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पूर्व PM अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में हुए ये 5 बड़े आर्थिक फैसले, सब एक से बढ़कर एक

 Published : Dec 25, 2025 08:56 pm IST,  Updated : Dec 25, 2025 08:57 pm IST

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी अपने कार्यकाल के दौरान कई महत्वपूर्ण फैसले लागू किए, जिनसे देश में आर्थिक विकास और तरक्की का रास्ता खुला। उन्हें हमेशा एक महान दूरदर्शी नेता के तौर पर याद किया जाएगा, जिन्होंने कानूनी और आर्थिक दोनों मोर्चों पर बहुत कुछ हासिल किया।

अटल बिहारी वाजपेयी को आधुनिक भारतीय दूरसंचार का जनक माना जाता है। - India TV Hindi
अटल बिहारी वाजपेयी को आधुनिक भारतीय दूरसंचार का जनक माना जाता है। Image Source : BJP.ORG/ANI

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का कार्यकाल भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए मील का पत्थर साबित हुआ। उनकी दूरदर्शिता और साहसी फैसलों ने न केवल देश के आर्थिक ढांचे को मजबूत किया, बल्कि वैश्विक मंच पर भारत की स्थिति को भी नया आयाम दिया। वाजपेयी जी ने कई ऐसे ऐतिहासिक निर्णय लिए, जिनका असर आज भी महसूस किया जाता है। गोल्डन क्वाड्रिलैटरल हाईवे परियोजना से लेकर दूरसंचार सुधारों तक, उनके द्वारा किए गए इन पांच प्रमुख आर्थिक फैसलों ने देश को विकास की नई दिशा दी। आइए, जानते हैं वाजपेयी के कार्यकाल के कुछ ऐसे ऐतिहासिक फैसलों के बारे में, जिन्होंने भारत की अर्थव्यवस्था को नया मुकाम दिलाया।

अटल बिहारी वाजपेयी को आधुनिक भारतीय दूरसंचार का जनक माना जाता है। गोल्डन क्वाड्रिलैटरल हाईवे परियोजना

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का नजरिया, उत्तर-दक्षिण और पूर्व-पश्चिम को जोड़ने का था, ने भारत की सबसे महत्वाकांक्षी हाईवे परियोजना-गोल्डन क्वाड्रिलैटरल (स्वर्णिम चतुर्भुज परियोजना) शुरू करने का फैसला किया। इस परियोजना के तहत 5,846 किलोमीटर लंबी चार और छह लेन वाली सड़कों का निर्माण किया गया, जो दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, कोलकाता, और बेंगलुरु जैसे प्रमुख शहरों को जोड़ती है। इसके अलावा, अहमदाबाद, जयपुर, विजयवाड़ा, विशाखापत्तनम, और कटक जैसे औद्योगिक और आर्थिक केंद्रों को भी जोड़ने वाली यह सड़कें न केवल यातायात को सुविधाजनक बनाती हैं, बल्कि व्यापार और उद्योगों को भी एक नए मुकाम पर ले गई हैं। इसके साथ ही, इस नेटवर्क ने नए बाजारों को भी खोला, जिससे कई कंपनियां अपने ग्राहकों तक तेजी से पहुंचने में सक्षम हो पाई हैं।

दूरसंचार क्षेत्र में सुधार

अटल बिहारी वाजपेयी को आधुनिक भारतीय दूरसंचार का जनक माना जाता है। उनकी सरकार ने 1999 में नेशनल टेलीकॉम पॉलिसी पेश की, जिसने भारत में दूरसंचार क्षेत्र का स्वरूप बदलकर रख दिया। इस नीति ने निजी कंपनियों को अवसर प्रदान किया, जिससे उन्होंने भारतीय बाजार में बड़े पैमाने पर निवेश किया और दूरसंचार क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव किया। इसके परिणामस्वरूप सरकारी एकाधिकार का अंत हुआ, कॉल दरें कम हुईं, और टेलीफोन नेटवर्क की गुणवत्ता में जबरदस्त सुधार हुआ।

FRBM अधिनियम का गठन

kotaksecurities के मुताबिक, वाजपेयी सरकार ने 2003 में "फिस्कल रिस्पॉन्सिबिलिटी एंड बजट मैनेजमेंट (FRBM) एक्ट" को लागू किया। इस कानून का उद्देश्य भारत के राजकोषीय घाटे को 3% तक सीमित रखना था, जिससे आर्थिक स्थिरता सुनिश्चित हो सके। इस अधिनियम ने सार्वजनिक वित्त के प्रबंधन में पारदर्शिता और जिम्मेदारी सुनिश्चित की। इसके अलावा, यह कानून सरकार को अपनी वित्तीय स्थिति पर जवाबदेही के दायरे में लाया और दीर्घकालिक वित्तीय स्थिरता की दिशा में कदम बढ़ाए।

सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रमों (पीएसयू) का निजीकरण

वाजपेयी सरकार के कार्यकाल (1999-2004) में सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (पीएसयू) का निजीकरण एक महत्वपूर्ण पहल रही। हालांकि निजीकरण की शुरुआत 1990 के दशक में नरसिंह राव सरकार ने की थी, वाजपेयी ने इसे एक नए दिशा में बढ़ाया। इस दौरान कई प्रमुख कंपनियों जैसे मारुति उड्योग, भारत एल्युमिनियम, हिंदुस्तान जिंक, इंडियन पेट्रोकेमिकल्स और मॉडर्न फूड इंडस्ट्रीज का निजीकरण किया गया। इसके लिए एक विशेष मंत्रालय का गठन किया गया, जिसकी जिम्मेदारी अरुण शौरी के नेतृत्व में पीएसयू के निजीकरण की प्रक्रिया को लागू करना था। इसे वाजपेयी के कार्यकाल के दौरान निजीकरण का 'स्वर्णिम युग' माना जाता है।

ईंधन कीमतों के प्रशासनिक नियंत्रण का उन्मूलन

1970 के दशक से 2000 के शुरुआती वर्षों तक भारत में पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों का निर्धारण "एडमिनिस्टर्ड प्राइस मेकनिज्म (एपीएम)" के तहत किया जाता था, जिसमें राज्य-स्वामित्व वाली कंपनियाँ पेट्रोल और डीजल की कीमतों का निर्धारण करती थीं। 2002 में, वाजपेयी सरकार ने APM को समाप्त किया और पेट्रोल की कीमतों को नियंत्रित करने की प्रणाली को समाप्त करने की दिशा में कदम बढ़ाया। 2010 में पेट्रोल कीमतों का पूरी तरह से उन्मूलन हो गया, और 2014 में डीजल की कीमतों को भी पूरी तरह से मुक्त कर दिया गया। यह कदम देश में ईंधन की कीमतों में अधिक लचीलापन लाया और अंतरराष्ट्रीय बाजार में होने वाले उतार-चढ़ाव के अनुसार कीमतों का निर्धारण करने की स्वतंत्रता प्रदान की।

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