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म्यूचुअल फंड इन्वेस्टर्स को झटका या राहत? SEBI ने बदला एक्सपेंस रेशियो का नियम, आपकी कमाई पर पड़ेगा सीधा असर

 Edited By: Shivendra Singh
 Published : Dec 18, 2025 09:11 am IST,  Updated : Dec 18, 2025 09:11 am IST

म्यूचुअल फंड में पैसा लगाने वालों के लिए सेबी (SEBI) ने एक अहम बदलाव किया है। यह बदलाव आपकी जेब पर सीधा असर डाल सकता है, क्योंकि अब म्यूचुअल फंड की फीस यानी एक्सपेंस रेशियो को नए और साफ तरीके से तय किया जाएगा।

SEBI की नई गाइडलाइन से...- India TV Hindi
SEBI की नई गाइडलाइन से बदलेगा म्यूचुअल फंड गेम Image Source : CANVA

म्यूचुअल फंड में निवेश करने वालों के लिए बाजार नियामक सेबी (SEBI) ने एक बड़ा बदलाव किया है। यह बदलाव सीधे आपकी जेब से जुड़ा है, क्योंकि इसमें फंड की फीस यानी एक्सपेंस रेशियो को नए तरीके से तय और दिखाने का फैसला लिया गया है। पहली बार सुनने में यह नियम थोड़ा मुश्किल लग सकता है, लेकिन इसका असली मकसद निवेशकों को यह साफ-साफ बताना है कि उनका पैसा कहां खर्च हो रहा है और फंड हाउस उनसे कितनी फीस वसूल रहा है। इससे छिपे हुए खर्चों पर रोक लगेगी और निवेशकों को ज्यादा पारदर्शिता मिलेगी।

अब तक म्यूचुअल फंड का एक्सपेंस रेशियो एक मिक्स पैकेज जैसा होता था। इसमें फंड मैनेजमेंट फीस के साथ-साथ टैक्स और दूसरे सरकारी चार्ज भी जुड़े होते थे। इससे निवेशकों को यह समझना मुश्किल होता था कि असल में फंड हाउस कितनी फीस ले रहा है। अब सेबी ने इसे बदलते हुए एक नया कॉन्सेप्ट पेश किया है, जिसे बेस एक्सपेंस रेशियो (BER) कहा गया है।

क्या है बेस एक्सपेंस रेशियो?

BER का मतलब है फंड चलाने की असली फीस। इसमें अब GST, सिक्योरिटीज ट्रांजैक्शन टैक्स (STT), स्टांप ड्यूटी, सेबी फीस और एक्सचेंज चार्ज शामिल नहीं होंगे। ये सभी चार्ज अलग से, वास्तविक खर्च के हिसाब से लगाए जाएंगे। आसान शब्दों में कहें तो अब कुल खर्च चार हिस्सों में बंटेगा- BER, ब्रोकरेज, रेगुलेटरी लेवी और स्टैच्यूटरी लेवी। इससे निवेशक साफ-साफ देख पाएंगे कि उनका पैसा कहां जा रहा है।

एक्सपेंस रेशियो की सीमा भी घटी

सेबी ने कई कैटेगरी में BER की अधिकतम सीमा भी कम कर दी है। जैसे इंडेक्स फंड और ETF के लिए इसे 1% से घटाकर 0.9% कर दिया गया है। इक्विटी आधारित फंड-ऑफ-फंड्स और क्लोज-एंडेड स्कीम्स में भी पहले के मुकाबले कम सीमा तय की गई है। इसका मतलब है कि फंड हाउस अब मनमाने ढंग से ज्यादा फीस नहीं ले सकेंगे।

ब्रोकरेज पर भी कसी नकेल

सेबी ने ट्रेडिंग से जुड़े ब्रोकरेज चार्ज भी घटाए हैं। कैश मार्केट में ब्रोकरेज की सीमा 6 बेसिस पॉइंट कर दी गई है, जबकि डेरिवेटिव्स में इसे और कम किया गया है। इससे खासकर एक्टिव फंड्स में ट्रेडिंग कॉस्ट धीरे-धीरे घट सकती है।

निवेशकों के लिए क्या बदलेगा?

शॉर्ट टर्म में निवेशकों को कोई बड़ा फायदा या झटका महसूस नहीं हो सकता, क्योंकि टैक्स और सरकारी चार्ज तो पहले की तरह देने ही होंगे। लेकिन लंबी अवधि में यह नियम पारदर्शिता बढ़ाएगा, छिपे खर्च रोकेगा और फंड्स को ज्यादा अनुशासित बनाएगा। सबसे बड़ा फायदा यह है कि अब निवेशक बेहतर तरीके से तुलना कर पाएंगे और समझ सकेंगे कि कौन सा फंड वाकई किफायती है।

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