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सरकार ने लिया था मुस्लिम आरक्षण खत्म करने का फैसला, अब बॉम्बे हाई कोर्ट ने मांगा जवाब

 Reported By: Sachin Chaudhary Edited By: Vineet Kumar Singh
 Published : Apr 02, 2026 06:33 pm IST,  Updated : Apr 02, 2026 06:33 pm IST

बॉम्बे हाई कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार से मुस्लिम शिक्षा आरक्षण खत्म करने पर जवाब मांगा है। एक याचिका में 2014 में मुस्लिमों को शिक्षा में दिए गए 5 फीसदी आरक्षण को हटाने को असंवैधानिक बताया गया है।

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बॉम्बे हाई कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार से जवाब मांगा है। Image Source : PTI FILE

मुंबई: बॉम्बे हाई कोर्ट ने मुस्लिम समुदाय को शिक्षा में दिए जाने वाले 5 फीसदी आरक्षण को खत्म करने के फैसले पर महाराष्ट्र सरकार से जवाब मांगा है। इस मामले में दाखिल याचिका पर 2 अप्रैल को सुनवाई हुई। जस्टिस रियाज छागला और जस्टिस अद्वैत सेठना की खंडपीठ ने गुरुवार को राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वह इस महीने के अंत तक अपना हलफनामा दाखिल करे। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि इस मामले की अगली विस्तृत सुनवाई 4 मई को की जाएगी। कोर्ट ने याचिकाकर्ता को भी जरूरी दस्तावेज उपलब्ध कराने के निर्देश दिए हैं।

एडवोकेट एजाज़ नकवी ने दाखिल की है याचिका

अदालत ने कहा, 'राज्य सरकार अप्रैल के मध्य तक अपना हलफनामा दाखिल करे और यदि याचिकाकर्ता को कोई जवाबी हलफनामा दाखिल करना हो, तो वह उसके एक सप्ताह के भीतर दाखिल करे। मामले को 4 मई को आगे की सुनवाई के लिए रखा जाए। याचिकाकर्ता अगली तारीख से पहले विवादित जीआर और अन्य दस्तावेजों की अनुवादित प्रतियां उपलब्ध कराए।' बता दें कि यह याचिका एडवोकेट एजाज़ नकवी ने दाखिल की है। इसमें 17 फरवरी को राज्य सरकार द्वारा जारी उस सरकारी प्रस्ताव (GR) को चुनौती दी गई है, जिसके जरिए 2014 के अध्यादेश को वापस ले लिया गया।

'आरक्षण का खात्मा संविधान के सिद्धांतों के खिलाफ'

2014 के अध्यादेश के तहत मुस्लिम समुदाय की करीब 50 जातियों को शिक्षा में 5 फीसदी आरक्षण दिया गया था। याचिका में कहा गया है कि इस आरक्षण को अचानक खत्म करना संविधान के सिद्धांतों के खिलाफ है। नकवी ने अपनी याचिका में कहा, 'जरूरतमंद नागरिकों के लिए समानता और बंधुत्व के संवैधानिक सिद्धांतों का उल्लंघन किया जा रहा है। यह संविधान के मूल ढांचे को प्रभावित करता है। महाराष्ट्र के सामाजिक न्याय और विशेष सहायता विभाग द्वारा जारी जीआर संविधान के खिलाफ है और सामाजिक व शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों (SEBC) तथा मुस्लिम समुदाय के हितों के विरुद्ध है।'

मुस्लिम समुदाय की 50 पिछड़ी जातियां ले रही थीं लाभ

नकवी के मुताबिक, 2014 में तत्कालीन कांग्रेस-NCP सरकार ने मराठा समुदाय को 16 फीसदी और मुस्लिम समुदाय को 5 फीसदी आरक्षण देने का फैसला किया था। हालांकि बाद में हाई कोर्ट ने मुस्लिम आरक्षण को केवल शिक्षा तक सीमित रखा था, जबकि सरकारी नौकरियों में इसे लागू नहीं होने दिया गया। याचिका में यह भी बताया गया है कि तब से मुस्लिम समुदाय की करीब 50 पिछड़ी जातियां शिक्षा में इस आरक्षण का लाभ ले रही थीं। इस दौरान न तो कोई बड़ी आपत्ति दर्ज की गई और न ही पिछड़ा वर्ग आयोग के सामने कोई शिकायत आई।

'सरकार ने फैसले के पक्ष में ठोस आंकड़े पेश नहीं किए'

नकवी ने कहा कि इसके बावजूद राज्य सरकार ने बिना ठोस कारण बताए यह आरक्षण वापस ले लिया। याचिकाकर्ता का आरोप है कि सरकार ने अपने फैसले को सही ठहराने के लिए कोई ठोस या 'मात्रात्मक आंकड़े (Quantifiable Data)' भी पेश नहीं किए हैं। फिलहाल, इस मामले पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं और 4 मई को होने वाली अगली सुनवाई में इस विवाद पर आगे की स्थिति साफ हो सकती है।

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