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Surya Grahan 2026 Story In Hindi: सूर्य ग्रहण क्यों लगता है? यहां पढ़ें ग्रहण से जुड़ी राहु-केतु की पौराणिक कथा

 Written By: Vineeta Mandal
 Published : Feb 16, 2026 09:28 pm IST,  Updated : Feb 16, 2026 09:28 pm IST

Surya Grahan Ki Katha: हिंदू धर्म में सूर्य ग्रहण को अशुभ समय माना गया है। इस दौरान कोई भी शुभ काम नहीं होते हैं। तो आइए आज हम आपको बताते हैं कि आखिर सूर्य ग्रहण क्यों लगता है। सूर्य ग्रहण का वैज्ञानिक और धार्मिक महत्व क्या है।

सूर्य ग्रहण 2026- India TV Hindi
सूर्य ग्रहण 2026 Image Source : PEXELS

Surya Grahan Story In Hindi: 17 फरवरी 2026, मंगलवार को इस साल का पहला सूर्य ग्रहण लगने वाला है। यह ग्रहण, कंकणाकृति सूर्य ग्रहण होगा। हालांकि यह ग्रहण भारत में दृश्य नहीं होगा। साल का पहला सूर्य ग्रहण दक्षिणी अमेरिका, दक्षिणी अफ्रीका, प्रशान्त महासागर, अटलांटिका महासागर, अंटार्कटिका में कंकणाकृत रूप में दिखाई देगा। साथ ही चिली, अर्जेन्टिका, मालावी, नाबीलिया, नार्वे, फ्रांस, जिम्बावेव, दक्षिण जार्जिया, मारीशस, अम्बिया तंजानिया आदि देशों में ग्रहण दृश्य होगा। यह सूर्य ग्रहण कंकणाकृति रूप में दिखेगा। इस सूर्य ग्रहण का स्पर्श काल भारतीय समयानुसार आज दोपहर बाद 3 बजकर 26 मिनट से शुरू होकर शाम 7 बजकर 58 मिनट तक रहेगा। इस सूर्य ग्रहण का कुल पर्वकाल 4 घंटे 32 मिनट का होगा। 

बता दें कि ग्रहण के दिन सूतक काल का भी अत्यधिक महत्व है। ग्रहण का सूतक काल 12 घंटे या 9 घंटे पूर्व प्रारंभ हो जाता है जिसमें सूर्य ग्रहण का सूतक काल ग्रहण समय से 12 घंटे पूर्व प्रारंभ हो जाता है। सूतक काल को एक प्रकार से अशुभ समय माना जाता हैं, लिहाजा सूतक काल में भी कोई मांगलिक या शुभ कार्य नहीं किया जाता है। इस ग्रहण का सूतक काल मंगलवार भोर 4 बजकर 26 मिनट से शुरू हो चूका है।

सूर्य ग्रहण क्यों लगता है?

सूर्य ग्रहण एक प्राकृतिक खगोलीय घटना है, जो तब लगता है जब चंद्रमा सूर्य और पृथ्वी के ठीक बीच में आ जाता है। इससे पृथ्वी पर कुछ इलाकों में सूर्य की रोशनी पूरी तरह या आंशिक रूप से रुक जाती है, यानी सूर्य ढक जाता है। लेकिन 17 फरवरी को लगने वाला सूर्य ग्रहण वलयाकार सूर्य ग्रहण होगा, जिसे साइंस की भाषा में रिंग ऑफ फायर कहा जाता है।  इस सूर्य ग्रहण पर चंद्रमा सूर्य को पूरी तरह से ढक नहीं पाता है। इस ग्रहण में सूर्य का बाहरी किनारा अग्नि के चमकते छल्ले जैसा नजर आएगा।

सूर्य ग्रहण से जुड़ी पौराणिक कथा 

हिंदू मान्यताओं में सूर्य ग्रहण को राहु-केतु से जोड़ा जाता है। पौराणिक कथा के अनुसार, समुद्र मंथन के दौरान जब इससे अमृत निकला तब इसे लेकर देवता और असुर के बीच विवाद और संग्राम होने लगा है। यह सब देखने के बाद भगवान विष्णु ने मोहिनी का रूप लेकर अमृत बांटने का काम किया। भगवान विष्णु अमृत को केवल देवताओं में बांटने लगे। एक असुर, जिसका नाम स्वरभानु था, देवता का वेश बनाकर अमृत की पंक्ति में बैठ गया। जैसे ही उसने अमृत की बूंद पी, तभी सूर्य और चंद्रमा ने उसे पहचान लिया और भगवान विष्णु को बता दिया। भगवान विष्णु ने तुरंत सुदर्शन चक्र से उसका सिर धड़ से अलग कर दिया। लेकिन क्योंकि वह अमृत पी चुका था, वह मर नहीं पाया। उसका सिर राहु कहलाया और धड़ केतु। धार्मिक मान्यता है कि राहु समय-समय पर सूर्य को निगलने का प्रयास करता है, इसलिए सूर्य को ग्रहण लगता है, लेकिन राहु का केवल सिर है इसलिए सूर्य कुछ समय बाद बाहर आ जाता है और ग्रहण समाप्त हो जाता है।

(Disclaimer: यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। इंडिया टीवी एक भी बात की सत्यता का प्रमाण नहीं देता है।)

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