Lucky Ratna: हर व्यक्ति चाहता है कि उसका जीवन सफलता और आर्थिक समृद्धि से भरा रहे। कभी-कभी मेहनत के बावजूद काम रुके रहते हैं और अवसर हाथ से निकल जाते हैं, तो इसका कारण ग्रह दोष भी हो सकता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार ऐसे समय में सही ऊर्जा का संचार बहुत जरूरी है। रत्नों में ऐसी क्षमता होती है कि वे कमजोर ग्रहों की नकारात्मक प्रभाव को कम कर जीवन में सकारात्मक बदलाव ला सकते हैं। इन रत्नों को सही तरीके से धारण करने से भाग्य खुलता है और वित्तीय स्थिति मजबूत होती है। आज हम आपको तीन ऐसे शक्तिशाली रत्नों के बारे में बताएंगे।
पुखराज: ज्ञान और धन का रत्न
पुखराज रत्न गुरु ग्रह से जुड़ा है। इसे पहनने से शिक्षा, करियर और वित्तीय स्थिति मजबूत होती है। पीले, सुनहरे या हल्के नारंगी रंग का यह रत्न आत्मविश्वास और स्थिरता बढ़ाता है। विशेष रूप से धनु और मीन राशि वाले इसे पहन सकते हैं।
पुखराज पहनने का तरीका:
- गुरुवार को सोने या पीतल की अंगूठी में पहनें।
- पहनने से पहले दूध, गंगाजल, शहद और तुलसी में शुद्ध करें।
- “ॐ बृं बृहस्पतये नमः” मंत्र का जाप करें।
- दाहिने हाथ की तर्जनी में सूर्योदय के समय पहनें।
माणिक्य: आत्मबल और सफलता का रत्न
माणिक्य सूर्य ग्रह से जुड़ा रत्न है। इसे पहनने से करियर में तरक्की, पदोन्नति और आत्मबल बढ़ता है। राजनीति, नौकरी और उच्च पदों पर यह लाभ देता है। मेष, सिंह और धनु राशि वालों के लिए यह शुभ है। जबकि, तुला, कन्या, मिथुन, मकर और कुंभ राशि के जातक इसे पहनने से बचें।
माणिक्य पहनने का तरीका:
- रविवार को पहनना शुभ होता है।
- गंगाजल और कच्चे दूध में शुद्ध करें।
- तांबे या सोने की अंगूठी में अनामिका अंगुली में पहनें।
- सूर्योदय के समय स्नान करके धारण करें।
नीलम: भाग्य और धन वृद्धि का रत्न
नीलम शनिदेव का रत्न माना जाता है। इसे पहनने से आर्थिक स्थिति मजबूत होती है, व्यापार और नौकरी में लाभ मिलता है और स्वास्थ्य संबंधी परेशानियां कम होती हैं। कुंभ और मकर राशि के लिए शुभ है। नीलम को मूंगा, माणिक्य और मोती के साथ न पहनें।
नीलम पहनने का तरीका:
- शनिवार को सोने या पंच धातु की अंगूठी में पहनें।
- गंगाजल और दूध में शुद्ध करें।
- मध्यमा उंगली में धारण करें।
- रत्ती 7 से 8 के बीच हो।
(Disclaimer: यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। इंडिया टीवी एक भी बात की सत्यता का प्रमाण नहीं देता है।)
ये भी पढ़ें: क्यों प्रेमानंद महाराज ने कलियुग को बताया सबसे सम्माननीय युग, जानिए कैसे इसी युग में संभव है सतयुग का आनंद