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Garun Puran: संन्यास से बेहतर है गृहस्थ आश्रम, क्यों विवाह करना इतना जरूरी? गरुड़ पुराण में इस पहलू को किया है उजागर

 Written By: Arti Azad @Azadkeekalamse
 Published : Apr 29, 2026 04:44 pm IST,  Updated : Apr 29, 2026 04:44 pm IST

Garun Puran: गरुड़ और मार्कण्डेय पुराण के अनुसार विवाह केवल परंपरा नहीं, बल्कि मोक्ष का आधार है। इनमें यह स्पष्ट किया गया है कि गृहस्थ जीवन अपनाए बिना व्यक्ति अपने कर्तव्यों और ऋणों से मुक्त नहीं हो सकता। चलिए जानते हैं आखिर क्यों विवाह संस्कार को इतना महत्वपूर्ण बताया गया है।

Garud Puran- India TV Hindi
गरुड़ पुराण में बताया है क्यों संन्यास से बेहतर है गृहस्थ आश्रम Image Source : INDIA TV

Garun Puran: हिंदू धर्म में विवाह को केवल सामाजिक बंधन नहीं, बल्कि एक महत्वपूर्ण आध्यात्मिक संस्कार माना गया है। शास्त्रों में इसे जीवन के चार आश्रमों में सबसे अहम ‘गृहस्थ आश्रम’ की शुरुआत बताया गया है, जो व्यक्ति को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की ओर अग्रसर करता है। चलिए जानते हैं हिंदू धर्म में आखिर क्यों गृहस्थ जीवन के संन्यास से भी बेहतर कहा गया है और शादी करना इतना जरूरी क्यों माना जाता है। गरुड़ पुराण में इन अहम पहलूओ को उजागर किया गया है।  

विवाह हिंदूओं के 16 संस्कारों में से एक

हिंदू धर्म के 16 संस्कारों में विवाह का विशेष स्थान बताया गया है। इसे गृहस्थ जीवन की पहली सीढ़ी माना जाता है। आमतौर पर विवाह को केवल परिवार बसाने या वंश बढ़ाने से जोड़ा जाता है, लेकिन शास्त्रों के अनुसार इसका उद्देश्य इससे कहीं अधिक व्यापक और आध्यात्मिक है।

रुचि प्रजापति का वैराग्य मार्ग

प्राचीन कथाओं में वर्णित रुचि प्रजापति अत्यंत ज्ञानी और वैराग्यवान थे। उन्होंने विवाह और पारिवारिक जीवन का त्याग कर संन्यास का मार्ग चुना। वे दिन में एक बार भोजन करते और एकांत में रहते हुए आत्मचिंतन में लीन रहते थे। उनका मानना था कि संसारिक संबंध दुखों का कारण हैं।

संन्यासी और गृहस्थों के बीच का संतुलन

मार्कण्डेय पुराण में वर्णित प्रसंग के अनुसार, उनके पूर्वज यानी पितृगण उनके सामने प्रकट हुए और उनसे अविवाहित रहने का कारण पूछा। पितरों ने समझाया कि जिसे वे बंधन समझ रहे हैं, वही विवाह वास्तव में स्वर्ग और मोक्ष का मार्ग है। यह संवाद संन्यास और गृहस्थ जीवन के बीच संतुलन को स्पष्ट करता है।

ऋणों से मुक्ति का मार्ग

गरुड़ पुराण (आचार कांड) के अनुसार, हर मनुष्य जन्म के साथ तीन प्रमुख ऋण देव, पितृ और ऋषि ऋण लेकर आता है। इन ऋणों से मुक्ति केवल गृहस्थ आश्रम के माध्यम से ही संभव मानी गई है। विवाह के बाद ही व्यक्ति इन कर्तव्यों को पूर्ण रूप से निभा सकता है।

गृहस्थों के जरूरी कर्तव्य

शास्त्रों में बताया गया है कि देवताओं को 'स्वाहा' कहकर यज्ञ में आहुति देना, पितरों को 'स्वधा' के साथ तर्पण करना और अतिथियों को भोजन कराना ये सभी कर्तव्य गृहस्थ जीवन में ही संभव हैं। गरुड़ पुराण और मार्कण्डेय पुराण में कहा गया है कि 'स्वधा' के बिना पितरों तक तर्पण नहीं पहुंचता।

कर्तव्य त्यागने का परिणाम

पितरों ने रुचि प्रजापति को चेतावनी दी कि अगर कोई व्यक्ति संतान उत्पत्ति, देव पूजा और पितृ तर्पण जैसे कर्तव्यों को पूरा किए बिना मोक्ष की इच्छा करता है, तो उसे कष्ट भोगना पड़ता है। गरुड़ पुराण के अनुसार, इन ऋणों को चुकाए बिना मृत्यु के बाद भी मुक्ति संभव नहीं होती।

कर्म और मोक्ष का संबंध

जब रुचि प्रजापति ने विवाह को दुखों का कारण बताया, तब पितरों ने समझाया कि कर्म स्वयं बंधन नहीं होते, बल्कि उनका त्याग ही समस्या है। मार्कण्डेय पुराण में वर्णित है कि शास्त्रों के अनुसार किए गए कर्म आत्मा को शुद्ध करते हैं और मोक्ष की दिशा में ले जाते हैं। पितरों ने यह भी स्पष्ट किया कि वेदों में कर्म को 'अविद्या' कहा गया है, लेकिन यही कर्म आगे चलकर 'विद्या' यानी परम ज्ञान का मार्ग बनते हैं।

इस तरह हिंदू धर्म शास्त्रों में गृहस्थ आश्रम केवल एक सांसारिक जीवन नहीं है, इसे मोक्ष प्राप्ति का सबसे महत्वपूर्ण आधार बताया गया है। जो व्यक्ति कर्तव्यों से बचने के लिए संन्यास अपनाता है, वह वास्तव में आध्यात्मिक उन्नति से दूर हो सकता है। 

(Disclaimer: यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। इंडिया टीवी एक भी बात की सत्यता का प्रमाण नहीं देता है।)

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