीं किया जाएगा।

प्रधान न्यायाधीश टी एस ठाकुर की अध्यक्षता वाली तीन न्यायाधीशों की पीठ ने कहा, मानव जीवन कीमती है। भारत में सड़कों के जाल का विस्तार होने के चलते, सड़क अवसंरचना के आर्थिक विकास का अभिन्न अंग होने के चलते, दुर्घटनाएं आम नागरिक के जीवन पर गहरा असर डालती हैं। आर्थिक विकास के रास्ते पर चल रहा देश होने के नाते, भारत विश्व की दुर्घटना राजधानी होने के तमगे से बच सकता है।

पीठ में न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति एल नागेश्वर राव भी शामिल थे। पीठ ने सरकारी एजेंसियों द्वारा अपने समक्ष रखे गए आंकड़ों पर गौर किया, जिनके अनुसार, वर्ष 2012 में राष्ट्रीय राजमार्गों पर सड़क दुर्घटनाओं में मरने वालों की संख्या 48,768 थी और यह वर्ष 2015 में बढ़कर 51,204 हो गई।

वर्ष 2014 में राष्ट्रीय राजमार्गों पर कुल 1.24 लाख दुर्घटनाएं हुईं, जिनमें 46,110 मौतें हो गईं और 1.35 लाख लोग घायल हो गए। वहीं, राज्यीय राजमार्गों पर 1.13 लाख दुर्घटनाएं हुईं, जिनमें 1.24 लाख लोग घायल हुए और 39,352 लोग मारे गए।

पीठ ने अपने आदेश में कहा, एक्सप्रेस वे पर दुर्घटना के 4,208 मामले हुए, जिनमें 4,229 लोग घायल हुए और 1,802 लोग मारे गए। आंकड़ों को वर्ष 2014 के दौरान हुई सड़क दुर्घटनाओं की वजहों के आधार पर भी वितरित किया गया। घायल हुए 1.38 लाख लोग खतरनाक या लापरवाहीपूर्ण तरीके से वाहन चलाने के कारण हुई दुर्घटनाओं का शिकार हुए थे और 42,127 लोग मारे गए।

आदेश में पीठ ने यह भी कहा, तेज गति से वाहन चलाने के कारण हुई दुर्घटनाओं में घायल होने वालों की संख्या 1.81 लाख थी, जबकि इन दुर्घटनाओं में मरने वालों की संख्या 48,654 थी। नशे में वाहन चलाने के दौरान हुई दुर्घटनाओं के मामले 7,307 थे, जिनके कारण 7,398 लोग घायल हुए और 2,591 लोग मारे गए।

शीर्ष अदालत ने कहा कि एक दिसंबर 2011 को सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के प्रधान सचिवों को जारी एक परामर्श में कहा था कि भारत में सड़क दुर्घटनाओं में हताहत होने वालों की संख्या विश्व भर में सबसे ज्यादा है और वर्ष 2009 के आंकड़े दर्शाते हैं कि हर चार मिनट पर एक सड़क दुर्घटना होती है।

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