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कार्लो एक्यूटिस को मिलने जा रहा है पहले मिलेनियल संत का दर्जा, जानिए इनके बारे में

 Published : Sep 04, 2025 09:26 pm IST,  Updated : Sep 04, 2025 09:26 pm IST

कार्लो एक्यूटिस की साल 2006 में 15 साल की उम्र में ल्यूकीमिया से मौत हो गई थी। अब कार्लो को एक समारोह में मिलेनियल संत का दर्जा दिया जाएगा। चलिए ऐसे में कार्लो एक्यूटिस के बारे में जानते हैं।

कार्लो एक्यूटिस को मिलने जा रहा है पहले मिलेनियल संत का दर्जा- India TV Hindi
कार्लो एक्यूटिस को मिलने जा रहा है पहले मिलेनियल संत का दर्जा Image Source : AP

Carlo Acutis Catholic Saint: ब्रिटेन में जन्मे एक इतालवी लड़के को मौत के बाद संत की उपाधि मिलने जा रही है। इस इतालवी लड़के का नाम कार्लो एक्यूटिस है जिसकी 2006 में ल्यूकेमिया से मृत्यु हो गई थी। कार्लो एक्यूटिस को रविवार को सेंट पीटर्स स्क्वायर में पोप लियो द्वारा आयोजित एक समारोह में सहस्राब्दी पीढ़ी के पहले कैथोलिक संत का दर्जा दिया जाएगा। इस समारोह में हजारों श्रद्धालुओं के आने की उम्मीद है।

कार्लो एक्यूटिस के बारे में जानें

कार्लो एक्यूटिस का 15 वर्ष की आयु में निधन हो गया था।  शुरुआत से ही वो दूसरे बच्चों से ज्यादा धार्मिक थे। काफी छोटी उम्र में उन्होंने कोडिंग सीख ली थी और एक वेबसाइट बनाई थी। इस वेबसाइट में कैथोलिक समाज में दुनिया भर में हो रहे चमत्कारों को एक साथ लिस्ट किया गया था। कार्लो की सिफारिश सेंट मेकिंग डिपार्टमेंट ने की थी जिसके बाद अब उन्हें मदर टेरेसा और फ्रांसिस ऑफ असीसी के समान स्तर पर सम्मानित किया जाएगा।

कार्लो एक्यूटिस से जुड़े चमत्कार

ईसाई धर्म में संत का दर्जा पाने के लिए चमत्कार साबित करना जरूरी है। सेंट मेकिंग कमेटी ने ऐसे 2 चमत्कारों के बारे में बताया है जो कार्लो एक्यूटिस से जुड़े हैं। इसमें एक चमत्कार यह है कि दुर्लभ बीमारी से जूझ छोटा बच्चा कथित तौर पर कार्लो की टी-शर्ट को छूने से ठीक हो गया था। कई मीडिया रिपोर्ट्स में इस खबर का जिक्र किया गया है। एक और मामला भी है जिसमें ब्रेन इंजरी से मरणासन्न हो चुकी एक स्टूडेंट की सेहत बिल्कुल ठीक हो गई, जब उसकी मां ने कार्लो की कब्र पर बेटी के लिए प्रार्थना की।  

बुक ऑफ सेंट्स मिलती है जगह

कैथोलिक धर्म में संत वो है, जो मरीज की बड़ी बीमारियां जादुई ढंग से ठीक कर देता है, या दूसरे चमत्कार करता है। ऐसे संतों के नाम बुक ऑफ सेंट्स में लिखे हुए हैं। ईसाई धर्म में इस प्रक्रिया को कैननजेशन कहते हैं, मतलब मौत के बाद चमत्कारिक या पवित्र व्यक्ति को संत का दर्जा देना। कैननजेशन के बाद संत का नाम किताब में शामिल कर लिया जाता है और सभाओं में भी बोला जाता है। इसके बाद उस संत का नाम प्रार्थनाओं में लिया जाने लगता है। उसके नाम पर चर्च का नाम रख दिया जाता है। 

क्या है नियम?

नियम यह है कि मौत के 5 साल बाद ही किसी को संत की उपाधि मिल सकती है। इस दौरान पता किया जाता है कि मृत शख्स ने कोई गलत काम तो नहीं किया। यह एक तरह का वैरिफिकेशन पीरियड होता है। चर्च के लोकल अधिकारी जांच-पड़ताल करते हैं, सारे सबूत जुटाए जाते हैं, इसे पॉस्ट्युलेशन कहते हैं। वेटिकन सिटी में अधिकारियों का एक ग्रुप होता है, जो इसी पर काम करता है। इनका काम संत बनने से पहले किसी की सारी पड़ताल करवाना है। सबूत जमा होने के बाद 9 धार्मिक गुरु दस्तावेजों की जांच करते हैं। अगर बहुमत रहा तो डॉक्युमेंट पोप के पास चले जाते हैं। पोप की हामी के बाद शख्स को सम्माननीय का दर्जा मिलता है, लेकिन संत की पदवी अब भी दूर होती है।

साइंस के नजरिया भी समझें

संत कहलाने के लिए अभी कुछ पड़ाव शेष रह जाते हैं। कोई व्यक्ति संत क्यों है, सामान्य इंसान क्यों नहीं, इसे साइंस के नजरिए से देखा जाता है। साइंटिफिक कमीशन बैठती है, जो तय करती है कि मृतक ने जो काम किए, वो चमत्कार से कम नहीं थे। अगर चमत्कार इतना बड़ा है कि साइंस की समझ में ना आए तो मान लिया जाता है कि संबंधित शख्स संत है और खुद ईश्वर ने उससे काम करवाए हैं। पोप इसके बाद सभा करते और संतों का नाम और उनके चमत्कारों की बात बताते हैं, जिसके बाद संत का दर्जा मिलने की प्रकिया पूरी होती है।

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