कोलकाताः कलकत्ता हाई कोर्ट ने पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले की सोनाली बीबी और स्वीटी बीवी एवं उनके परिवारों को अवैध प्रवासी करार देते हुए उन्हें बांग्लादेश भेजने के केंद्र के फैसले को शुक्रवार को रद्द कर दिया। अदालत ने केंद्र को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया कि बांग्लादेश भेजे गये इन छह नागरिकों को एक महीने के भीतर भारत वापस लाया जाए।
हाई कोर्ट ने खारिज की केंद्र की अपील
हाई कोर्ट ने शुक्रवार के आदेश पर अस्थायी रोक लगाने की केंद्र सरकार की अपील भी खारिज कर दी। जुलाई में निर्वासन के बाद बीरभूम में मुरारई के पाइकर क्षेत्र में दोनों परिवारों से मुलाकात की थी और सीमा पर भारतीय हिस्से में रहने वाले सदस्यों की दुर्दशा पर खबर दी थी। न्यायमूर्ति तपब्रत चक्रवर्ती और न्यायमूर्ति आर के मित्रा की खंडपीठ ने भोदू शेख की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर दो आदेश जारी किये।
याचिकाकर्ता ने कोर्ट में किया था ये दावा
याचिकाकर्ता ने दावा किया था कि नौ माह की गर्भवती उनकी बेटी सोनाली, उसके पति दानेश शेख और पांच साल के बेटे को दिल्ली में हिरासत में लिया गया और बांग्लादेश भेज दिया गया। दानिश शेख पश्चिम बंगाल के बीरभूम के मुरारई का रहने वाला है। मुरारई के ही आमिर ने भी एक अन्य याचिका में ऐसा दावा किया था। खान ने कहा कि उसकी बहन स्वीटी बीबी और उसके दो बच्चों को दिल्ली पुलिस ने उसी इलाके से हिरासत में ले लिया एवं बांग्लादेश भेज दिया।
याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया कि दिल्ली के रोहिणी क्षेत्र के सेक्टर 26 में दो दशकों से अधिक समय से दिहाड़ी मजदूरी करने वाले इन परिवारों को 18 जून को एएन काटजू मार्ग पुलिस ने अवैध बांग्लादेशी होने के संदेह में हिरासत में लिया था और बाद में 27 जून को सीमा पार भेज दिया था। बाद में बांग्लादेश पुलिस ने इन लोगों को कथित रूप से गिरफ्तार कर लिया था।
सोनाली के परिवार ने व्यक्त की चिंता
सोनाली के परिवार के सदस्यों ने इस बात पर चिंता व्यक्त की कि यदि उसने बांग्लादेश में बच्चे को जन्म दिया तो उसकी नागरिकता की स्थिति क्या होगी। दोनों परिवारों का प्रतिनिधित्व करने वाले वकीलों ने उच्च न्यायालय में दलील दी कि बांग्लादेशी होने के संदेह में इन लोगों को जबरन एवं अवैध रूप से पड़ोसी देश भेज दिया गया जबकि उन्होंने संबंधित अधिकारियों के समक्ष पैन, आधार कार्ड, भूमि स्वामित्व के कागजात और माता-पिता एवं दादा-दादी के मतदाता पहचान पत्र समेत आवश्यक नागरिकता दस्तावेज प्रस्तुत किये थे।
उन्होंने अदालत में यह भी दावा किया कि बांग्लादेश भेज दिये गये बच्चों के वास्ते सरकारी अस्पताल से जारी किये गये जन्म प्रमाणपत्र भी प्रस्तुत किये गये थे। इस याचिकाओं के विरोध में हलफनामा देते हुए सरकार ने दावा किया कि यह याचिका कलकत्ता हाई कोर्ट के समक्ष विचार योग्य ही नहीं है, क्योंकि इससे पहले दिल्ली हाई कोर्ट में एक बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर की गई थी, जिसमें उक्त लोगों को अवैध हिरासत में लेने का आरोप लगाया गया था और उनके निर्वासन को चुनौती देने वाली एक अन्य याचिका भी दायर की गई थी।
केंद्र ने कोर्ट में दी ये दलील
केंद्र की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल अशोक कुमार चक्रवर्ती ने दावा किया था कि इस मामले में कलकत्ता उच्च न्यायालय का कोई अधिकार क्षेत्र नहीं है क्योंकि जिस व्यक्ति को निर्वासित किया गया था, उसे दिल्ली में हिरासत में लिया गया था। उन्होंने दावा किया कि कलकत्ता उच्च न्यायालय में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका, दिल्ली उच्च न्यायालय में दायर दोनों याचिकाओं के तथ्य को दबाते हुए दायर की गई थी। अपने आदेश में पीठ ने कहा कि प्राधिकारियों द्वारा ‘निर्वासन की कार्यवाही जल्दबाजी में की गई’ और (गृह मंत्रालय के) परिपत्र के प्रावधानों का उल्लंघन किया गया। तृणमूल कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी ने अदालत के आदेश का हवाला देते हुए दावा किया कि मतदाता आगामी राज्य चुनाव में बंगाली उत्पीड़न के मुद्दे पर भाजपा से जवाब मांगेंगे।
इनपुट- भाषा
संपादक की पसंद