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"बेटी गुस्से में पिता पर रेप का आरोप लगाए, यह कल्पना करना भी कठिन", बॉम्बे हाई कोर्ट ने लगाई उम्रकैद पर मुहर

 Edited By: Malaika Imam @MalaikaImam1
 Published : Mar 10, 2026 07:39 am IST,  Updated : Mar 10, 2026 07:53 am IST

बॉम्बे हाई कोर्ट ने पिता के दावे को बेहद मनगढ़ंत बताया। कोर्ट ने कहा कि यह कल्पना करना भी कठिन है कि कोई बेटी केवल गुस्से या नाराजगी के कारण अपने पिता पर रेप जैसा गंभीर आरोप लगाएगी।

बॉम्बे हाई कोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को सही ठहराया।- India TV Hindi
बॉम्बे हाई कोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को सही ठहराया। Image Source : FILE (PTI)

मुंबई: बॉम्बे हाई कोर्ट ने एक फैसले पर सुनवाई करते हुए कहा कि यह कल्पना करना भी कठिन है कि कोई बेटी केवल गुस्से या नाराजगी के कारण अपने पिता पर रेप जैसा गंभीर और कलंककारी आरोप लगाएगी। अदालत ने अपनी नाबालिग बेटी का यौन शोषण करने वाले एक पिता की आजीवन कारावास की सजा को बरकरार रखते हुए उसकी दलीलों को सिरे से खारिज कर दिया।

क्या है पूरा मामला?

दरअसल, यह मामला 2018 का है, जब मुंबई के एक स्कूल में 'पुलिस दीदी' जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किया गया था। इस कार्यक्रम के दौरान 10वीं कक्षा में पढ़ने वाली एक छात्रा ने स्कूल काउंसलर को अपनी आपबीती सुनाई। उसने आरोप लगाया कि उसका पिता कई वर्षों से उसका यौन शोषण कर रहा है।

पॉक्सो (POCSO) की विशेष अदालत ने 2020 में इस मामले में सुनवाई करते हुए आरोपी पिता को दोषी पाया और उसे आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। इसी सजा के खिलाफ आरोपी ने हाई कोर्ट में अपील दायर की थी।

आरोपी का अजीबोगरीब तर्क

अपनी अपील में पिता ने एक अजीबोगरीब तर्क दिया। उसने दावा किया उसकी बेटी ने उसे इसलिए फंसाया, क्योंकि उसने उसे पढ़ाई बीच में ही छोड़ने के लिए मजबूर किया था, जिसे उसने माता-पिता द्वारा उठाए गए अनुशासनात्मक कदम के रूप में पेश किया, जिससे उसकी बेटी के मन में नाराजगी पैदा हुई। उसका दावा था कि इसी बात से नाराज होकर और गुस्से में आकर उसकी बेटी ने उसे झूठे मामले में फंसाया।

अदालत की कड़ी टिप्पणी

न्यायमूर्ति मनीष पिताले और न्यायमूर्ति श्रीराम शिरसात की खंडपीठ ने इन तर्कों को बेहद मनगढ़ंत करार दिया। अदालत ने फैसले के दौरान कहा, "यह मानना ​​अत्यधिक कठिन है कि केवल पढ़ाई छुड़ाने जैसी नाराजगी के कारण कोई बेटी अपने पिता के खिलाफ इतना गंभीर और घिनौना आरोप लगाएगी। पीड़िता का बयान पूरी तरह विश्वसनीय है और इसमें सच्चाई नजर आती है।"

अदालत ने कहा कि पिता द्वारा अपनी अनुशासन की कार्रवाई को बचाव के रूप में इस्तेमाल करना स्वीकार्य नहीं है। खंडपीठ ने निचली अदालत के फैसले को सही ठहराते हुए आरोपी की याचिका खारिज कर दी।

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