साल 2026 भारतीय शेयर बाजार के लिए अब तक काफी उतार-चढ़ाव भरा साबित हुआ है। वैश्विक अनिश्चितताओं, विदेशी निवेशकों की बिकवाली और बढ़ती भू-राजनीतिक तनाव के बीच बाजार में तेज गिरावट देखने को मिली है। इसका असर यह हुआ कि भारतीय बाजार का कुल मार्केट कैपिटलाइजेशन यानी मार्केट कैप करीब 533 अरब डॉलर (लगभग ₹49 लाख करोड़) तक घट गया है। यह गिरावट पिछले करीब 15 साल में सबसे बड़ी मानी जा रही है।
मौजूदा समय में भारतीय शेयर बाजार की कुल मार्केट कैप लगभग 4.77 ट्रिलियन डॉलर रह गई है, जो अप्रैल 2025 के बाद का सबसे निचला स्तर है। साल की शुरुआत में यह करीब 5.3 ट्रिलियन डॉलर थी। यानी कुछ ही महीनों में बाजार की कुल वैल्यू में लगभग 10 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। इससे पहले 2011 में भारतीय बाजार में पूरे साल के दौरान करीब 625 अरब डॉलर का मार्केट कैप साफ हुआ था। इस लिहाज से 2026 में अब तक की गिरावट बेहद बड़ी मानी जा रही है।
कई देशों के बाजार से ज्यादा नुकसान
दिलचस्प बात यह है कि भारतीय बाजार से जितना मार्केट कैप घटा है, वह कई देशों के पूरे शेयर बाजार के आकार से भी ज्यादा है। उदाहरण के तौर पर यह गिरावट मेक्सिको, मलेशिया, दक्षिण अफ्रीका, नॉर्वे, फिनलैंड, वियतनाम और पोलैंड जैसे देशों के कुल बाजार मूल्य से भी बड़ी बताई जा रही है।
क्यों आई इतनी बड़ी गिरावट?
मार्केट एक्सपर्ट्स के मुताबिक बाजार में गिरावट के पीछे कई कारण हैं। साल की शुरुआत से ही विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली देखने को मिली है। इसके अलावा कंपनियों की आय में उम्मीद के मुताबिक तेजी नहीं आई है, जिससे निवेशकों का भरोसा कमजोर हुआ है। वहीं वैश्विक स्तर पर भी हालात बाजार के पक्ष में नहीं रहे। अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच बढ़ता संघर्ष और कच्चे तेल की कीमतों में तेजी ने बाजार की चिंता बढ़ा दी है। कच्चे तेल की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर पहुंचने से भारत के आयात बिल और महंगाई पर भी दबाव बढ़ सकता है।
बड़े इंडेक्स भी फिसले
2026 में अब तक सेंसेक्स करीब 10.8 प्रतिशत और निफ्टी लगभग 9.5 प्रतिशत गिर चुके हैं। वहीं मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों में भी कमजोरी देखी गई है।
निवेशकों के लिए क्या है संकेत?
मार्केट एक्सपर्ट्स का कहना है कि मौजूदा गिरावट निवेशकों के लिए चिंता का विषय जरूर है, लेकिन लंबी अवधि के निवेशकों के लिए यह मौके भी पैदा कर सकती है। ऐसे समय में घबराकर फैसले लेने के बजाय मजबूत कंपनियों में लंबी अवधि का नजरिया अपनाना ज्यादा फायदेमंद हो सकता है।