जम्मू और कश्मीर की सुंदरता का रहस्य उसकी नदियों, झीलों और झरनों में छिपा है। वहीं, यह खूबसूरती आज बड़ी खामोशी से कश्मीर को एक ऐसी तबाही की और ले जा रही है जिसे वक्त रहते रोका न गया तो कश्मीर की झीलें एक इतिहास बन कर रह जाएंगी। भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (CAG) के हालिया ऑडिट से पता चला है कि इस केंद्रशासित प्रदेश में पिछले कुछ दशकों में 500 से ज़्यादा झीलें या तो पूरी तरह से गायब हो गई हैं या फिर काफी हद तक सिकुड़ गई हैं, जिससे पर्यावरण को लेकर गंभीर चिंताएं पैदा हो गई हैं। ये आंकड़े चौंकाने वाले हैं। 1967 में दर्ज की गई 697 प्राकृतिक झीलों में से 315 झीलें तो पूरी तरह से लुप्त हो चुकी हैं, जबकि 203 झीलों का आकार काफी छोटा हो गया है। इसका मतलब है कि 518 झीलें (लगभग 74%) किसी न किसी रूप में प्रभावित हुई हैं।
क्या है झीलों को नुकसान के कारण?
क्षेत्रफल के लिहाज से इस इलाके ने अपनी झीलों का लगभग 2,850 हेक्टेयर सतही क्षेत्र खो दिया है। यह न केवल झीलों की संख्या में आई कमी को दर्शाता है, बल्कि यह भी बताता है कि यहां जल-विस्तार में भी भारी गिरावट आई है। रिपोर्ट में इस बात पर प्रकाश डाला गया है कि 63 झीलें अपने मूल क्षेत्रफल का आधे से अधिक हिस्सा खो चुकी हैं, जिससे उनके अस्तित्व पर ही खतरा मंडरा रहा है। तेजी से हो रहा शहरीकरण, अतिक्रमण, कुप्रबंधन और संरक्षण के लिए लगातार प्रयासों की कमी को इस गिरावट के मुख्य कारणों के रूप में पहचाना गया है।

विशेषज्ञों ने क्या कहा?
विशेषज्ञों का कहना है कि कश्मीर की खूबसूरती का एक अहम हिस्सा उसकी झीलों, नदियों और झरनों में छिपा है। CAG की हाल ही में जारी रिपोर्ट गहरी चिंता की बात है, क्योंकि यह बताती है कि पिछले कुछ दशकों में एशिया की सबसे बड़ी झील- वूलर-डल झील के साथ-साथ अपनी पुरानी शान खोती दिख रही है। इस गिरावट के मुख्य कारण अतिक्रमण, प्रदूषण और कुप्रबंधन हैं। इस स्थिति के लिए सरकार और आम जनता दोनों जिम्मेदार हैं। अगर बची हुई झीलों को बचाने के लिए समय पर कदम नहीं उठाए गए, तो कश्मीर न सिर्फ अपनी अंदरूनी खूबसूरती खो देगा, बल्कि उसके टूरिज्म सेक्टर को भी बड़ा झटका लगेगा। इसके अलावा, देखे गए क्लाइमेट चेंज जिससे ग्लेशियर पिघल रहे हैं और झीलें गायब या सिकुड़ रही हैं, ने बाढ़ जैसे हालात की संभावना को काफी बढ़ा दिया है। आम लोगों के साथ-साथ सरकार को भी इसे बहुत गंभीरता से लेना होगा।
315 झीलें पहले ही गायब हो गईं
पृथ्वी विज्ञान के वैज्ञानिक फैज़ान आरिफ ने कहा- "अगर हम CAG की रिपोर्ट देखें, तो उसमें बताया गया है कि 1967 में जम्मू-कश्मीर में 697 झीलें थीं। मौजूदा हालात के मुताबिक, 315 झीलें पहले ही गायब हो चुकी हैं, जो कुल झीलों का 45% है; जबकि 203-205 झीलें गायब होने की कगार पर हैं। कुल मिलाकर, 74% झीलें प्रभावित हैं। या तो वे सिकुड़ रही हैं या पूरी तरह से गायब हो चुकी हैं। सरकार से लेकर आम लोगों तक, सभी इसके लिए ज़िम्मेदार हैं। अगर हम सरकारी विभागों की बात करें जैसे वन विभाग, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड या झील संरक्षण बोर्ड जो इनका प्रबंधन करते हैं; या पर्यटन विभाग, या शहरी नियंत्रण विभाग, तो ये सभी ज़िम्मेदार हैं। साथ ही, आम लोग भी उतने ही ज़िम्मेदार हैं, जिन्होंने इन जमीनों को खेती या बागवानी की जमीन में बदल दिया, या इन पर निर्माण कार्य करके घर बना लिए। इसके अलावा, बिना साफ किया हुआ सीवेज भी इन जलाशयों में जाता है। इसलिए लोग और सरकार, दोनों ही समान रूप से जिम्मेदार हैं।

मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने क्या कहा?
इस मुद्दे पर जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने कहा, हम इसे अपने आस-पास हर जगह देखते हैं। चाहे वह श्रीनगर और उसके आस-पास के जल स्रोत हों या फिर ग्रामीण इलाके। इनमें से कई जल स्रोत या तो पूरी तरह से लुप्त हो गए हैं या फिर काफी हद तक सिकुड़ गए हैं। शहरीकरण, जमीन पर बढ़ते दबाव और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के कारण ये जल स्रोत कम होते जा रहे हैं। इनमें से कुछ कारक शायद हमारे नियंत्रण में हों, जबकि कुछ कारक एक बड़ी और ज़्यादा जटिल चुनौती का हिस्सा हैं। लेकिन एक बात जो साफ है, वह यह कि हम पर्यावरण को जो नुकसान पहुंचा रहे हैं, उसके प्रति हमें कहीं ज़्यादा जागरूक होने की जरूरत है। यह सिर्फ सरकार की जिम्मेदारी नहीं है; इसके लिए हम सभी को जो जम्मू-कश्मीर में रहते हैं, मिलकर सामूहिक प्रयास करने होंगे।
स्थानीय लोगों ने भी जताई चिंता
वहीं, इन झीलों की तस्वीर देख कर लोग भी बेहद चिंतित हैं। लोगों का कहना है कि एक वक्त ऐसा था जब कश्मीर की झीलों का पानी लोग पीने के लिए इस्तेमाल करते थे। यहां बड़ी रौनक हुआ करती थी। ये झील, कश्मीर की दूसरी झीलें, खास कर डल झील और निगीन झील से कनेक्ट हो जाते थे। पर्यटक एक बार शिकारा की सवारी का आनंद लेने और मछली पकड़ने के लिए खुशाल सार झील में आते थे। हालांकि, अतिक्रमण और प्रदूषण के कारण यह झील आज डंपिंग साइट बनकर रह गई है। अब यह झील कम और नाला ज्यादा दिखता है। ख़ुशाल सार झील इस दुर्दशा में अकेली नहीं है; श्रीनगर का सबसे बड़ा डल झील, भी इसी तरह के भाग्य का सामना कर रहा है। पिछले कुछ दशकों में, डल झील का एक महत्वपूर्ण हिस्सा सूख गया है, और इसके आंतरिक क्षेत्रों में अतिक्रमण बढ़ गया है। होटलों से निकलने वाला सारा कचरा सीधे डल में प्रवाहित होता है। स्थानीय लोगों को दुख है कि झील की मौजूदा हालत देखकर उनकी आंखों में आंसू आ जाते हैं।

आज के समय में, पृथ्वी वैज्ञानिक यह मानते हैं कि मौसम और प्रकृति का व्यवहार, धरती पर रहने वाले इंसानों के लिए किसी परमाणु खतरे से भी कहीं ज़्यादा बड़ा और खतरनाक खतरा है। ऐसे में पर्यावरण को और ज़्यादा नुकसान से बचाने और आने वाली पीढ़ियों के लिए इस क्षेत्र के नाजुक पर्यावरण को सुरक्षित रखने के लिए एक व्यापक नीतिगत हस्तक्षेप, विभिन्न विभागों के बीच बेहतर तालमेल और समुदाय की भागीदारी की तत्काल आवश्यकता है।
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