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Pradosh Vrat Katha: शिवजी की कृपा से दूर होते हैं दुख और दरिद्रता, प्रदोष व्रत पर जरूर करें इस पौराणिक कथा का पाठ, यहां पढ़िए

 Written By: Arti Azad @Azadkeekalamse
 Published : May 13, 2026 07:59 pm IST,  Updated : May 13, 2026 07:59 pm IST

Pradosh Vrat Katha: प्रदोष व्रत की यह कथा एक गरीब पुजारी परिवार और राजकुमार से जुड़ी है। शिव भक्ति और प्रदोष व्रत के प्रभाव से कैसे एक भटकता राजकुमार अपना खोया राज्य वापस पाता है और गरीब परिवार के जीवन में सुख-समृद्धि आती है, यह कथा उसी आस्था और शिव कृपा का बखान करती है।

Pradosh Vrat katha- India TV Hindi
प्रदोष व्रत पर जरूर करें इस पौराणिक कथा का पाठ Image Source : INDIA TV

Pradosh Vrat Katha In Hindi: सनातन धर्म में प्रदोष व्रत को बेहद शुभ और फलदायी माना गया है। यह व्रत भगवान शिव को समर्पित होता है। मान्यता है कि इसे श्रद्धा और नियमपूर्वक करने से जीवन के सभी कष्ट दूर हो जाते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार प्रदोष व्रत करने वाले भक्तों पर भगवान शिव और मां पार्वती की विशेष कृपा बनी रहती है। प्रदोष व्रत की पूजा के दौरान इसकी कथा का पाठ करने से संपूर्ण फल की प्राप्ति होती है। यहां पढ़िए प्रदोष व्रत की महिमा और महत्व को दर्शाती यह पौराणिक कथा।

प्रदोष व्रत की पौराणिक कथा

प्राचीनकाल में एक गरीब पुजारी अपने परिवार के साथ रहता था। कुछ समय बाद उस पुजारी की मृत्यु हो गई, जिसके बाद उसकी पत्नी परिवार का पालन-पोषण करने लगी। वह अपने छोटे पुत्र को साथ लेकर भीख मांगने लगी और दिनभर भटकने के बाद शाम को घर लौटती थी। एक दिन रास्ते में उसकी मुलाकात विदर्भ देश के एक राजकुमार से हुई। अपने पिता की मृत्यु के बाद वह राजकुमार भी दर-दर भटकने को मजबूर था।

राजकुमार की दयनीय स्थिति देखकर पुजारी की पत्नी का हृदय पिघल गया और वह उसे अपने घर ले आई। उसने राजकुमार को अपने पुत्र के समान स्नेह और आश्रय दिया। कुछ समय बाद पुजारी की पत्नी दोनों बालकों को लेकर शांडिल्य ऋषि के आश्रम पहुंची। वहां ऋषि ने उसे भगवान शिव के प्रदोष व्रत की कथा, महत्व और पूजा विधि बताई। कथा सुनने के बाद वह महिला पूरी श्रद्धा और नियमपूर्वक प्रदोष व्रत करने लगी। एक दिन दोनों बालक जंगल घूमने गए। पुजारी का पुत्र तो वापस लौट आया, लेकिन राजकुमार वहीं रुक गया।

जंगल में उसकी मुलाकात गंधर्व कन्याओं से हुई, जिनमें अंशुमती नाम की कन्या भी शामिल थी। दोनों के बीच बातचीत हुई और राजकुमार देर से घर लौटा। बाद में अंशुमती के माता-पिता को राजकुमार पसंद आ गया। उन्होंने कहा कि शिव जी की कृपा से वे अपनी पुत्री का विवाह उससे करना चाहते हैं। राजकुमार ने भी इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया और दोनों का विवाह संपन्न हो गया। विवाह के बाद राजकुमार ने गंधर्वों की विशाल सेना की सहायता से विदर्भ राज्य पर आक्रमण किया और युद्ध में विजय प्राप्त कर अपना खोया हुआ राज्य वापस हासिल कर लिया। वह अपनी पत्नी अंशुमती के साथ सुखपूर्वक राज्य करने लगा।

राजकुमार ने पुजारी की पत्नी और उसके पुत्र को भी महल में सम्मान के साथ स्थान दिया। इस तरह उनके भी सभी दुख दूर और दरिद्रता समाप्त हो गई। एक दिन अंशुमती ने पति से उसके जीवन में आए इस बड़े बदलाव का कारण पूछा। तब राजकुमार ने उसे बताया कि यह सब प्रदोष व्रत के प्रभाव से संभव हुआ है। तभी से प्रदोष व्रत की महिमा चारों ओर फैल गई और लोग श्रद्धा भाव से यह व्रत करने लगे। 

(Disclaimer: यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। इंडिया टीवी एक भी बात की सत्यता का प्रमाण नहीं देता है।)

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