वैसे तो हिंदू धर्म में एकादशी तिथि भगवान विष्णु का समर्पित मानी जाती है। कहा जाता है कि एक बार मुर नाम के दैत्य ने भगवान विष्णु को विश्राम के समय में युद्ध के लिए ललकारा, लेकिन भगवान विष्णु गहरी निद्रा में थे तो दैत्य ने उन्हें निद्रा के दौरान ही मारने की योजना बनाई। फिर जैसे वह भगवान विष्णु के करीब पहुंचा तभी एकादशी नाम की एक कन्या भगवान विष्णु के शरीर से उत्पन्न हुई थी, और फिर उसने मुर नाम के दैत्य का वध कर दिया।
जब भगवान विष्णु को यह बात पता चली तो वह प्रसन्न हुए और एकादशी को सभी तीर्थों व तीथियों में प्रधान होने का वरदान दिया। तभी से एकादशी तिथि भगवान को समर्पित है और उनकी पूजा का विधान है, लेकिन एक तिथि ऐसी भी है, जिसमें भगवान विष्णु की नहीं बल्कि भगवान शिव की पूजा की जाती है। इस एकादशी को रंगभरी एकादशी के नाम से जाना जाता है।
क्यों होती भगवान शिव की पूजा?
इस तिथि पर काशी विश्वनाथ में भगवान शिव और मां पार्वती की विशेष पूजा अर्चना की जाती है। मान्यता है कि इसी दिन बाबा भोलेनाथ मां पार्वती का गौना कराकर पहली बार काशी नगरी लाए थे और इस मौके को सभी नगरवासियों ने गुलाल के साथ उत्सव रूप में मनाया था। इसी तिथि पर भगवान विष्णु के साथ आंवले के पेड़ की भी पूजा का विधान है।
कब मनाई जाएगी रंगभरी एकादशी?
यह तिथि 09 मार्च को सुबह 07.45 बजे आरंभ होगी, जो 10 मार्च को सुबह 07.44 बजे खत्म होगी। उदया तिथि की मान्यता के कारण यह तिथि 10 मार्च को मनाई जाएगी। वहीं, पारण करने का समय 11 मार्च की सुबह 06.35 बजे से 08.13 बजे तक चलेगी।
कैसे की जानी चाहिए पूजा?
इस दिन सुबह जातक को जल्दी उठकर स्नान कर दीप जलाना चाहिए। फिर घर के मंदिर में भगवान को गंगाजल से अभिषेक करें और उनके सामने दीपक जलाएं। साथ ही भगवान विष्णु को पुष्प और तुलसी चढ़ाएं। साथ ही भगवान शिव और मां पार्वती को भी जलाभिषेक कराएं और उन्हें बेलपत्र, फूल आदि अर्पित करें। इसके बाद भगवान को भोग लगाएं और उनकी आरती करें।
(Disclaimer: यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। इंडिया टीवी एक भी बात की सत्यता का प्रमाण नहीं देता है।)
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