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'हीरो को भी डर लगता है, वो भी कांपता है', अंधाधुन ने यही दिखाया और जीता 66वां राष्ट्रीय पुरस्कार

एक हीरो, प्रेमी, अंधा, लालची, परिस्थितियों में फंसा हुआ, दया के चक्कर में ठगा गया, मरने की कगार पर आदमी कैसा होता है और कैसा रिएक्ट करता है, ये आयुष्मान ने इस फिल्म में जीकर दिखाया।

Vineeta Vashisth Vineeta Vashisth
Updated on: December 23, 2019 7:04 IST
andhadhun- India TV Hindi
Image Source : GOOGLE andhadhun

66वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों National Film Awards में आयुष्मान खुराना Ayushman Khurana और तब्बू Tabu अभिनीत अंधाधुन Andhadhun ने बाजी मार ली है। अंधाधुन को बेस्ट हिंदी फिल्म का पुरस्कार मिला है। पहले सीन से अंतिम सैकेंड के सीन तक दर्शकों को अपनी सीट पर बैठने के लिए मजबूर करने वाली इस फिल्म को राष्ट्रीय पुरस्कार मिलना वाकई अच्छी बात है।

एक आम दर्शक की नजर जानिए इस फिल्म के बारे में । 

इस फिल्म ने बॉलीवुड को बहुत कुछ सिखाया। थ्रिलर कैसा होता है, कॉमेडी के दायरे क्या हैं। किसी से एक्टिंग कैसे कराई जाए और सबसे बड़ी और खास चीज, बेहतरीन तरीके से कसी हुई पटकथा। कहानी बिलकुल नई, अनोखी दर्शक अगले सीन की कल्पना भी न कर पाएं ऐसी। पटकथा इतनी एक्यूरेट और कसी हुई कि आप सीट नहीं छोड़ सकते, हर पल में अगले पल की उत्सुकता और अवाक कर देने वाला सीक्वेंस। दर्शकों ने इस फिल्म को नाम के अनुरूप अंधाधुन तरीके से पसंद किया। 

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हीरो हमेशा पॉजिटिव हो, ऐसा असल जिंदगी में नहीं होता। हर इंसान के अंदर एक हीरो के साथ साथ एक विलेन भी बसा होता है और अंधाधुन में आयुष्मान के भीतर छिपे हीरो बनाम विलेन को बखूबी उकेरा गया है।

आयुष्मान खुराना तब नए थे, लेकिन जिस तरह से उन्होंने कई तरह के किरदार निभाए, प्रेमी, अंधा, लालची,फंसा हुआ, दया के चक्कर में फंसा हुआ, मरने की कगार पर आदमी कैसा होता है और कैसा रिएक्ट करता है, ये आयुष्मान ने इस फिल्म में जीकर दिखाया। आप उनके किरदार को किसी भी प्वाइंट पर नकार नहीं सकते। 

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यही बात तब्बू के लिए कही जानी चाहिए। अमीर, लालची, चरित्रहीन पर फिर भी बार बार आपको लगता है कि कुछ ऐसा करेगी जिससे अच्छी साबित हो जाए। यही अवधारणा तो कलाकार को पूरा करती है।

राधिका आप्टे समेत फिल्म के हर छोटे बड़े किरदार ने फिल्म में चौंका दिया है। अंधे हीरो की पोल खोलने वाला बच्चा, किडनी निकालने वाला और ऐन मौके पर दया दिखाने वाला डॉक्टर। मौसी में छिपा गरीबी का लालच। 

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किसी फिल्म के हिट और फ्लॉप होने के सालों बाद तक लोग उस फिल्म को फलां हीरो और हीरोइन की फिल्म के तौर पर याद रखते हैं, ये फिल्म भी आयुष्मान खुराना और तब्बू की फिल्म कहलाई जाएगी, लेकिन ये महज किरदार हैं, असली हीरो हैं फिल्म के डायरेक्टर श्रीराम राघवन। उन्हें सलाम।

दरअसल ऊपर लिखी छोटी सी प्रतिक्रिया को फिल्म क्रिटिक की तरह न देखा जाए और एक आम दर्शक की तरह देखा जाए तो शायद यही परिणाम निकलता है जो अंधाधुन के साथ हुआ।  किसी भी फिल्म को सफल या असफल करने वाले समीक्षक और क्रिटिक नहीं बल्कि दर्शक होते हैं।

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